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विकास

‘अरुणाचल’ में भी बांध के खिलाफ उबाल!

सियांग में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट क्षमता वाली जलविद्युत परियोजना के खिलाफ भड़का आंदोलन केवल बांध विरोधी संघर्ष नहीं है। यह पर्यावरणीय न्याय, आदिवासियों के अस्तित्व, विकास की अवधारणा और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर प्रकृति पर थोपी जा रही दबावपूर्ण नीतियों के खिलाफ एक गंभीर चेतावनी है

Bhavesh Brahmankar

अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी सियांग जिले के मुख्यालय पासीघाट की सड़कों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए, पथराव हुआ और आंदोलित युवाओं का आक्रोश सड़कों पर उमड़ पड़ा। इसकी वजह बनी प्रस्तावित 11,200 मेगावाट क्षमता वाली ‘सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट’ परियोजना।

दिल्ली के सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-निर्माताओं के लिए यह परियोजना चीन को चुनौती देने वाला जल-रणनीतिक हथियार या हरित ऊर्जा का एक महाप्रकल्प हो सकती है; लेकिन पूर्वी हिमालय की गोद में पीढ़ियों से बसे आदिवासी समाज के लिए यह उनके अस्तित्व, संस्कृति और नाजुक पर्यावरण पर मंडराता सीधा और जानलेवा संकट है।

पासीघाट और गेकू की घाटियों में उठी यह आग केवल एक बांध के विरोध का संघर्ष नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित का मुखौटा पहनकर प्रकृति का विनाश करने वाले विकास के हिंसक मॉडल के खिलाफ छेड़ा गया सीधा पर्यावरणीय विद्रोह है।

सियांग बांध जिस भौगोलिक क्षेत्र में प्रस्तावित है, वह पूर्वी हिमालय दुनिया के सर्वाधिक भूकंप संभावित और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां के पहाड़ भूस्खलन और भूगर्भीय हलचलों के लिहाज से अत्यंत अस्थिर हैं। ऐसे नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में 11 हजार मेगावाट से अधिक क्षमता का विशाल बांध बनाना यानी भूकंप के मुहाने पर बारूद का ढेर लगाने जैसा आत्मघाती कदम है, ऐसा अनेक विशेषज्ञों का मानना है।

हजारों क्यूसेक पानी का विशाल दबाव जब यहां के पहाड़ों पर पड़ेगा, तब बांध के कारण होने वाली भूकंपीय गतिविधियों का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण पहले ही बादल फटने, अचानक बाढ़ आने और भूस्खलन की घटनाओं में भारी वृद्धि हो रही है।

ऐसी स्थिति में हिमालय के गले में कंक्रीट का इतना बड़ा फंदा डालकर हम आखिर कौन-सी सुरक्षा हासिल करना चाहते हैं? यदि प्रकृति का प्रकोप हुआ या कोई दुर्घटना घटी, तो नीचे स्थित असम की घाटी और मैदानी इलाकों में जो जलप्रलय आएगा, उसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। विकास के नाम पर हम पूरे पूर्वोत्तर भारत को जलसमाधि के मुहाने पर लाकर खड़ा कर रहे हैं, ऐसी आशंका पर्यावरण विशेषज्ञ व्यक्त कर रहे हैं।

पर्यावरण का अस्तित्व केवल पेड़-पौधों और पानी तक सीमित नहीं है। उस पारिस्थितिकी से जुड़ी जैविक श्रृंखला और मानवीय संस्कृति भी उसका अभिन्न हिस्सा हैं। इस विशाल परियोजना के कारण हजारों हेक्टेयर में फैले समृद्ध, सदाबहार मानसूनी जंगल हमेशा के लिए पानी में डूब सकते हैं।

दुर्लभ वनस्पतियां, औषधीय संपदा और केवल हिमालय के इस क्षेत्र में पाए जाने वाले वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास एक झटके में नष्ट होने का खतरा है। इससे भी भयावह बात यह है कि ‘आदि’ जनजाति की सदियों पुरानी विरासत भी बाढ़ के पानी में डुबो दी जाएगी।

उनके पूर्वजों के पवित्र स्थल, पारंपरिक खेती के क्षेत्र, पशुओं के चरागाह और शांत बहती सियांग नदी के किनारे विकसित हुई उनकी स्वायत्त संस्कृति हमेशा के लिए मानचित्र से मिट सकती है। स्थानीय लोगों को विस्थापित कर, उन्हें अपनी ही जमीन पर बेघर बनाकर पैदा की जाने वाली बिजली आखिर किन घरों को रोशन करेगी? यह बिजली पर्यावरण का गला घोंटकर और एक प्राचीन संस्कृति के अस्तित्व को मिटाकर पैदा की गई रक्तरंजित बिजली होगी, ऐसी भावना स्थानीय लोगों में गहराती जा रही है।

इस परियोजना के समर्थन में सरकार और संबंधित एजेंसियों की ओर से लगातार एक ही तर्क दिया जा रहा है। वह यह कि चीन तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र का उद्गम क्षेत्र) नदी पर 60,000 मेगावाट का विशाल ‘मेदोग’ बांध बना रहा है। चीन यदि अचानक पानी रोकता है या छोड़ता है, तो यह भारत के लिए जल-बम साबित हो सकता है। इसलिए भारत को भी नीचे की ओर पानी संग्रहित करने और बाढ़ नियंत्रण के लिए इस विशाल बांध की जरूरत है।

पहली नजर में यह तर्क बेहद राष्ट्रवादी और देशभक्तिपूर्ण लग सकता है, लेकिन पर्यावरण और विज्ञान की कसौटी पर यह बेहद खोखला और भ्रामक साबित होता है। यदि चीन प्रकृति का विनाश करने वाली विशाल परियोजना बना रहा है, तो उसके जवाब में भारत भी अपने ही संवेदनशील हिमालय और अपने नागरिकों का पर्यावरणीय विनाश क्यों करे?

एक पर्यावरणीय अपराध का जवाब दूसरे पर्यावरणीय अपराध से नहीं दिया जा सकता। चीन का भय दिखाकर राष्ट्रीय सुरक्षा का हौवा खड़ा करना और स्थानीय लोगों के वैध लोकतांत्रिक एवं पर्यावरणीय अधिकारों को देशविरोधी बताकर कुचलना, यह रणनीति अब बेनकाब हो रही है। प्रकृति राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं पहचानती। हिमालय की पारिस्थितिकी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। यदि दोनों ओर से इन पर्वतों पर कंक्रीट के प्रहार होते रहे, तो पूरे तिब्बत और पूर्वोत्तर भारत को बंजर होने में देर नहीं लगेगी।

स्थानीय स्तर पर चल रहे इस आंदोलन की सबसे आशाजनक और उतनी ही विचारणीय विशेषता है जेन-जी की सक्रिय भागीदारी। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में खोई रहने वाली पीढ़ी कहकर जिन युवाओं को अक्सर कमतर आंका जाता है, वही पीढ़ी आज अपनी नदियों, जंगलों और पूर्वजों की मिट्टी को बचाने के लिए पासीघाट की सड़कों पर उतर आई है। ये युवा किसी राजनीतिक दल के झंडे लेकर नहीं आए हैं। वे अपने भविष्य, अपनी सांसों और अपनी पहचान के लिए लड़ रहे हैं।

लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था ने इस युवा पीढ़ी को क्या जवाब दिया? शांतिपूर्ण रैलियों को रोका गया, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144) लागू कर पासीघाट को छावनी में तब्दील कर दिया गया, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर कड़े कानून लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया। जब शांतिपूर्ण विरोध का रास्ता दमन के जरिए बंद किया जाता है, तभी असंतोष का विस्फोट होता है। अपनी मिट्टी से प्रेम करने वाले युवाओं को अपराधी घोषित करके कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक शासन नहीं कर सकती।

भारत को बिजली की जरूरत है, यह स्वीकार है; लेकिन उस ऊर्जा को हासिल करने के लिए देश के पर्यावरणीय मुकुटमणि कहे जाने वाले हिमालयी क्षेत्रों को ही तबाह कर दिया जाए, क्या यह उचित है? नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा अभी ताजा है।

क्या हम उससे कोई सबक लेंगे या नहीं? आज जब सौर और पवन ऊर्जा जैसे विकल्प उपलब्ध हैं, तब हिमालय की नदियों पर विशाल बांध बनाने की जिद केवल कुछ कॉरपोरेट ठेकेदारों और बिजली कंपनियों की जेबें भरने के लिए ही तो नहीं की जा रही है, ऐसा सवाल उठना स्वाभाविक है।

सियांग घाटी में स्थानीय लोगों के आक्रोश को दबाने, उनकी राय बदलने और परियोजना के खिलाफ बने नकारात्मक माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए एक कॉरपोरेट जनसंपर्क कंपनी को कथित तौर पर लगभग 11 करोड़ रुपये का ठेका दिया गया। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट ने इस पूरी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। राष्ट्रीय जलविद्युत ऊर्जा निगम (एनएचपीसी ) द्वारा यह कदम उठाया गया।

जिस नदी को वहां का स्थानीय समाज मां का दर्जा देता है, जिस जमीन से उनका आध्यात्मिक और जैविक रिश्ता जुड़ा हुआ है, उसी जमीन के मूल निवासियों की भावनाएं खरीदने के लिए जनता के पैसों की ऐसी बर्बादी इससे बड़ी क्रूर विडंबना और क्या हो सकती है?

स्थानीय पुजारियों, ग्राम प्रमुखों, युवाओं और स्कूलों के प्रधानाचार्यों को प्रभावित करने से लेकर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को अपने पक्ष में करने तक की रणनीति तैयार की गई। लेकिन पासीघाट में एनएचपीसी के जले हुए कार्यालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि मिट्टी और पर्यावरण से जुड़ा जनाक्रोश किसी पीआर अभियान या बनावटी प्रचार के जरिए खरीदा नहीं जा सकता। जनता का संदेह और अविश्वास इस हद तक बढ़ गया है कि विकास के सुनहरे सपने दिखाने वाली भाषा उन्हें अपनी ही कब्रगाह सजाने जैसी महसूस होने लगी है।

प्रकृति के साथ युद्ध छेड़कर किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा कभी अभेद्य नहीं हो सकती। सियांग नदी केवल पानी का प्रवाह नहीं है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की जीवनरेखा है। सियांग घाटी का संघर्ष भारत को यही सबक दे रहा है। विकास की असली कसौटी बांध की ऊंचाई, बिजली उत्पादन की क्षमता या निवेश की राशि नहीं होती। विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे लोगों का जीवन कितना समृद्ध हुआ और प्रकृति का अस्तित्व कितना सुरक्षित रहा।

चीन को जवाब देने की कोशिश में हमें हिमालय की पर्यावरणीय सीमाओं को नहीं भूलना चाहिए। क्योंकि सीमाओं की सुरक्षा के लिए सामरिक शक्ति आवश्यक है, लेकिन देश का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए नदियों, जंगलों, पहाड़ों और उनसे गहराई से जुड़े समाजों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।

सियांग नदी के सामने आज खड़ा सवाल केवल एक बांध का नहीं, बल्कि भारत की विकास दृष्टि का है। प्रकृति को केवल संसाधन समझने वाला विकास अंततः विनाश को ही आमंत्रित करता है। इसलिए सियांग के पानी पर कोई भी फैसला लेने से पहले उस पानी के साथ बहने वाले जीवन के बारे में सोचना ही हमारी वास्तविक पर्यावरणीय और राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और पर्यावरण के विषय पर अपनी बेबाक राय रखते रहे हैं। लेख में व्यक्त उनके निजी विचार हैं