समुद्र के भीतर फैले हरे-भरे मैदानों को देखकर अधिकांश लोग उन्हें साधारण वनस्पति समझ लेते हैं, लेकिन वास्तव में ये पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण और उपयोगी पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं। इन्हें ‘समुद्री घास’ कहा जाता है, जिन्हें वैज्ञानिक दुनिया “समुद्र के फेफड़े” और “ब्लू कार्बन” पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में पहचानती है।
भूमध्यसागर में पाई जाने वाली पोसिडोनिया ओशिनिका ने दुनिया को यह समझाया है कि समुद्र के भीतर भी ऐसे वन मौजूद हैं, जो न केवल समुद्री जीवन का आधार हैं बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लेकिन विडंबना है कि पर्यटन, नौकायन, तटीय विकास और अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप ने इन जलमग्न वनों को गंभीर संकट में डाल दिया है। यही संकट अब भारत के तटों पर भी धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगा है।
भूमध्यसागर के अनुभव बताते हैं कि समुद्री घास किसी साधारण समुद्री पौधे का नाम नहीं है। यह एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र है, जो समुद्री जैव विविधता का आधार बनता है। असंख्य मछलियाँ, झींगें, केकड़े, समुद्री घोड़े, कछुए और अन्य जीव अपने जीवन का आरंभ इन्हीं घास मैदानों में करते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि समुद्री घास वैश्विक समुद्री कार्बन अवशोषण में महत्वपूर्ण योगदान देती है। महासागरों के कुल क्षेत्रफल का बेहद छोटा हिस्सा घेरने के बावजूद यह कार्बन को सदियों तक समुद्र तल की तलछट में कैद रख सकती है।
यही कारण है कि इसे जलवायु संकट के दौर में “ब्लू कार्बन सिंक” कहा जाता है। लेकिन समस्या यह है कि पर्यटन उद्योग के विस्तार के साथ समुद्र को मनोरंजन और उपभोग की वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा ‘समुद्री घास’ को भुगतना पड़ रहा है।
भारत में भी समुद्री घास की उपस्थिति कम महत्वपूर्ण नहीं है। देश के तटीय क्षेत्रों में समुद्री घास की 14 से अधिक प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं और इनका प्रमुख विस्तार तमिलनाडु के गल्फ ऑफ मुन्नार, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और कुछ पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है। ‘गल्फ ऑफ मुन्नार’ विशेष रूप से जैव विविधता का खजाना माना जाता है, जहाँ हजारों समुद्री प्रजातियाँ निवास करती हैं।
डुगोंग जैसी विलुप्तप्राय समुद्री प्रजाति पूरी तरह समुद्री घास पर निर्भर है। भारत में डुगोंग की संख्या पहले ही बेहद सीमित रह गई है। यदि समुद्री घास के मैदान नष्ट होते हैं, तो यह केवल एक वनस्पति का नुकसान नहीं होगा, बल्कि एक पूरी प्रजाति के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाएगा।
पिछले कुछ वर्षों में भारत में तटीय पर्यटन तेजी से बढ़ा है। गोवा, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और दक्षिण भारत के कई समुद्री तट बड़े पर्यटन केंद्र बन चुके हैं। यह विकास आर्थिक दृष्टि से आकर्षक लगता है, क्योंकि इससे रोजगार, विदेशी मुद्रा और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलता है। लेकिन समुद्र के भीतर इसके प्रभाव अक्सर अदृश्य रहते हैं।
जहां पर्यटन बढ़ता है, वहां नावों की संख्या बढ़ती है; जहां नावें बढ़ती हैं, वहां लंगर समुद्र तल को नुकसान पहुंचाते हैं। एक भारी एंकर कुछ ही मिनटों में समुद्री घास के उस हिस्से को उखाड़ सकता है, जिसे बनने में सैकड़ों वर्ष लगे हों। यही वह क्षति है, जिसे पर्यटक नहीं देख पाते, लेकिन समुद्र उसका असर वर्षों तक झेलंता है।
समुद्री घास को जीवित रहने के लिए साफ, पारदर्शी और प्रकाशयुक्त जल चाहिए। भारत में तटीय विकास की मौजूदा दिशा इस आवश्यकता के ठीक विपरीत है। बंदरगाह विस्तार, ड्रेजिंग, समुद्री निर्माण, तटीय सड़कें, होटल परियोजनाएं और अवैज्ञानिक तट विकास समुद्र में गाद और प्रदूषण बढ़ाते हैं। जब समुद्र का पानी मटमैला होता है, तो सूर्य का प्रकाश नीचे तक नहीं पहुंच पाता।
प्रकाश-संश्लेषण बाधित होता है और धीरे-धीरे समुद्री घास मरने लगती है। इसके साथ सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट समुद्र में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ाते हैं, जिससे शैवाल का अत्यधिक प्रसार होता है। ये शैवाल समुद्री घास को ढक लेते हैं और उसकी वृद्धि रोक देते हैं। परिणामस्वरूप समुद्र के भीतर जीवन का पूरा संतुलन बिगड़ने लगता है।
यह क्षति केवल पर्यावरणीय नहीं, आर्थिक भी है। समुद्री घास मछलियों के प्रजनन और संरक्षण में मदद करती है, जिससे मत्स्य उत्पादन बढ़ता है। यह तटीय कटाव रोकती है और समुद्री तूफानों की ऊर्जा को कम करती है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जब चक्रवातों की तीव्रता बढ़ रही है, तब समुद्री घास प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम कर सकती है।
यदि ये नष्ट होती हैं, तो मछुआरों की आय प्रभावित होगी, तटीय समुदायों का जीवन संकट में पड़ेगा और पर्यटन उद्योग भी अंततः प्रभावित होगा, क्योंकि समुद्र का स्वच्छ, पारदर्शी आकर्षण धीरे-धीरे समाप्त होने लगेगा। यानी जिस विकास के नाम पर समुद्र का दोहन हो रहा है, वही विकास दीर्घकाल में स्वयं संकट का कारण बन सकता है।
भूमध्यसागर का अनुभव भारत के लिए एक चेतावनी भी है और एक सीख भी। वहाँ सख्त कानून, निगरानी और नियंत्रित एंकरिंग जैसी व्यवस्थाओं से नुकसान कम करने के प्रयास हुए हैं। भारत में भी समुद्री संरक्षित क्षेत्र घोषित तो हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर है।
निगरानी के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, स्थानीय समुदायों की भागीदारी सीमित है और पर्यटन विकास की परियोजनाओं में पर्यावरणीय चिंताओं को अक्सर औपचारिकता भर मान लिया जाता है। समुद्री घास जैसी अदृश्य पारिस्थितिक संपदा नीति-निर्माण के केंद्र में अभी तक नहीं आ सकी है।
भारत के लिए यह प्रश्न केवल जैव विविधता का नहीं, जलवायु नीति का भी है। दुनिया आज कार्बन उत्सर्जन घटाने की बात कर रही है। भारत भी नेट-ज़ीरो और जलवायु प्रतिबद्धताओं की दिशा में योजनाएँ बना रहा है। ऐसे समय में समुद्री घास जैसे ब्लू कार्बन पारिस्थितिकी तंत्रों की अनदेखी गंभीर चूक होगी। ये समुद्र के भीतर कार्बन को सदियों तक सुरक्षित रख सकते हैं। लेकिन यदि इन्हें नष्ट किया गया, तो वही कार्बन वापस वातावरण में पहुँच सकता है और जलवायु संकट को और गंभीर बना सकता है। इसलिए समुद्री घास का संरक्षण केवल समुद्री जीवों की रक्षा नहीं, बल्कि जलवायु रणनीति का हिस्सा भी होना चाहिए।
अब आवश्यकता ठोस कार्रवाई की है। संवेदनशील समुद्री घास क्षेत्रों में लंगर पूरी तरह प्रतिबंधित, तटीय निर्माण की वैज्ञानिक समीक्षा, सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण पर सख्ती, पर्यटकों के लिए पर्यावरण शिक्षा और स्थानीय समुदायों को संरक्षण में भागीदार बनाना, ये कुछ बुनियादी कदम हैं, जिन्हें अब टाला नहीं जा सकता।
समुद्री घास को भारत की राष्ट्रीय कार्बन नीति और तटीय विकास योजनाओं में औपचारिक स्थान मिलना चाहिए। समुद्र के भीतर फैले ये जलमग्न वन हमें यही सिखाते हैं कि प्रकृति का निर्माण हजारों वर्षों में होता है, लेकिन उसका विनाश कुछ ही मिनटों में संभव है। यदि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह सवाल जरूर पूछेंगी कि जब समुद्र के फेफड़े घुट रहे थे, तब हम क्या कर रहे थे।