‘’हमारे गांव में लगभग सभी आदिवासियों को इस बात का इंतजार है कि कब जनगणना कर्मचारी आएंगे और हमारी गणना करेंगे क्योंकि हम पिछले सोलह साल से अबूझमाड़ के नक्शे पर से गायब हैं।‘’
यह बात 44 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ इलाके के एक दूर-दराज आदिवासी गांव आमाटोला के बुजुर्ग मंगडू राम ने डाउन टू अर्थ से कही।
वह कहते हैं कि हमें तो लगा कि इस बार भी हमारी गणना नहीं होगी क्योंकि राज्य सरकार फिर से बहाना बनाकर कह देगी कि माओवादी इलाका होने के कारण जनगणना कर्मचारी नहीं पहुंच सकते लेकिन अब तो सरकार इस प्रकार का बहाना भी नहीं मार सकती।
वह कहते हैं कि अब तो देश के ही गृहमंत्री ने ही हमारे बस्तर मुख्यालय आकर एक सरकारी कार्यकम में इस बात की घोषणा की है कि बस्तर से माओवाद पूरी तरह से खत्म हो गया है, ऐसे में सरकार के पास किसी भी प्रकार का बहाना नहीं है।
उनकी बात से सहमति जताते हुए गांव के ही एक दूसरे निवासी सोमा मंडावी का कहना है कि इस बार हमारे इलाके में जनगणना कार्य का विशेष महत्त्व है कारण कि शायद पहली बार अबूझमाड़ के ज्यादातर गांवों में जनगणना कार्य संभव हो सकेगा, क्योंकि सरकार के माओवाद उन्मूलन कार्यक्रम के कारण अबूझमाड़ के कोने-कोने में पुलिस बल की पहुंच संभव हुई है, ऐसे में हम उम्मीद कर रहे हैं कि हमारे इस बार अंदरूनी इलाकों में भी सरकारी तंत्र की पहुंच संभव होगी।
ध्यान रहे कि आमाटोला गांव में जनगणना कर्मी नहीं पहुंचे थे और आज से लगभग डेढ़ दशक पहले हुई जनगणना कार्य के दौरान गांव के आसपास बसे कंदाड़ी और ब्रीहेवडा गांवों में मर्ज कर दिया गया था।
इस संबंध में अबूझमाड़ आदिवासी छात्र संगठन के अध्यक्ष लक्ष्मण मंडावी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि अकेले हमारे ही गांव में जनगणना कर्मी नहीं आए बल्कि हमारे गांव के आगे के भी एक गांव बिनागुंडा के पास स्थित हजारीकोटी गांव को भी हमारे गांव की तरह ही नहीं पहुंचे थे और हजारीकोटा गांव भी हमारे गांव की तरह ही सरकारी नक्शें से पिछले सोलह साल से गायब है।
वह कहते हैं कि मेरे गांव की तरह ही हजारीकोटी गांव के आदिवासी भी जनगणना कर्मी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। वह बताते हैं कि हमने तो आपको केवल दो गांव ही बात ही बताई यदि इस इलाके में और इस प्रकार के गावों का खोजा जाए तो इस इलाके के कई दर्जन गांवों में पिछली बार जनगणना कार्य नहीं हुआ था।
इस संबंध में बिनागुंडा निवासी आइतो पट्टा ने डाउन टू अर्थ से कहा कि मेरे पिता ने बताया था कि 2011 जनगणना कार्य के दौरान हमारे गांव में ही हजारीकोटी गांव को मिला दिया गया था और जनगणना कर्मी हमारे ही गांव में ग्रमाीणों से पूछपांछ कर हजारीकोटी गांव की जानकारी ले ली थी। वह कहते हैं कि इस बार उस गांव के अधिकांश आदिवासी ग्रामीण जनगणना कर्मियों के इंतजार कर रहे हैं।
ध्यान रहे कि आमाटोला गांव में जनगणना कार्य नहीं हुआ था तब गांव के लोगों ने कई बार कोशिश की कि उनके गांव का नाम जनगणना रजिस्टर में दर्ज हो। इस संबंध में आमाटोला गांव के मंगडू राम कहते हैं कि पिछले डेढ़ दशक से हम अपने गांव को अधिकारिक तौर पर सरकारी कागज पर चढ़ाने के लिए एड़ीचोट का जोर लगा चुके हैं लेकिन आज तक हमारे गांव को सरकारी कागज में शामिल नहीं गया।
वह बताते हैं कि हम तमाम ग्रमीण दर्जनों बार जिला मुख्यालय जाकर धरना प्रदर्शन भी किया लेकिन हमारी सुनवाई कहीं नहीं हुई। वह बताते हैं कि इस बार हम पूरी मुस्तैदी से पूरी तरह से सतर्क हैं कि इस बार भी पिछली बार कि तरह जनगणना कर्मी हमारे गांव ही न आएं।
हालांकि इस बार उनको आशा है कि कर्मी अवश्य ही हमारे गांव में जनगणना कार्य के लिए आएंगे क्योंकि उनका कहना है कि दूसरे गांवों में रहने वाले मेरे आपने संगे-सबंधियों से जानकारी मिली है कि अबूझमाड़ इलाके के आधा दर्जन से अधिक गांवों में जनगणना कार्य चल रहा है।
देश के अन्य भागों की तरह ही अबूझमाड़ के गांवों में भी छत्तीसगढ़ सरकार के कर्मी जनगणना कार्य के लिए पहुंचने लगे हैं। इलाके के संगम गांव निवासी मनकू नेताम ने बताया कि हमारे गांव में दो दिन पहले ही कर्मी आए थे और घर-घर जाकर लोगों से जानकारी एकत्रित कर रहे थे।
हालांकि उनका कहना है कि हमारे गांव तक तो पहुंच मार्ग ठीक-ठाक है इसलिए वे आसानी से आ गए हैं लेकिन मुझे संदेह है कि ये सरकारी कर्मी दूर-दराज इलाकों में बसे गांवों जैसे आमाटोला या बिनागुंडा में इस बार भी पहुंचेंगे या नहीं।
दूसरी ओर राज्य में अबूझमाड़ के अति-दुर्गम और मोओवादी प्रभावित क्षेत्रों में जनगणना का कार्य प्रगति पर है। दुर्गम पहाड़ियों और नदी-नालों को पार कर जनगणना कर्मी इलाके के दूर-दराज हितामपारा, हांदावाड़ा और बेड़मा जैसे गांव में घर-घर जाकर मकानों का सूचीकरण और आवासीय गणना का कार्य पूरा किया है।
दुर्गम इलाकों को देखते हुए वर्तमान चक्र में विशेष सतर्कता बरती जा रही है। हालांकि संगम गांव निवासी मनकू नेताम जनगणना कर्मियों के काम से संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि उनका कहना है कि जिन गांवों में वे अब तक पहुंचे हैं, वास्तव में ये तो बहुत ही जाने माने गांव हैं और इसमें एक में तो वाटरफाल ही है जिसे हमेशा शहर से लोगबाग आते-जाते रहते हैं, ऐसे में यह कहना कि कर्मी दूर-दराज गांव में पहुंच रहे हैं, पूरी तरह से सही नहीं लगता है।
वह कहते हैं कि कायदे से तो सरकार के जनगणना कर्मी को तो अबूझमाड़ के मरकाबेड़ा, डोमंज, कुरकुंज और धूमडू जैसे दूर-दराज गांव में पहुंच कर जनगणना कार्य को अंतिम रूप देना चाहिए न कि सड़क किनारे बसे गांवों को दूर-दराज गांव का दर्जा देना है।