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विकास

खोती जा रही है 'भर्साय' की परंपरा: एक सांस्कृतिक बदलाव

‘भर्साय’ की यह परंपरा हमारे स्थानीय ज्ञान और संस्कृति का हिस्सा रही है

Arun Kumar Gond

  • गांव की पारंपरिक 'भर्साय' प्रणाली, जो कभी सामाजिक मिलन स्थल और आजीविका का स्रोत थी, अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।

  • बाजार के पैक्ड सामानों के चलते इस परंपरा की चमक फीकी पड़ गई है।

  • पहले जहां 'भर्साय' सामूहिक उत्सव का रूप लेती थी, अब मुश्किल से एक-दो ही बची हैं।

तस्वीर में जो प्रक्रिया दिखाई दे रही है, वह हमारे गांव की पारंपरिक “भर्साय (मिट्टी की भट्ठी)” प्रणाली को बहुत ही जीवंत तरीके से प्रस्तुत करती है। इसमें एक मिट्टी का बना चूल्हा/भट्ठी होती है, जिसमें कई गोल-गोल  (मिटटी का मटका या हांडी) बने रहते हैं; जिसमें बालू भरा रहता है। नीचे के गड्ढे में एक लोहे की कढ़ाई होती जिसमे गरम रेत (बालू) और दाना-जैसे चना, मक्का, चावल या अन्य अनाज डाला जाता है।

एक व्यक्ति लकड़ी के सहारे अर्थात् ‘दबिला’ से उसे लगातार चलाता रहता है, ताकि दाने समान रूप से भुन सकें। इस तरह एक-दो बार प्रक्रिया को दोहराने के बाद दाने पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। फिर इन्हें ‘चलना’ से अलग कर लिया जाता है और लोगों से किलो के हिसाब से पैसे या उस भुने हुए अनाज से कुछ हिस्से/भार लिए जाते हैं।

यह पूरी तरह स्थानीय संसाधनों से तैयार की जाती है। इसमें ईंधन के रूप में सूखी लकड़ियाँ, पत्ते और घास-फूस का इस्तेमाल किया जाता है, जिनसे आग जलाकर बालू को गरम किया जाता है। अगर इस पूरी प्रक्रिया को ध्यान से देखें, तो इसमें अधिकतर महिलाओं की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। अर्थात इस प्रक्रिया में महिलांए ज्यादातर सम्मिलित होती हैं। 

हमारे गांव में दाना भूनने की जो परंपरा रही है, जिसे हम लोग आम भाषा में “भर्साय” कहते हैं, वह सिर्फ एक काम नहीं बल्कि हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा रही है। मैं खुद इस समुदाय से हूँ और बचपन से देखता आया हूं कि गाँव में चौदह-पंद्रह जगहों पर भट्ठियाँ/ भर्साय चलती थीं। लोग अपने घर से चना, मक्का या ज्वार लेकर आते थे और गरम बालू में भुनवाते थे। उस समय यह सिर्फ अनाज भूनने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक तरह का सामाजिक मिलन स्थल भी होता था। लोग वहां बैठते, बातें करते, गाँव की खबरें साझा करते और एक अपनापन महसूस होता था।

हम खुद घर से चावल, चना, मूंगफली और अलग-अलग तरह के दाने लेकर भुनाने के लिए जाते थे। यह कोई रोज का काम नहीं होता था, बल्कि हफ्ते में दो या तीन दिन ही भट्ठी जलती थी।

“भर्साय” का दिन अपने आप में एक छोटे से मेले जैसा होता था। गांव के चारों तरफ से लोग वहां आते थे, और सिर्फ हमारे गांव से ही नहीं, बल्कि आस-पास के गांवों से भी लोग पहुंचते थे। यह समय आमतौर पर शाम के तीन बजे से लेकर छः बजे तक चलता था। लोग अलग-अलग विषयों पर बातें करते, एक-दूसरे का हाल-चाल पूछते, और एक तरह की सामूहिकता का अनुभव होता था।

जैसा कि मैंने अपने परिवार और बड़ों से सुना है, कुछ लोगों के पास चार-पांच भट्ठियां तक होती थीं, जो अलग-अलग दिनों में चलती थीं। ऐसे परिवार गांव में आर्थिक रूप से संपन्न/प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाते थे।

बिना किसी बड़ी पूंजी के, केवल मेहनत और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर लोग अपनी आजीविका को मजबूत बनाए रखते थे। लेकिन आज जब मैं उसी परंपरा को देखता हूँ, तो उसकी चमक काफी फीकी पड़ चुकी है। पहले जो “भर्साय” एक सामूहिक उत्सव जैसा लगता था, वह अब लगभग गायब होता जा रहा है। ‘भर्साय’ की संख्या घटकर बहुत कम रह गई है।

उस समय यह कई परिवारों के लिए एक छोटा लेकिन स्थायी रोजगार भी था। बिना ज्यादा पूंजी के, सिर्फ मिट्टी की भट्ठी और मेहनत के दम पर लोग अपनी आजीविका चला लेते थे। लेकिन अब जब मैं अपने गांव को देखता हूं, तो स्थिति काफी बदल चुकी है। अब मुश्किल से एक-दो ‘भर्साय’ बचे हैं। मैं खुद यह बदलाव अपने सामने होते देख रहा हूं। अब लोग बाजार से पैक्ड सामान खरीदने लगे हैं, और ‘भर्साय’ की ओर उनका रुझान कम हो गया है। इसके कारण जो लोग इस काम से जुड़े थे, उन्हें अब दूसरे काम की तलाश करनी पड़ रही है।

यह हमारी संस्कृति और परंपराओं का भी एक अहम हिस्सा रही है। खासकर शादी-ब्याह के समय इसका महत्व और बढ़ जाता है। इस समय “लावा मेरवाने” का एक खास कार्यक्रम होता है, जिसमें भर्साय की बड़ी भूमिका होती है। इस मौके पर चावल को भूनकर लावा (फूला हुआ चावल/भुना हुआ धान) तैयार किया जाता है, जिसे शादी की रस्मों में इस्तेमाल किया जाता है। इस पूरे काम के दौरान महिलाएँ और लोग मिलकर गीत गाते हैं।

भोजपुरिया माहौल में गूंजता हुआ वह गीत-“तोर लउआ, मोर लउआ, एक में मिलाके...” सिर्फ एक गीत नहीं होता, बल्कि दो परिवारों के मिलन और रिश्तों की मिठास को व्यक्त करता है। लेकिन आज यह सब धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। भर्साय की आग के साथ-साथ वे गीत, वह माहौल और वह सामूहिकता भी कहीं खोती जा रही है। अब शादी-ब्याह में भी बहुत कुछ बाजार से तैयार होकर आने लगा है, जिससे इन परंपराओं की चमक फीकी पड़ती जा रही है।

‘भर्साय’ की यह परंपरा हमारे स्थानीय ज्ञान और संस्कृति का हिस्सा रही है, जो अब नई जीवनशैली और बाजार के प्रभाव के कारण कमजोर पड़ती जा रही है। यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्ति के कगार पर है। गांव में अब बहुत कम लोग इस काम को करना चाहते हैं। अब लोग इसे अब सम्मानजनक काम के रूप में नहीं देखते, जबकि मेहनत आज भी उतनी ही लगती है जितनी पहले लगती थी। आज का समाज बाजार, उपभोक्तावाद और तात्कालिक सुविधा की ओर बढ़ रहा है। लोग अब तुरंत मिलने वाले पैक्ड और ब्रांडेड खाद्य पदार्थों को अधिक पसंद करने लगे हैं।

वैसे यह परंपरा प्रकृति के बहुत करीब रही है। इसमें मिट्टी की भट्ठी, सूखी लकड़ियाँ, पत्ते और घास-फूस जैसे प्राकृतिक साधनों का उपयोग होता है। यह एक तरह से सस्टेनेबल और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली का उदाहरण रहा है। लेकिन आज के नए विकल्प भले ही सुविधाजनक हों, वे हमें प्रकृति से दूर ले जा रहे हैं।

 [लेखकसमाजशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में शोध छात्र हैं)