23 अक्टूबर को झड़पें शुरू होने से पहले सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ। 
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अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी को बचाने की लड़ाई, आदिवासी समुदायों ने उठाई आवाज

यूथ फॉर हिमालय की ओर से आयोजित ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधियों ने कई आरोप लगाए

DTE Staff

अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में प्रस्तावित 11,500 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदायों का विरोध तेज हो गया है। परियोजना के विरोध में 23 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के बाद क्षेत्र में तनाव बना हुआ है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के साथ हिंसा की, युवाओं को गिरफ्तार किया और शांतिपूर्ण विरोध की आवाज दबाने के लिए कठोर कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

यूथ फॉर हिमालय की ओर से आयोजित ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधियों ने ये आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित बांध से उनकी पैतृक जमीन, आजीविका, सांस्कृतिक विरासत और नदी आधारित जीवन पर गंभीर असर पड़ सकता है।

सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम (एसआईएफएफ) के प्रवक्ता तागोरी मिजे ने कहा कि बांध परियोजना के बारे में स्थानीय समुदायों और व्यक्तिगत जमीन मालिकों को न तो उचित जानकारी दी गई और न ही उनसे सहमति लेने के लिए सार्थक परामर्श किया गया। उनका आरोप है कि लोगों को गुमराह कर हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं, ताकि परियोजना के पक्ष में बहुमत की सहमति दिखाई जा सके।

मिजे ने कहा कि समुदाय के लोग कई बार सरकारी प्रतिनिधियों के सामने अपनी चिंताएं रख चुके हैं, लेकिन उनकी आशंकाओं को दूर करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ। उन्होंने कहा, "हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों के खिलाफ इस जमीन की रक्षा की थी। हमें भारतीय होने पर गर्व है, लेकिन हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है, मानो हम इस देश का हिस्सा ही नहीं हैं।"

फसल कटाई के मौसम में किसानों की आवाजाही प्रभावित

एसआईएफएफ की युवा शाखा के महासचिव दुबित सिरम ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अभी फसल कटाई का मौसम है, लेकिन किसानों को भी समूह में अपने खेतों तक जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है। इससे उनकी कृषि गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।

सिरम ने एक बुजुर्ग महिला के साथ कथित पुलिस हिंसा का मामला भी उठाया। उनके मुताबिक, 60 वर्ष से अधिक उम्र की एक महिला खेत जाते समय लाठीचार्ज की चपेट में आ गई। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उसके साथ मारपीट की, जिससे उसकी दो पसलियां टूट गईं। बाद में एक्सरे जांच में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि घायल होने के बावजूद महिला को न्यायिक हिरासत में रखा गया।

सिरम के अनुसार, अपर सियांग जिले के गेकू क्षेत्र में एक व्यक्ति के खिलाफ 19 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं। उन्होंने दावा किया कि बांध का विरोध करने के कारण सियांग जिले में नौ गांव बुराओं को उनके पद से हटा दिया गया या निलंबित कर दिया गया है।

मां जैसी है सियांग नदी

स्थानीय समुदायों का विरोध लगभग चार दशक पुराना है। आदि समुदाय के लोग सियांग नदी को 'आने सियांग' यानी मां सियांग कहते हैं। उनका जीवन, कृषि, धार्मिक मान्यताएं और सांस्कृतिक परंपराएं इस नदी और आसपास के जंगलों से गहराई से जुड़ी हैं।

समुदायों को आशंका है कि परियोजना से बड़े पैमाने पर विस्थापन, पैतृक जमीन का डूबना और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव हो सकता है। उनका कहना है कि यह केवल बिजली उत्पादन या बुनियादी ढांचे के विकास का सवाल नहीं है, बल्कि उनके भविष्य और अपनी जमीन पर अधिकार से जुड़ा मामला है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में अरुणाचल प्रदेश टाइम्स की डिप्टी एडिटर टोंगम रीना का बयान भी साझा किया गया। उन्होंने कहा कि सियांग केवल एक नदी नहीं, बल्कि पूरे आदि समुदाय की पहचान है। उनके मुताबिक, क्षेत्र के सैन्यीकरण से लोगों का प्रतिरोध खत्म नहीं होगा।

एनएचपीसी के मीडिया प्रचार पर भी सवाल

प्रेस कॉन्फ्रेंस में भानु तातक के खिलाफ एफसीआरए उल्लंघन से जुड़े सीबीआई मामले की मीडिया कवरेज पर भी सवाल उठाए गए। भानु तातक वकील और शोधकर्ता हैं तथा एसआईएफएफ की कानूनी सलाहकार भी हैं। आयोजकों का आरोप है कि आंदोलन को विदेशी फंडिंग से जोड़कर स्थानीय लोगों की चिंताओं से ध्यान भटकाया जा रहा है।

अरुणाचल टाइम्स में बेंगिया आजुम की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया गया कि बांध की प्रस्तावक कंपनी एनएचपीसी ने मीडिया संस्थानों और डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स के प्रचार पर 10.9 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।

आंदोलनकारियों की तीन प्रमुख मांगें

प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में वक्ताओं ने गिरफ्तार किए गए सभी लोगों की तत्काल रिहाई, आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने और क्षेत्र से अर्धसैनिक बलों की तैनाती समाप्त करने की मांग की। उन्होंने सरकार से प्रभावित समुदायों के साथ बातचीत शुरू करने और परियोजना से जुड़े फैसलों में उनकी सहमति एवं अधिकारों को महत्व देने की अपील की।

वक्ताओं ने कहा कि सियांग घाटी का संघर्ष केवल अरुणाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है। हिमालय के दूसरे हिस्सों में भी बड़ी जलविद्युत और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण विस्थापन, पारिस्थितिक सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। नेपाल की विनाशकारी बाढ़ और सिक्किम की तीस्ता घाटी में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जैसी घटनाएं हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में विकास परियोजनाओं की गहन समीक्षा की जरूरत को रेखांकित करती हैं।