सोरित / सीएसई
विकास

बैठे ठाले: कथा सावित्री सत्यवान की

“सावित्री-सत्यवान ने राजधानी में कई निजी अस्पताल और निजी स्कूल खोले और सुखपूर्वक रहने लगे”

Sorit Gupto

सत्यवान बीमार पड़ गया। बीमार पड़ने पर आम भारतीय के सामने दो विकल्प होते हैं। पहला, वह सरकारी अस्पताल की ओर कूच करे और बगैर इलाज के मर जाए।

दूसरा, वह निजी अस्पताल की ओर कूच करे और गलत इलाज से मर जाए और मरने के बाद अपनी सात पुश्तों के सिर पर भारी कर्ज लाद जाए। सत्यवान ने दूसरा विकल्प चुना क्योंकि किसी से उसने सुना था कि निजी अस्पतालों में गरीबों का मुफ्त इलाज होता है।

सत्यवान के गरीब होने के प्रमाण-पत्र को पाने के लिए सावित्री ने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे, स्थानीय कॉर्पोरेटर से लेकर सांसद तक के जनता दरबार में गुहार लगाई पर जब तक उसके गरीब होने का प्रमाणपत्र मिलता, तब तक सत्यवान चल बसा।

सत्यवान वास्तव में मर चुका है, इस बात के सत्यापन के लिए अस्पताल ने सौ डेढ़ सौ जरूरी टेस्ट किए।

मरने पर यमराज आ गए और सत्यवान को लेकर जाने लगे, पर किसी ने उनका रास्ता रोक लिया। रास्ता सावित्री ने नहीं बल्कि अस्पताल के कैशियर ने रोका था। उसके हाथ में एक बिल था, जिसके मुताबिक सत्यवान के जरूरी टेस्ट के चलते कुछ पचास-साठ लाख रुपए का बिल बना था जिसके भुगतान के बगैर सत्यवान को यमराज नहीं ले जा सकते थे।

अंतत: यमराज ने अपनी सोने की गदा गिरवी रखकर बिल का भुगतान किया और सत्यवान को यमलोक की ओर ले जाने लगे, थोड़ी दूर चलने पर उन्हें लगा कोई उनका पीछा कर रहा है, पीछे देखा तो सावित्री थी।

“सावित्री तुम?” यमराज चौंके।

“हां, यमराज मैं। मैं भला सत्यवान को छोड़कर कैसे रह पाऊंगी?” सावित्री ने कहा।

“सावित्री मेरा रास्ता छोड़ दो वर्ना सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में तुमको अंदर कर दूंगा।” यमराज ने डराने की कोशिश की पर सावित्री पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

“इसके सिवा मेरा कोई नहीं है यमराज।” सावित्री ने कहा।

“क्यों, तुम्हारे मां-बाप का घर तो हैं” यमराज ने जवाब दिया।

“नहीं प्रभु, हमने भागकर शादी की थी। घर गई तो मेरी ऑनर किलिंग हो जाएगी!” सावित्री ने कहा।

यमराज बोले, “डियर सवि! मैं एक सरकारी मुलाजिम हूं। मेरे पास ऊपर से तुम्हारे लिए आदेश नहीं है। चलो एक सौदा करते हैं, सत्यवान के बदले तीन वरदान मांग लो।”

सावित्री ने कहा, “पहला वर यह दें कि मैं इस निजी अस्पताल के खिलाफ मेडिको-लीगल केस कर 1,000-2,000 करोड़ रुपए का दावा जीत जाऊं।”

“तथास्तु! बोलो तुम्हें दूसरा वर क्या चाहिए।”

“प्रभु मुझे दूसरा वर यह दें कि हमारा बेटा यानी मेरे और सत्यवान के बेटे का दाखिला, साउथ-दिल्ली के किसी पॉश इन्टरनेशनल स्कूल में हो जाए” सावित्री ने कहा।

“यह बहुत मुश्किल डिमांड है सावित्री” यमराज ने मायूस होकर कहा।

यमराज को अब इस मांग को पूरा करने के लिए अपना मुकुट, सोने को गिरवी रखना पड़ा और बाकी पैसों का इंतजाम एडवांस सैलरी लेकर करना पड़ा।

“लो सावित्री यह रही तुम्हारे बेटे के दाखिले की रसीद।”

यमराज ने कहा, “अब तो जाने दो।”

यमराज ने खुशी-खुशी सत्यवान को लेकर यमलोक की ओर पहला कदम बढ़ाया ही था कि सावित्री ने फिर से रोक लिया।

“अब क्या है सावित्री” यमराज ने खीझकर कहा।

“प्रभु! सत्यवान को ले जाओगे तो हमारा बेटा कहां से आएगा?” सावित्री ने मासूमियत से पूछा।

अब यमराज को अपनी भूल का पता चला। उन्हें गदा और मुकुट गिरवी रखने, एडवांस सैलरी के बोझ के बाद भी सावित्री को सत्यवान लौटाना पड़ा।

कहते हैं उन पैसों से सावित्री-सत्यवान ने राजधानी में कई निजी अस्पताल और निजी स्कूल खोले और सुखपूर्वक रहने लगे।