एयरपोर्ट से दरबार तक वह कुल बीस लेन की सड़क थी। अभी पिछले महीने स्वयं सुल्तान इसका उद्घाटन कर विदेश यात्रा पर गए थे और आज ही वह वापस लौट रहे थे। सड़क की उन्नीस लेन को घेरकर सुल्तान की गाड़ियों का कारवां आ रहा था। बाकी बची एक लेन पर ट्रैफिक की रेलमपेल मची हुई थी। सुल्तान ने पूछा, “इतनी भीड़ क्यों है? ये कौन लोग हैं?”
“सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक!” गृह मंत्री बोले, “यह तो आम जनता है जिन के लिए पूरी एक लेन को छोड़ रखा है। आप इनके प्रतिनिधि हैं, इसलिए हम केवल उन्नीस लेनों से अपना काम चला रहे हैं।”
इससे पहले कि बात आगे बढ़कर किसी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे तक आती, सामने ट्रैफिक डायवर्जन का बोर्ड आ गया। सुल्तान ने काली कांच के उस पार देखने की कोशिश की पर सिवाय मेट्रो के खंभे, डंपर, लोडर ट्रक और सीमेंट मिक्सर के अलावा उन्हें कुछ नहीं दिखा। सुल्तान का कारवां थोड़ी दूर चला ही था कि सड़क धंस गई और उनकी कार के अगले पहिए गड्ढे में फंस गए। दरबार तक की बाकी दूरी सुल्तान और उनके दरबारियों को पैदल पूरी करनी पड़ी। दरबार में सन्नाटा पसरा था।
दरबार की कार्रवाई शुरू हुई। सुल्तान ने गुस्से से तमतमा कर पूछा, “यह हो क्या रहा है! कहीं महीने भर पहले बनी सड़क धंस रही है तो कहीं ट्रैफिक डायवर्जन तो कहीं मेट्रो का बोर्ड। कहीं डंपर तो कहीं पर लोडर! मैंने विदेशों में कहीं भी इतनी बदहाल सड़क नहीं देखी?”
दीवान-ए-आरिज यानी रक्षा मंत्री बोले, “सुल्तान जी! लगता है, हमारी सड़कों को किसी की नजर लग गई है। हमें अपने हाइवे के किनारे नींबू और मिर्ची के पेड़ों की कतारें लगानी चाहिए।”
दीवान-ए-विजारत अर्थात् वित्त मंत्री ने कहा, “सुल्तान, हमारी सड़कें खराब नहीं हैं बल्कि विदेशों की सड़कें अच्छी हैं!’
शिक्षा मंत्री ने कहा, “लगता है, सड़कों के टेंडर के पेपर लीक हो गए हैं!”
परिवहन मंत्री ने कहा, “सुल्तान, हमें सड़कों पर मानहानि का मुकदमा कर देना चाहिए!”
यह सुनकर दरबार में उपस्थित काजी-उल-कुजात यानी मुख्य न्यायाधीश इब्न बतूता ने मन ही मन सोचा कि अब उन्हें अपनी विश्व यात्रा फिर शुरू कर देनी चाहिए।
सुल्तान के चेहरे से साफ झलक रहा था कि उन्हें कोई भी आइडिया पसंद नहीं आ रहा है। उन्होंने चीख कर कहा, “तुमसे न हो पाएगा! अब मुझे ही कुछ करना होगा।”
कहते हैं वह कोई आठ तारीख की रात थी। ठीक आठ बजे सुल्तान ने घोषणा की, “हम चाहते हैं कि शहर-ए-दिल्ली को विकास के लिए खुला छोड़ दिया जाए। जल-विभाग, सीवर-विभाग, बिजली विभाग जिसको जहां जितने गढ्ढे खोदने हों, उन्हें खोद लेने दिया जाए। पीडब्ल्यूडी विभाग को जितनी सड़कें-फ्लाईओवर बनाने हों, वे बना लें। हम डिस्टर्ब नहीं करेंगे। करो जहां-जहां विकास करने का मन करे, खूब विकास करो। कोई इन्हें डिस्टर्ब नहीं करेगा। तब तक हम अपनी राजधानी को शिफ्ट कर लेते हैं। जब इनका मन विकास से ऊब जाएगा, तब वह हमें बता दें, हम वापस आ जाएंगे। आज रात बारह बजे राजधानी को दिल्ली से शिफ्ट करके दौलताबाद ले जाया जाएगा!”
दरबारी इतिहासकार बरनी ने इसे सुल्तान का मास्टर-स्ट्रोक बताया है।
भला जो रौनक दिल्ली में है, वह दौलताबाद में कहां? सो सुल्तान कुछेक साल बाद अपनी रियाया को लेकर वापस दिल्ली लौट आए। पर यह क्या? सुल्तान ने पाया कि दिल्ली में मुहल्ले-दर-मुहल्ले बुलडोजर चलने लगे थे। देखकर लगता था कि हाल ही में दिल्ली पर घनघोर बमबारी हुई है। यह सब देख कर सुल्तान का मन दिल्ली से ऊब सा गया। वह अब ज्यादातर समय विदेशी दौरों पर बिताने लगे।
तारीख-ए-फिरोजशाही में इतिहासकार जीआउद्दीन बरनी कहते हैं कि सुल्तान को अपने वतन और खासकर अपनी रियाया से बहुत प्रेम था, इसलिए सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक कभी कभार स्वदेश की यात्रा पर भी आते रहते थे।