ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के निर्माण के दौरान रुद्रप्रयाग जिले के जवाड़ी गांव स्थित चोपड़ा गदेरे में डाले गए मलबे को अब तक पूरी तरह नहीं हटाया गया है। इतना ही नहीं, मलबा पूरी तरह हटाए जाने से पहले ही प्रभावित क्षेत्र में ढलान स्थिरीकरण का काम शुरू कर दिया गया है।
यह बात उत्तराखंड वन विभाग की ओर से राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल एक हलफनामे में सामने आई है।
हलफनामे के मुताबिक, विशेषज्ञ समिति की 5 अक्टूबर 2026 को हुई बैठक में रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) ने बताया कि चोपड़ा गदेरे से करीब 69,000 घन मीटर मलबा हटाया जा चुका है। लेकिन समिति ने स्पष्ट किया कि स्वीकृत विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) के अनुसार पूरा मलबा अभी नहीं हटाया गया है। समिति ने यह भी पाया कि मलबा हटाने का काम पूरा होने से पहले ही ढलान को स्थिर करने के उपाय शुरू कर दिए गए थे।
विशेषज्ञ समिति ने स्वीकृत डीपीआर में दिए गए स्थल के खंडवार चित्रों और वास्तविक स्थिति की तुलना भी की है। इसमें दोनों के बीच अंतर पाया गया। आरवीएनएल ने इसके लिए कुछ प्राकृतिक आपदाओं के कारण काम में बदलाव की जरूरत पड़ने की बात कही। समिति ने निगम को निर्देश दिया कि वह स्वीकृत डीपीआर के चित्रों और मौके की वास्तविक स्थिति में अंतर का विस्तृत औचित्य तथा स्थल से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत करे।
अतिरिक्त वन भूमि को भी पहुंचा नुकसान
वन विभाग के हलफनामे में बताया गया है कि मलबा निस्तारण के लिए प्रस्तावित या चिन्हित 0.8511 हेक्टेयर सिविल वन भूमि के अलावा 0.4589 हेक्टेयर अतिरिक्त सिविल वन भूमि पर भी मलबा डाला गया था। इस तरह चिन्हित भूमि के अतिरिक्त वन भूमि को नुकसान पहुंचने का मामला भी सामने आया। हलफनामे के अनुसार, दक्षिण जखोली रेंज के संबंधित वन कार्यालय ने पर्यावरणीय नुकसान का आकलन किया है और इस मामले में परियोजना संचालकों पर 4,61,291 रुपये का जुर्माना लगाया है।
वन विभाग ने भविष्य में वन भूमि पर मलबा डालने से पहले जरूरी वैधानिक मंजूरी लेने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, चोपड़ा गदेरे के उस जलग्रहण क्षेत्र को भी पुनरुद्धार योजना में शामिल किया गया है, जो आरक्षित वन क्षेत्र में आता है। यहां वनीकरण, प्राकृतिक पुनर्जनन और जल संरक्षण के काम वन विभाग को करने हैं।
2.03 करोड़ रुपये के काम का बंटवारा
एनजीटी ने 16 जुलाई 2026 के आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि चोपड़ा गदेरे के पुनरुद्धार और पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए विशेषज्ञ समिति को 2,03,96,111 रुपये उपलब्ध कराने के संबंध में जरूरी निर्देश जारी किए जाएं। इस राशि के इस्तेमाल को लेकर 5 अक्टूबर 2026 को हुई विशेषज्ञ समिति की बैठक में तय किया गया कि सभी काम सीधे समिति के जिम्मे देने के बजाय उन्हें उनकी प्रकृति के अनुसार संबंधित एजेंसियों को सौंपा जाए। इसके तहत वनीकरण, प्राकृतिक पुनर्जनन और वन क्षेत्र से जुड़े काम रुद्रप्रयाग वन प्रभाग करेगा, जबकि प्रभावित क्षेत्र के पुनरुद्धार और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए जरूरी इंजीनियरिंग कार्य आरवीएनएल करेगा।
समिति ने रुद्रप्रयाग वन प्रभाग और आरवीएनएल के अधिकारियों को इन कामों और उनकी लागत का आकलन करने के निर्देश भी दिए। इसके बाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के देहरादून स्थित क्षेत्रीय कार्यालय ने 28 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर संबंधित एजेंसियों को राशि आवंटित करने के लिए जरूरी निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है।
आरवीएनएल और निर्माण कंपनी जिम्मेदार
यह मामला जवाड़ी गांव के निवासी और ग्राम विकास समिति उत्यासू के अध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट की 10 अगस्त 2023 की शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के निर्माण के दौरान चोपड़ा गदेरे में जरूरी वैधानिक मंजूरियों के बिना मलबा डाला गया। इससे गदेरे और आसपास के क्षेत्र को नुकसान पहुंचा तथा स्थानीय लोगों के उपयोग में आने वाला जल क्षेत्र प्रभावित हुआ।
एनजीटी ने सात मार्च 2024 को इस शिकायत पर मूल आवेदन संख्या 44/2024 के रूप में सुनवाई शुरू की थी। बाद में 18 दिसंबर 2025 के अंतिम आदेश में अधिकरण ने कहा कि आरवीएनएल और निर्माण कंपनी मेघा इंजीनियरिंग एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एमईआईएल) मलबा डालने से चोपड़ा गदेरे और आसपास के क्षेत्र को हुए पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार हैं।
अधिकरण ने दोनों कंपनियों को स्वीकृत पर्यावरण प्रबंधन योजना और पर्यावरणीय मानकों के अनुसार मलबे का दोबारा उपयोग तथा अतिरिक्त मलबे को उचित स्थान पर ले जाने का निर्देश दिया था। साथ ही, ग्राम पंचायत और संबंधित विभागों तथा विशेषज्ञ समिति से परामर्श करके चोपड़ा गदेरे के पुनरुद्धार और पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई की कार्ययोजना तैयार करने को कहा था।
अधिकरण ने 2,03,96,111 रुपये की राशि को राजस्व के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय इसी पुनरुद्धार कार्य में खर्च करने का निर्देश दिया था। अब वन विभाग के हलफनामे और विशेषज्ञ समिति की बैठक के कार्यवृत्त से स्पष्ट है कि मलबा हटाने का काम अभी पूरा नहीं हुआ है और स्वीकृत डीपीआर तथा मौके की स्थिति में अंतर को लेकर आरवीएनएल से स्पष्टीकरण मांगा गया है।