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सरदार सरोवर समझौते पर सवाल: मेधा पाटकर ने कहा, गुजरात ने बढ़ा मुआवजा देने से इंकार किया

सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ने से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में बढ़े डूब क्षेत्र, वन भूमि और सरकारी जमीन की भरपाई को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है

Anil Ashwani Sharma

‘‘सरदार सरोवर परियोजना के कारण मध्यप्रदेश में जलमग्न हुई वन भूमि, शासकीय भूमि तथा अन्य सार्वजनिक संसाधनों की भरपाई का बढ़ा हुआ मुआवजा गुजरात सरकार ने न केवल देने से इंकार कर दिया है बल्कि अब नए समझौते में गुजरात सरकार को ही मध्य प्रदेश और महाराष्ट सरकार को क्रमश 550 और 27 करोड़ का भुगतान करना तय हुआ है, यह सीधे तौर पर राज्य सरकारों और इस परियोजना से प्रभावितों के अधिकारों का घोर उल्लंघन है।’’ 

यह बात नर्मदा बचाओं आंदोलन की कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने डाउन टू अर्थ से कही। उन्होंने कहा कि यह अचानक कैसे हो गया जबकि पैसा तो पहले गुजरात सरकार को देना था और अब उसी को दूसरे राज्यों को देने की बात कही गई है।

उन्होंने कहा कि हम इसके बारे में केंद्र व राज्य सरकारों के बीच हुई बातचीत के बारे में जानना चाहते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा यह संघीय शासन व्यवस्था में राज्यों के साथ समन्वय करके काम किया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि इस परियोजना के लिए बकायदा एक न्यायाधिकरण गठित हुआ है और अब तक उसी के दिशा-निर्देश के तहत काम होता आया था, ये अचानक सरकारों ने इस प्रकार से समझौता कैसे कर लिया।

ध्यान रहे कि मध्य प्रदेश सरकार ने जलमग्न भूमि और अन्य प्रभावित परिसंपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन कराया और इस पुनर्मूल्यांकन के अनुसार राज्य ने अपने डूब क्षेत्र की भरपाई के दावे को 281.46 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 7,669  करोड़ रुपए किया, क्योंकि पूर्व का मूल्यांकन सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई के 90 मीटर तक के लिए किया गया था जबकि अब यह ऊंचाई 138.86 मीटर कर दी गई है।

ऐसे में इस राशि का बढ़ाना वाजिब है। बांध की ऊंचाई बढ़ाने से मध्य प्रदेश के पूर्व में निर्धारित डूब का क्षेत्र और बढ़ गया है और इसके चलते हजारों आदिवासियों 2019 से ही प्रभावित हो रहे हैं। पाटकर ने सवाल किया है कि 7669 करोड़ रुपए की डूब क्षेत्र की वैध भरपाई तथा पुनर्वास के लिए 2900 करोड़ रुपए के दावे की अनदेखी किस आधार पर की गई है और अब मध्य प्रदेश सरकार हजारों विस्थापितों का पनुर्वास कार्य कैसे करेगी।  

पाटकर ने सरदार सरोवर संबंधी अंतर्राज्यीय विवाद ( मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र व राजस्थान) में केंद्र सरकार की मध्यस्थता से हुए समाधान पर सवाल उठाया है और कहा है कि चारों राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृह व जल संसाधन मंत्री के बीच इस विवाद के हल के बारे में सार्वजिक रूप से जानकारी नहीं दी गई है जबकि इससे हजारों लोग प्रभावित हैं।

उन्हें हक है कि उनके बारे में सरकारों ने आपस में क्या तय किया है। ध्यान रहे कि इस विवाद का समाधान दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री और जल संसाधन मंत्री के साथ चारो ( मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात) राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में हुआ है। इस बैठक में वन टाइम सेटलमेंट हुआ जिसके अनुसार मध्यप्रदेश को ही गुजरात को 550 का भुगतान करना और महाराष्ट्र ने 27 करोड़ का भुगतान करना होगा।

ध्यान रहे कि जब सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 90 मीटर तक 2000 से सीमित थी, तब मध्यप्रदेश सरकार ने परियोजना से होने वाली क्षति के लिए 281.46 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग की थी। इस राशि में वन क्षेत्र के लिए 112.51 करोड़ रुपए, सरकारी भूमि के लिए 157.61 करोड़ रुपए तथा जलमग्न वन भूमि के लिए 11.34 करोड़ रुपए शामिल थे।

इसके बाद बांध की उंचाई 110 और फिर 2014 में ऊंचाई बढ़ाकर 121.892 मीटर तक बढ़ी और 2017 में 138.68 मीटर कर दी गई। बांध की ऊंचाई बढ़ने के साथ मध्यप्रदेश में डूब क्षेत्र का विस्तार होता गया और बड़ी मात्रा में वन भूमि, सरकारी भूमि, कृषि क्षेत्र तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन जलमग्न हुए।

पाटकर ने कहा कि नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के 1979 से लागू रहे प्रावधानों के अनुसार परियोजना से प्रभावित राज्यों के बीच वन भूमि, सरकारी भूमि तथा पुनर्वास से संबंधित दायित्वों का निर्वहन किया जाना अनिवार्य रहा है लेकिन अब इसका लगातार उल्लंघन किया जा रहा है।

उनका कहना है कि अकेले मध्य प्रदेश ही नहीं महाराष्ट्र भी गुजरात सरकार ने भी डूब क्षेत्र के बढ़े हुए क्षेत्रों के लिए महाराष्ट्र शासन ने भी अपनी वन भूमि 6488 हेक्टेयर के बदले में 1,313 करोड़ और पुनर्वास कार्य के लिए 300 करोड़ रुपए की मांग रखी।

ध्यान रहे कि दोनो राज्यों को सरदार सरोवर से मिलने वाला लाभ यानी म.प्र. को 56 प्रतिशत और महाराष्ट्र को 27 प्रतिशत बांध से निर्मित बिजली का लाभ अब तक नहीं मिलने पर दोनों राज्यों 900 और 450 करोड़ रुपए अतिरिक्त भरपाई की मांग भी की है।    

पाटकर का कहना है कि मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के वैध वित्तीय और पुनर्वास संबंधी अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता राज्य और उसके लाखों प्रभावित नागरिकों के हितों के प्रतिकूल नहीं होना चाहिए।

साथ ही उनका कहना है कि मध्यप्रदेश सरकार को राज्य के 7,669 करोड़ रुपए के वैध भरपाई और हजारों विस्थापित परिवारों के पूर्ण और न्यायसंगत पुनर्वास के लिए दृढ़ता से गुजरात सरकार के सामने वित्तीय सहायता का अपना पक्ष रखना चाहिए और इसके लिए राज्य सरकार को आवश्यक होने पर उपलब्ध सभी वैधानिक और संवैधानिक उपायों का उपयोग करना चाहिए।