जी7 देशों के पर्यावरण मंत्रियों की अहम बैठक संपन्न 
विकास

पेरिस जी7 बैठक: 40 फीसदी भूमि क्षरण, 3.2 अरब लोग प्रभावित; भूमि सुधार व निवेश बढ़ाने पर जोर

जी7 पर्यावरण मंत्रियों ने मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे को वैश्विक सुरक्षा जोखिम मानते हुए भूमि पुनर्स्थापन, सूखा-रोधी क्षमता और सतत भूमि प्रबंधन के लिए ठोस कदम व समन्वित वित्तीय निवेश बढ़ाने पर सहमति जताई

DTE Staff

पेरिस में 23–24 अप्रैल को हुई जी7 देशों की पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे को वैश्विक स्तर की गंभीर चुनौतियों और सुरक्षा जोखिम बढ़ाने वाले कारकों के रूप में मान्यता दी गई।

मंत्रियों ने भूमि पुनर्स्थापन, सूखा-प्रतिरोधक क्षमता और सतत भूमि प्रबंधन को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने का संकल्प लिया।

मंत्रियों ने माना कि ये आपस में जुड़े संकट पहले ही पारिस्थितिकी तंत्र, आजीविका, खाद्य और जल सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं। इसका असर आर्थिक स्थिरता और शांति पर भी पड़ रहा है, खासकर उन क्षेत्रों में जो पहले से ही नाजुक या संघर्ष से प्रभावित हैं।

संयुक्त घोषणा में इस बात पर जोर दिया गया कि भूमि क्षरण और सुरक्षा के बीच गहरा संबंध है, क्योंकि पर्यावरणीय दबाव संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा बढ़ा रहे हैं, लोगों के विस्थापन को बढ़ावा दे रहे हैं और अस्थिरता के खतरे को गहरा कर रहे हैं।

मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र संधि यानी यूएनसीसीडी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि पिछले 60 वर्षों में देशों के भीतर होने वाले 40 प्रतिशत से अधिक संघर्ष जमीन और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हुए हैं।

वहीं, दुनिया की करीब 40 प्रतिशत भूमि पहले ही क्षरण की चपेट में है, जिससे हर साल लगभग 900 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। इसका असर खाद्य प्रणालियों, जल उपलब्धता, अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ रहा है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि करीब 3.2 अरब लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं जो भूमि क्षरण से प्रभावित हैं। इसके बावजूद भूमि सुधार और सूखा प्रबंधन में निवेश अभी भी पर्याप्त नहीं है और बिखरा हुआ है।

मंत्रियों ने सार्वजनिक और निजी वित्त के बेहतर तालमेल और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाने की जरूरत बताई।

इसी दिशा में फ्रांस की अध्यक्षता में “नेचर एंड पीपुल फाइनेंस अलायंस” जैसी पहल की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य प्रकृति और पारिस्थितिकी तंत्र में निवेश बढ़ाना है।

इस पूरी प्रक्रिया में यूएनसीसीडी की केंद्रीय भूमिका को दोहराया गया। इस घोषणा का स्वागत करते हुए यूएनसीसीडी की कार्यकारी सचिव यास्मीन फौद ने कहा कि अब राजनीतिक घोषणाओं को जमीन पर लागू करना जरूरी है।

उन्होंने कहा, “भूमि क्षरण और सूखा अब हाशिए के मुद्दे नहीं रहे, बल्कि ये लाखों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं। वे क्या उगा सकते हैं, क्या खा सकते हैं और क्या अपनी जमीन पर रह सकते हैं या नहीं।”

फौद ने जोर देते हुए कहा कि भूमि का पुनर्स्थापन शांति, स्थिरता और लचीलेपन में निवेश है, लेकिन इसके लिए वित्त और साझेदारी को भी उतना ही मजबूत करना होगा।

आगे की दिशा तय करते हुए उन्होंने कहा कि अगस्त 2026 में मंगोलिया में होने वाला UNCCD का कॉप 17 सम्मेलन बेहद अहम होगा। उन्होंने कहा कि कॉ17 वह मौका होना चाहिए जब भूमि सुधार और सूखे से निपटने के वादे जमीन पर दिखाई देने वाले नतीजों में बदलें, खासकर सबसे कमजोर क्षेत्रों में जरूर होना चाहिए।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह सम्मेलन भूमि के मुद्दे को वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी चर्चाओं के केंद्र में लाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, ताकि इसे एक रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में स्वीकार किया जा सके।