बीते 22 अप्रैल का दिन, हर साल की भांति, इस साल भी धरती माता को समर्पित रहा। हर साल पृथ्वी दिवस पर हम समझते है कि हर व्यक्ति कुछ अपनी आदत बदले, तभी पर्यावरणीय संकट से निजात मिल सकती है; लाइट बंद कीजिए, पानी बचाइए, कचरा अलग कीजिए, कपड़े सोच‑समझकर खरीदिए, कार की जगह बस और मेट्रो का इस्तेमाल कीजिए, आदि। इस साल तो पृथ्वी दिवस का वैश्विक आह्वान ही “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” था, जो साफ़‑साफ़ कहता है कि धरती को बचाने की असली शक्ति आम लोगों और समुदायों के पास है, ग्रह को बचाने की ताक़त हमारे हाथों में है।
आम लोगों धरती पर मानव अस्तित्व बचाने के लिए आगे आ रहे है, वही बड़े पैमाने पर आर्थिक नीतियाँ, बाज़ार और बुनियादी ढाँचे अब भी उसी पुराने ढर्रे पर ही हैं जो ज़्यादा खपत, ज़्यादा मुनाफ़ा और ज़्यादा संसाधन के दोहन को “सामान्य” मानता है। सरकारें और वाणिज्यिक ईकाइयाँ नए जीवाश्म ईंधन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे रही हैं, पर्यावरणीय मानकों को नए नए गढ़े बहाने से कमजोर कर रही हैं, और ऐसे उत्पाद और शहर डिज़ाइन कर रही हैं जिनमें संसाधनों की बर्बादी और प्रदूषण पहले से ही इनबिल्ट है। सवाल यह नहीं है कि व्यक्तिगत प्रयास महत्वपूर्ण हैं या नहीं, वो तो हैं ही; सवाल यह है कि क्या हम व्यक्तियों पर वह नैतिक और व्यावहारिक बोझ डाल रहे हैं जिसे वास्तव में नीति, बाज़ार और बुनियादी ढांचा व्यवस्थाओं को उठाना चाहिए। सवाल यह भी है कि ज़िम्मेदारी सच में किसकी ज़्यादा है; एक आम व्यक्ति की, या उन सारी व्यवस्थाओं की जो आम लोगो की आदतें, उनका रहन-सहन, उपभोक्ता प्रवृतियों तय करती हैं?
जब टिकाऊ ना होना ही डिज़ाइन हो
उपभोक्ता से उम्मीद बांधी जा रही है कि वो कम खरीदे, सोच‑समझकर खरीदे, चीज़ों को ज़्यादा समय तक इस्तेमाल करे। लेकिन जो चीज़ें बाज़ार में मिल रही हैं, वे खुद कितनी “चलने वाली” हैं? इस विरोधाभास को समझने का एक सीधा तरीका है कि अपने आसपास की चीज़ों को ध्यान से देखिए। आज के ज़्यादातर उपभोक्ता उत्पाद जैसे मोबाइल फोन, लैपटॉप, वाशिंग मशीन, प्रिंटर, गैजेट सब के सब बड़े पैमाने में ‘प्लांड ऑब्सोलेसेंस’ के सिद्धांत पर बनाये जाते हैं। मतलब, इन्हें इस तरह बनाया जाता है कि इनकी उम्र कम हो, बैटरी और पार्ट्स (सील्ड बैटरी, ना खुलने वाले ना बदल सकने वाले पार्ट्स), सॉफ़्टवेयर अपडेट कुछ साल बाद बंद हो जाएं और थोड़ी‑सी खराबी पर इन्हें रीसाइकल या कबाड़ में भेजने के अलावा दूसरा विकल्प ही न बचे।
यह कोई तकनीकी मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोचा‑समझा आर्थिक मॉडल है, “जितनी जल्दी ख़राब हो, उतनी जल्दी नया बिके।” कंपनियों की कमाई ‘टिकाऊ सामान बनाने’ पर नहीं, ‘बार‑बार बेचने’ पर टिकी है; जो कंपनी सालों‑साल चलने वाली चीज़ बनाएगी, उसकी बिक्री धीमी पड़ेगी और शेयर बाज़ार उसे “कमज़ोर” मान लेगा। नतीजा यह है कि दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक, उपभोक्ता बस्तुओं, कपड़ो और प्लास्टिक कचरा पहाड़ की तरह बढ़ रहा है।
लेकिन इसके बावजूद जागरूकता अभियान या विज्ञापन अक्सर वहीं से शुरू होते हैं जहां सबसे कम प्रभाव संभव है, व्यक्तिगत नैतिकता से: “ग्रीन” प्रोडक्ट खरीदिए, जिम्मेदारी से खरीदिए, सही ढंग से फेंकिए, कम चीजें लीजिए, ई-वेस्ट सही जगह जमा कराइए। पृथ्वी दिवस के अभियान हमें बताते हैं कि अगर हम मोबाइल या कपड़े सोच-समझकर खरीदें, तो कचरा कम होगा। यह बात शतप्रतिशत सही भी है, पर सवाल यह है कि उपभोक्ता के पास वास्तव में विकल्प कितने हैं? अगर बाज़ार ही ऐसे उत्पादों से भरा हो जिनका खराब होना और न-मरम्मत योग्य होना पहले से तय है, तो “जिम्मेदार उपभोग" की नैतिकता सिर्फ वर्तमान आर्थिक ढांचे को बचाने का ज़रिया से ज्यादा कुछ नहीं है।
जब तक सारा आर्थिक ढांचा ही एक बार इस्तेमाल और जल्दी खराब होने वाली चीज़ों पर टिका रहेगा, तब तक आम आदमी की “अच्छी आदतें” सिर्फ़ लक्ष्ण का इलाज है, आसन्न पर्यावरणीय संकट का नहीं।
घर का नल, खेत की नहर या फ़ैक्टरी की नाली
पानी बचाने की बात आए तो ज़्यादातर उदाहरण हमारे बाथरूम और रसोई से शुरू होते हैं ब्रश करते समय नल मत चलने दीजिए, बाल्टी से नहाइए, पाइप से गाड़ी मत धोइए। यह सब बहुत जरूरी है, लेकिन पूरी तस्वीर इससे कहीं बड़ी है, जो आम विमर्श से गायब हैं। दुनिया का मोटे तौर पर ज़्यादा हिस्सा खेती किसानी में खेती में खर्चता है, दूसरा बड़ा हिस्सा उद्योग में, और घरेलू इस्तेमाल का हिस्सा कुल मिलाकर एक दशांश ही है। घर का फिज़ूल बहाया पानी निश्चित रूप से बचना चाहिए, पर अगर पूरी दुनिया के हर घर का नल तुरंत अनुशासित भी हो जाए, तो भी कुल पानी की खपत में जो बदलाव आएगा, वह शायद प्रतिशत से ज्यादा ना हो।
इसके उलट, जिन नहरों से सिंचाई होती है, जिन शहरों की पाइपलाइनें दशकों पुरानी हों; वे ही लीकेज से भरी हों; जिन कारखानों का गंदा पानी बिना ठीक से साफ किए नदी में डाला जाता हो, वहाँ जो बर्बादी और प्रदूषण होता है, उसका पैमाना घरेलू स्तर की तुलना में कई गुना बड़ा है। लेकिन टीवी पर जो चित्र उभरते हैं, वे प्रायः टूथब्रश करते बच्चे और टपकते नल हैं, न कि लीकेज से भरी नहरें या रात के अंधेरे में बहते फ़ैक्टरी के नाले या फिर आर्थिक विकास के लिए पर्यावरणीय नीति के साथ छेड़ छाड़।
ऊर्जा के मामले में भी यही कहानी दोहराई जाती है। उर्जा संरक्षण का सारा विमर्श पंखा‑लाइट कमरे से निकलते समय बंद करिए, एसी का तापमान थोड़ा बढ़ाइए, बेकार चार्जर न लगे रहने दीजिए तक समेत लिया जाता हैं। सब जरुरी सलाहें हैं, पर यह भी तथ्य है कि घरों की हिस्सेदारी वैश्विक ऊर्जा खपत में और बर्बादी में नगण्य है; बड़ा हिस्सा उद्योगों, परिवहन और बड़े वाणिज्यिक ढांचों का है। शहरों में अनगिनत बड़े-बड़े विज्ञापन में रात भर जगमगाते बिल बोर्ड, जरुरत से ज्यादा चमकते दमकते हमारे आधुनिक स्मार्ट शहर याद तो है ना! अगर दुनिया का हर घर एकदम आदर्श बन जाए, तो कुल ऊर्जा खपत में 5-8 प्रतिशत का सुधार तो ज़रूर होगा, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं पलटेगी। असली कहानी वहाँ चल रही है जहाँ स्टील, सीमेंट, केमिकल, डेटा सेंटर, विमान और मालवाहक जहाज़ 90 प्रतिशत तक ऊर्जा गटक रहे हैं और वहाँ अक्सर उर्जा संरक्षण की बात व्यवहारिक सुधार से ज़्यादा मुनाफ़े और “प्रतिस्पर्धा” की भाषा में होती है। यहां तक जलवायु और पर्यावरण संरक्षण की बहस में हमेशा एक आम आदमी की नैतिकता और गैरजिम्मेदारी ही केंद्र में होती है।
1969 में बिसलेरी जैसी बोतलबंद पानी की कंपनी ने कैसे 4 लाख रुपये के निवेश से आज 7000 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा लिया है। नब्बे के दशक के पहले भारत जैसे देश की जनता अपनी यात्राओं में पीने के लिए घरों से पानी ले जाती थी लेकिन उसके बाद डिस्पोजेबल संस्कृति ने ऐसी धूम मचाई कि आज हम 200 मिलीलीटर के पानी के प्लास्टिक बोतलों का अंबार खड़ा कर दे रहे हैं। बाजार ने हमारी आदतों को अपनी तरफ़ मोड़ लिया जहां हम सिर्फ़ बोतलबंद पानी देखते हैं शुद्धता लगभग अनदेखा ही है। इस्तेमाल करो और फेंको संस्कृति की वजह से नीब वाली कलम लोग भूल गये और दो अरब से ज्यादा प्लास्टिक के पेन रोज फेंक दिए जाते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि बाजार ने चीजें सुलभ की लेकिन हमारी आदतों को अपने कब्जे में कर लिया।
“सार्वजनिक परिवहन अपनाइए” पर है कहाँ?
हमारे शहर कोयला आधारित बिजली तंत्र, ऊर्जा‑भूखी आपूर्ति श्रंखलाएँ, कार आधारित परिवहन और अनियोजित-अनियंत्रित विकास की छाया में फल फूल रही है। आज की शहरों की बनावट में सार्वजनिक परिवहन का विरोधाभास और साफ़ दिखता है। हम सब सार्वजनिक आह्वान से दो चार है “कार कम चलाइए”, “बस‑मेट्रो का इस्तेमाल बढ़ाइए”, “साइक्लिंग को अपनाइए”। मगर जैसे ही आप नक्शे पर नज़र दौड़ाते हैं, पता चलता है कि नई कॉलोनियाँ और टाउनशिप क्लस्टर अक्सर वहाँ बनते हैं जहाँ न बस की उचित सुविधा है, न मेट्रो की, न ढंग का फुटपाथ न ही असल उपयोग वाली साइक्लिंग ट्रैक, असल में सार्वजनिक परिवहन वाला पन्ना शहर नियोजन से गायब ही दिखता हैं। जिस रूट पर लोगों की ज़रूरत है, वहाँ कभी‑कभार चलने वाली बसों को “विकल्प” कह देना ज़मीनी हकीकत से नज़र चुराना है।
ऐसे हालात में निजी वाहन का इस्तेमाल अक्सर सुविधा नहीं, मजबूरी होता है। कुछ लोग इस मजबूरी का खर्च उठा पाते हैं, कुछ नहीं उठा पाते और यही असमानता बढ़ती जाती है। इसके बाद अगर ये सवाल उठाए कि “आप कार लेकर क्यों निकल पड़े, आप क्यों भीड़ बढ़ा रहे हैं,” तो यह आधा सच होगा। असली सवाल यह है कि शहरों को इस तरह बनाया और बढ़ाया ही क्यों गया, जहाँ बिना निजी वाहन के रोज़मर्रा की ज़िंदगी चलाना लगभग असंभव हो गया है।
कार्बन फ़ुटप्रिंट और जिम्मेदारी का फ्रेम
आजकल “कार्बन फ़ुटप्रिंट” का कॉन्सेप्ट खूब लोकप्रिय हुआ। वेबसाइटें और ऐप्स बताते हैं कि आपके खान‑पान, यात्रा और खरीदारी से कितना कार्बन निकल रहा है। यह जानकारी उपयोगी है, लोगों को सोचने पर मजबूर करती है। पर इसके साथ‑साथ एक और प्रक्रिया भी चलती रहती है, सारा नैतिक फ़ोकस धीरे‑धीरे व्यक्ति पर टिक जाता है।
अगर कोई उड़ान भरता है, तो उसे खुद से सवाल करना चाहिए, इसमें दो राय नहीं। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उतना ही ज़रूरी है कि हवाई यात्रा का विकल्प क्या है, शहरों के बीच रेल या बस नेटवर्क की हालत क्या है, और कंपनियाँ तथा नीतियाँ किस तरह सस्ते तेल‑आधारित विकल्पों को बढ़ावा दे रही हैं। अगर बिजली उसी ग्रिड से आ रही है जो मुख्य रूप से कोयले पर चलता है, तो अकेले उपभोक्ता की “ग्रीन चॉइस” की क्षमता काफी सीमित हो जाती है और विमर्श ग्रीन वाशिन्ग्की तरफ बढ़ निकलता हैं।
जब हर पर्यावरणीय मुद्दा “आपका फुटप्रिंट” और “आपकी लाइफस्टाइल” के फ़्रेम में सिमट जाता है, तो बड़े उपभोक्ता आधारित ढांचे जो मूल रूप से मौजूदा संकट के लिए जिम्मेदार है, ओझल होने लगते है। केवल यह कहते रहना कि “आपको अपना फ़ुटप्रिंट कम करना चाहिए,” काफी नहीं है, अब यह भी पूछा जाना चाहिए कि “ऊर्जा‑प्रणाली, उद्योग, आर्थिकी, कृषि और शहरी ढांचे किस दिशा में बढ़ रहे हैं और उसके पीछे का आर्थिक माडल क्या है और उनका आखिरी उदेश्य क्या है।
ऑनलाइन बाज़ार और एल्गोरिद्मिक उपभोक्ता
ऑनलाइन बाज़ार ने जहाँ एक ओर खरीदारी को आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर लोगों की आदतें और पर्यावरण दोनों को गहरी चोट पहुँचाई है। असल में यह बाज़ार हमें "ग्राहक" नहीं, बल्कि एक ऐसी कठपुतली बना चुका है जिसकी डोर एल्गोरिदम के हाथ में है। "आपके लिए सुझाव", "सीमित समय की छूट", "केवल 2 आइटम बचे हैं" ये सब मनोवैज्ञानिक चालें हैं जो हमें बिना सोचे-समझे खरीदारी करने पर मजबूर करती हैं। बाज़ार ने हमारी स्वाभाविक संतोष की भावना को धीरे-धीरे नष्ट कर दिया है और उसकी जगह एक कभी न बुझने वाली चाहत भर दी है। फ़ास्ट फैशन के ज़रिए यह बाज़ार हमें यह भी बताता है कि पुराना पहनना "शर्म की बात" है, नया खरीदना "आत्मसम्मान" की निशानी है यानी खरीदारी न करना सामाजिक रूप से पिछड़ा होना है। यही नैतिक दबाव सबसे खतरनाक है और इस सबका खामियाज़ा भुगत रही है हमारी पृथ्वी। हर ऑर्डर की अलग डिलीवरी के लिए दौड़ते वाहन, अलग अलग पैकेट से निकले प्लास्टिक और थर्मोकोल का अंबार, एक-दिन डिलीवरी की होड़ में जलने वाला ईंधन और ऑनलाइन बाज़ार को चालने वाले विशाल डेटा सेंटरों की उर्जा खपत का आकड़ा आसमान छू रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यही बाज़ार अब "ग्रीन पैकेजिंग" और "इको-फ्रेंडली डिलीवरी" के नारे लगाकर पर्यावरण का रक्षक भी बनने का नाटक करता है ताकि हमारा अपराधबोध शांत हो और हम उसी रफ़्तार से खरीदते रहें।
व्यवस्था जनित संकट” का समाधान “व्यवस्था बदलाव”
जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय संकट मूलतः व्यवस्था‑जनित हैं। ये केवल कुछ लोगों की “गलत आदतों” से नहीं, बल्कि उन विकास‑नीतियों, बाज़ार‑केंद्रित अर्थव्यवस्थाओं और संस्थागत प्राथमिकताओं से पैदा हुए हैं जो आम आदमी की रोज़मर्रा की जिंदगी की रूपरेखा तय करती हैं, आदतें बदलती है। शहर दूर‑दूर तक फैला दिए गए हों तो लंबी यात्रा करनी ही पड़ेगी; सस्ते और सुरक्षित ताज़ा भोजन की बजाय पैकेज्ड फूड ही आसानी से उपलब्ध हो, तो प्लास्टिक भी बढ़ेगा और कार्बन उत्सर्जन भी; बाज़ार में वही वस्तुएँ सस्ती हों जो जल्दी टूटती हों और जिनकी मरम्मत कठिन हो, तो “कम खपत” की नैतिकता कितनी भी मजबूत हो, व्यवहारिक सीमा वहीं आकर टकराएगी
इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। हममें से हर किसी के पास कुछ न कुछ विकल्प हैं, कम‑ज़्यादा ही सही; हम अपने जीवन को थोड़ा‑थोड़ा बदल सकते हैं, और यह करना भी चाहिए। लेकिन यह स्वीकार करना भी ज़रूरी है कि असली लड़ाई केवल रसोई, बाथरूम और ड्राइंग‑रूम में नहीं, बल्कि संसद, मंत्रालयों, बोर्डरूम, नगर‑योजनाओं और वैश्विक समझौतों की मेज़ों पर भी लड़ी जानी है।
“हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” का असल संदेश
तो फिर पृथ्वी दिवस के इस साल के नारे “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” का असल संदेश क्या है? “हमारी शक्ति” का मतलब सिर्फ़ “हमारी खरीद‑फरोख़्त” पर नियंत्रण नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक राजनीतिक‑सामाजिक शक्ति से वर्तमान आर्थिकी की समीक्षा भी है। हमारी शक्ति का एहसास ही हमें यह कहने का साहस देगी कि उत्पाद इस तरह बनाइए कि आसानी से मरम्मत हो सकें और टिकाऊ हो। उद्योगों और ऊर्जा संयंत्रों के उत्सर्जन और गंदे पानी पर समझौता नहीं, बल्कि सख्त नियमन हो। शहरों में पैदल चलना, साइकिल चलाना और सार्वजनिक परिवहन कोई साहसिक ना होकर, बल्कि सबसे सहज विकल्प बने। कृषि, उद्योग और सेवाओं का ढांचा इस तरह बदले कि पानी और ऊर्जा की बर्बादी असल में कम हो, सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं।
जब तक हम केवल आम लोगों की आदतों पर डंडा चलाते रहेंगे और बड़े ढांचों को अपेक्षाकृत बख्शते रहेंगे, तब तक पृथ्वी दिवस का उत्सव असंतुलित, और बनावटी ही रहेगा। असली चुनौती यह है कि व्यक्तिगत नैतिकता और व्यवस्थागत सुधार दोनों को एक साथ देखा जाए। हम बत्ती भी बुझाएँ, नल भी बंद करें, और साथ‑साथ यह भी मांग उठाएँ कि जो सिस्टम हमारे चारों तरफ़ बुना जा रहा है, वह भी उतना ही जिम्मेदार और संयमी हो, जितना हमसे अपेक्षित है। जब “हमारी शक्ति” इस दोहरे स्तर पर काम करने लगेगी जीवनशैली में भी, और व्यवस्था में भी तभी “हमारा ग्रह” सचमुच सुरक्षित होने की दिशा में बढ़ सकेगा।