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नोएडा में तकनीकी कर्मचारी की डूबने से मौत पर एनजीटी  ने लिया स्वत: संज्ञान

यह मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि शहरी जल प्रबंधन की गंभीर विफलता का परिणाम है

Vivek Mishra

नोएडा के सेक्टर 150 में एक तकनीकी कर्मचारी की डूबने से हुई मौत के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने स्वत: संज्ञान लिया है। इस मामले ने सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि शहरी जल प्रबंधन की गंभीर विफलताओं को भी उजागर किया है। 

एनजीटी की प्रधान पीठ में जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंटिल वेल ने 20 जनवरी 2026 को एक अंग्रेजी समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार रिपोर्ट के आधार पर यह संज्ञान लिया है। 

एनजीटी ने तथ्यों पर गौर करते हुए पाया कि पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता नोएडा के सेक्टर 150 क्षेत्र में जिस जलभराव वाले गड्ढे (वॉटरलॉग्ड ट्रेंच) में डूबे, यह क्षेत्र बीते लगभग एक दशक से बारिश के पानी और आसपास के आवासीय इलाकों से निकासी न होने के कारण एक स्थायी जलाशय या तालाब में तब्दील हो चुका था। इसके बावजूद न तो इसे सुरक्षित किया गया और न ही प्रभावी जल निकासी की व्यवस्था की गई।

वहीं, समाचार के मुताबिक, जांच में यह भी पता चला कि वर्ष 2015 में सिंचाई विभाग द्वारा इस क्षेत्र के लिए एक स्टॉर्म वाटर मैनेजमेंट योजना प्रस्तावित की गई थी, जिसमें हेड रेगुलेटर की स्थापना शामिल थी ताकि अतिरिक्त पानी की नियंत्रित निकासी सुनिश्चित की जा सके। हालांकि, इस योजना को लागू करने में वर्षों की देरी हुई, जिसके चलते क्षेत्र में गंभीर जलभराव की स्थिति बनी रही। यही जलभराव अंततः एक जानलेवा हादसे का कारण बना।

एनजीटी ने इस मामले को पर्यावरणीय सुरक्षा, शहरी नियोजन और नागरिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय मानते हुए कई प्रमुख सरकारी एजेंसियों को पक्षकार बनाया है। इनमें नोएडा प्राधिकरण, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी), सिंचाई विभाग उत्तर प्रदेश, उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यावरण विभाग के मुख्य सचिव तथा गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट शामिल हैं।

ट्रिब्यूनल ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वह मामले में अपना विस्तृत जवाब अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले दायर करें। इस मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है।

नोए़डा में घटी यह दर्दनाक घटना तेजी से शहरीकरण कर रहे शहरों में कमजोर जल निकासी व्यवस्था, अधूरी परियोजनाओं और विभागीय समन्वय की कमी का प्रतीक भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते स्टॉर्म वाटर मैनेजमेंट योजनाओं को लागू किया गया होता और जलभराव वाले क्षेत्रों की नियमित निगरानी की जाती तो इस तरह की दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था।