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क्या न्यायपालिका-प्रेरित पर्यावरणवाद बदल रहा है?

सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों, सिंगरौली कोल ब्लॉक विवाद और पर्यावरणीय जनहित याचिकाओं पर बढ़ते संदेह ने ‘न्यायपालिका-प्रेरित पर्यावरणवाद’ की दशकों पुरानी परंपरा और उसकी विश्वसनीयता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं

Satyam Shrivastava

भारत में पर्यावरण संरक्षण की जो संवैधानिक और न्यायिक परंपरा विकसित हुई है, उसमें सर्वोच्च न्यायालय की केंद्रीय भूमिका रही है। गंगा प्रदूषण से लेकर दिल्ली की जहरीली हवा तक, ताजमहल संरक्षण से लेकर देशव्यापी वन संरक्षण तक, भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का बड़ा हिस्सा न्यायपालिका के हस्तक्षेप से निर्मित हुआ। यही कारण है कि दशकों तक यह विश्वास बना रहा कि यदि सरकारें और प्रशासन पर्यावरणीय प्रश्नों पर विफल होते हैं, तब भी अदालतें अंतिम संरक्षक की भूमिका निभाएंगी।

माना जाता रहा है कि देश में ‘न्यायपालिका-प्रेरित पर्यावरणवाद’ मौजूद है। लेकिन हाल के वर्षों में सामने आए कुछ फैसलों और टिप्पणियों ने इस धारणा पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। 

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने इस भरोसे को गंभीर रूप से सवालों में ला दिया है। 11 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण की पश्चिमी क्षेत्र पीठ के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका सुनी जा रही थी, जिसमें वधावन पोर्ट परियोजना के विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए दी गई पर्यावरणीय एवं तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) स्वीकृतियों को रद्द करने की मांग वाली अपील खारिज कर दी गई थी।

इसी सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पर्यावरण समूहों पर टिप्पणी करते हुए कहा- “हमें एक ऐसी विकास परियोजना दिखाइए जिसका तथाकथित पर्यावरणविदों ने स्वागत किया हो।” अदालत ने आगे यह भी कहा कि पर्यावरण के नाम पर हर परियोजना का विरोध नहीं किया जा सकता और विकास परियोजनाओं को भी व्यापक सार्वजनिक हित के संदर्भ में देखना होगा।

कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप” ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को एक खुला पत्र लिखकर पर्यावरण कार्यकर्ताओं को लेकर की गई हालिया टिप्पणियों पर गहरी चिंता व्यक्त की। पत्र में कहा गया कि विकास परियोजनाओं का विरोध करने वाले “तथाकथित पर्यावरणविदों” संबंधी टिप्पणियाँ न्यायपालिका के भीतर एक पूर्वाग्रह को दर्शाती हैं, जो पर्यावरणीय न्याय और नागरिक भागीदारी को कमजोर कर सकता है।

यह पत्र गुजरात के पिपावाव पोर्ट परियोजना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई उस टिप्पणी के बाद लिखा गया, जिसमें अदालत ने पूछा था कि “एक भी ऐसी परियोजना बताइए जिसका पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया हो।”

पत्र में चिपको, साइलेंट वैली, नर्मदा बचाओ और अप्पिको जैसे जन आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा और न्यायशास्त्र नागरिक हस्तक्षेपों तथा जनहित याचिकाओं से ही मजबूत हुआ है।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि पर्यावरणीय स्वीकृति देने वाली संस्थाएं लगभग सभी परियोजनाओं को मंजूरी दे रही हैं, जिससे स्वतंत्र पर्यावरणीय परीक्षण कमजोर हुआ है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से नागरिकों की पर्यावरणीय चिंताओं को “विकास विरोध” के बजाय संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक हित के रूप में देखने की अपील की।

इस टिप्पणी को गंभीरता से लेते हुए करीब 71 पूर्व नौकरशाहों और सिविल सेवकों ने इस खुले पत्र में नागरिकों के पर्यावरण के प्रति चिंता को सामने रखा। पत्र में कहा गया कि पर्यावरणीय जनहित याचिकाओं और नागरिक समूहों को “विकास विरोधी” नजरिए से देखना भारत की उस न्यायिक परंपरा के खिलाफ है जिसे स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने निर्मित किया। यह बहस अचानक पैदा नहीं हुई। इसके पीछे सिंगरौली, हसदेव अरण्य और ओडिशा जैसे कई संघर्षों की पृष्ठभूमि मौजूद है, जहां घने जंगल, हाथी गलियारे और आदिवासी जीवन लगातार खनन परियोजनाओं के दबाव में हैं।

बहरहाल ताजा मामला मध्य प्रदेश में सिंगरौली में कोयला खनन को लेकर है जहां हाल ही में 21 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में अडानी ग्रुप के कोल ब्लॉक प्रोजेक्ट को दी गयी पर्यावरणीय मंजूरियों में दखल देने से इंकार कर दिया। 

क्या है सिंगरौली का मामला? 

मध्य प्रदेश का सिंगरौली क्षेत्र लंबे समय से देश की ऊर्जा राजधानी कहा जाता रहा है। यहाँ कोयला खनन, ताप विद्युत परियोजनाएं और भारी औद्योगिकीकरण दशकों से जारी हैं। लेकिन इसी औद्योगिक विस्तार के बीच बचे हुए घने जंगल अब नए संघर्षों का केंद्र बन गए हैं। 

विवाद सिंगरौली के धिरौली कोल ब्लॉक से जुड़ा है, जिसके लिए लगभग 1400 हेक्टेयर वन भूमि के गैर वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि के परिवर्तन की अनुमति दी। इस मामले में उन वन स्वीकृतियों को चुनौती दी गयी थी जो सिंगरौली के संवेदनशील वन क्षेत्रों में कोयला खनन के लिए प्रदान की गई हैं।

याचिकाकर्ता पहलराष्ट्रीय हरित प्राधिकरण दिल्ली पहुँचे थे लेकिन अधिकरण ने मामले की मेरिट पर सुनवाई किए बिना इसे समय-सीमा के आधार पर खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप की मांग की और कहा कि पर्यावरणीय क्षति एक “निरंतर कारण” है जो नागरिकों के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से सीधे जुड़ा हुआ है।  

याचिका का मुख्य आधार यह था कि संबंधित वन स्वीकृतियां पर्यावरणीय नियमों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों की अवहेलना करते हुए दी गईं। आवेदन में कहा गया है कि जिस क्षेत्र में खनन की अनुमति दी गई है, वह हाथियों के आवागमन का महत्वपूर्ण गलियारा है तथा वहाँ स्लॉथ भालू, तेंदुए, सियार सहित अनेक वन्य प्रजातियां निवास करती हैं।

साइट निरीक्षण रिपोर्ट (एसआईआर) दिनांक 28 अप्रैल 2024 के अनुसार इस क्षेत्र में जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है और ऐसे क्षेत्र में किसी भी प्रकार की वन स्वीकृति देने से पहले राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की अनुमति आवश्यक थी।  

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों मसलन बिनय कुमार दलेई बनाम उड़ीसा राज्य  तथा टी.एन. गोदावर्मन बनाम भारत संघ  के हवाले देते हुए कहा गया है कि वन्यजीव गलियारों और संवेदनशील वन क्षेत्रों में खनन गतिविधियाँ बिना कठोर पर्यावरणीय परीक्षण और वैधानिक अनुमतियों के नहीं चल सकतीं। 

मामले का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यदि कोई क्षेत्र हाथियों के गलियारे के रूप में पहचाना जाता है, तो उसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत “ईको-सेंसिटिव ज़ोन” घोषित किया जाना चाहिए। याचिका के अनुसार, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ऐसा न किया जाना निजी कंपनी को खनन की अनुमति देने का आधार नहीं बन सकता। 

साइट निरीक्षण रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि संबंधित वन क्षेत्र में 0.5 से 0.6 तक की घनी वन छतरी (फॉरेस्ट कनोपी) मौजूद है जिसे 2011-12 की केंद्र सरकार की नीति के अनुसार “नो-गो एरिया” माना जाना चाहिए। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि इतने घने और प्राकृतिक जंगलों की कटाई उचित नहीं होगी।

इसके बावजूद वन स्वीकृतियाँ प्रदान कर दी गईं। दिलचस्प यह है कि जिन क्षेत्रों को कभी स्वयं केंद्र सरकार ने पारिस्थितिक दृष्टि से ‘अत्यंत संवेदनशील’ मानकर नो-गो क्षेत्र की श्रेणी में रखा था, आज वही क्षेत्र बड़े पैमाने पर खनन संघर्षों के केंद्र बनते जा रहे हैं।” 

याचिका में यह भी कहा गया था कि इस क्षेत्र में भूमिगत खनन व्यावहारिक नहीं है और अंततः खुली खदान  ही एकमात्र विकल्प होगा। इससे बड़े पैमाने पर मिट्टी और पत्थर का अपशिष्ट निकलेगा तथा जंगल का स्थायी विनाश होगा। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इससे सिंगरौली क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर अपूरणीय प्रभाव पड़ेगा, जो पहले से ही व्यापक औद्योगिकीकरण और खनन के कारण गंभीर पर्यावरणीय संकट झेल रहा है। 

यह मामला केवल एक कानूनी या प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक पर्यावरण न्याय का प्रश्न भी बन गया है। आवेदन में कहा गया है कि जब पर्यावरण और मौलिक अधिकारों का प्रश्न हो, तब संवैधानिक अदालतें, विशेषकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट, तकनीकी समय-सीमा से बंधी नहीं हो सकतीं। याचिका में कहा गया है कि “इस मामले में वास्तविक पीड़ित पर्यावरण, वन्यजीव और सदियों पुराने समृद्ध वन हैं।”  

इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि वह अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए इन वन स्वीकृतियों की न्यायिक समीक्षा करे और यदि वे कानून तथा पर्यावरणीय मानकों के विपरीत पाई जाएँ, तो मई 2025 में दी गई स्वीकृतियों को निरस्त करे। 

सिंगरौली का यह मामला भारत में विकास बनाम पर्यावरण की बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आता है। यह केवल एक खनन परियोजना का विवाद नहीं है बल्कि यह प्रश्न भी है कि क्या आर्थिक विकास के नाम पर घने जंगलों, वन्यजीव गलियारों और पारिस्थितिक संतुलन की अनदेखी की जा सकती है? आने वाले समय में यह मामला भारत की पर्यावरणीय न्याय व्यवस्था, वन स्वीकृति प्रक्रिया और संवैधानिक पर्यावरण संरक्षण की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण मुकदमा साबित हो सकता है। 

ओडिशा का मामला और हाथी गलियारे

सिंगरौली विवाद में जिस निर्णय का बार-बार उल्लेख हुआ, वह था विनय कुमार दलेई बनाम ओडिशा स्टेट। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने हाथियों के आवागमन मार्गों और वन्यजीव आवासों को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। अदालत ने माना कि हाथी गलियारों को केवल राजस्व या खनन के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। यदि कोई क्षेत्र पारंपरिक वन्यजीव मार्ग है, तो वहाँ खनन गतिविधियों को अत्यधिक सावधानी से परखा जाना चाहिए।

सिंगरौली में भी यही प्रश्न उठाया गया कि यदि साइट रिपोर्ट स्वयं क्षेत्र को हाथी गलियारा मानती है, तो राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की अनुमति के बिना वन स्वीकृति कैसे दी गई? 

यह केवल कानूनी तकनीक का सवाल नहीं था। यह उस पर्यावरणीय प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न था जिसमें कई बार अंतिम स्वीकृतियाँ विशेषज्ञ रिपोर्टों की चेतावनियों के बावजूद दे दी जाती हैं।

न्यायपालिका की बदलती भूमिका?

यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है। भारत में पर्यावरणीय न्याय की पूरी परंपरा ही जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता से बनी है। विशेषकर 1980 के दशक के बाद भारत में पर्यावरणीय शासन का एक बड़ा हिस्सा न्यायपालिका-प्रेरित रहा है। कई बार सरकारें जहाँ नीतिगत या प्रशासनिक स्तर पर निष्क्रिय रहीं वहाँ सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21, 32 और 142 के तहत हस्तक्षेप कर पर्यावरणीय न्यायशास्त्र विकसित किया।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है कि न्यायालय ने अनुच्छेद 21 का विस्तार : “जीवन के अधिकार” में पर्यावरण को शामिल किया। जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने यह व्याख्या की कि “जीवन का अधिकार” केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वच्छ जल, स्वच्छ हवा और स्वस्थ पर्यावरण भी इसका हिस्सा हैं।

इसका अलावा एम.सी. मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में अदालत ने कहा कि पर्यावरणीय सुरक्षा राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसी श्रृंखला के मामलों में गंगा प्रदूषण, ताजमहल संरक्षण और दिल्ली प्रदूषण जैसे विषयों पर ऐतिहासिक आदेश दिए गए।

“पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन” और प्राकृतिक संसाधनों पर जनता का अधिकार भी पर्यावरण की सुरक्षा की दिशा में न्यायापालिका की ओर से मील का पत्थर है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नदियाँ, जंगल, समुद्र तट और प्राकृतिक संसाधन सरकार की निजी संपत्ति नहीं हैं; राज्य केवल उनका ट्रस्टी है।

1995 से चल रहे टी.एन. गोदावर्मन मामला : भारतीय वन संरक्षण के सबसे बड़े न्यायिक हस्तक्षेप के तौर पर देखा जाता है।  इस मामले को भारत में “सतत न्यायिक निगरानी “(continuous mandamus)” का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। इसी केस के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने: “वन” की व्यापक परिभाषा दी, देशभर में अवैध कटाई पर रोक लगाई, वन परामर्श समिति और क्षतिपूर्ति वनीकरण जैसे तंत्रों को मजबूत किया और कई संवेदनशील क्षेत्रों में खनन गतिविधियों को नियंत्रित किया। भारत में वन संरक्षण की वर्तमान व्यवस्था पर इस मामले का हाल-हाल तक गहरा प्रभाव है।

पूर्व सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle), प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) और सतत विकास (Sustainable Development) जैसे अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय सिद्धांतों को भारतीय न्यायपालिका ने संवैधानिक मान्यता दी और उन्हें भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का हिस्सा बनाया।

यानी भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का निर्माण स्वयं अदालतों ने किया। इसलिए जब पर्यावरणीय समूहों को लेकर संदेह या आलोचनात्मक टिप्पणियाँ सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा होती है।

सिंगरौली जैसे मामले इस धारणा को क्यों मजबूत करते हैं?

सिंगरौली, हसदेव अरण्य, अरावली, पश्चिमी घाट, स्टरलाइट, चारधाम परियोजना को देखें तो इन सभी मामलों में अंतिम उम्मीद अक्सर अदालतों से ही जुड़ी दिखाई देती है। कारण यह है कि पर्यावरणीय संघर्षों में स्थानीय समुदायों को प्रशासनिक स्तर पर पर्याप्त सुनवाई नहीं मिलती और तब वे न्यायपालिका की ओर देखते हैं।

सिंगरौली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंततः पर्यावरणीय प्रश्नों की गहराई में जाने के बजाय समय-सीमा के तकनीकी पहलू के आधार पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। यह निर्णय तकनीकी रूप से सही हो सकता है लेकिन इससे एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है, क्या पर्यावरणीय न्याय अब प्रक्रिया और समय-सीमा की तकनीकी सीमाओं में सीमित होता जा रहा है?

यानी यह प्रश्न अब गंभीर होता जा रहा है कि क्या न्यायपालिका–प्रेरित पर्यावरणवाद की वह परंपरा, जिसने दशकों तक जंगलों और समुदायों को संवैधानिक संरक्षण दिया, अब विकास और निवेश केंद्रित दृष्टिकोण के दबाव में बदल रही है?”

(लेख में व्यक्त लेखक की निजी राय है)