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रिकॉर्ड गर्मी में लू से सामना करने के लिए कितने तैयार हैं हमारे कंक्रीट के मकान : सीएसई विश्लेषण

हमारे घरों और आवासों को गरमी के अनुकूल होने की जरूरत है, जिससे वे भीषण गर्मी या लू का सामना कर सकें, लेकिन क्या वे ऐसे हैं ?

DTE Staff

देश का उत्तरी-पश्चिमी और मध्य भाग इस साल मार्च से ही चिलचिलाती धूप का सामना कर रहा है। मार्च में जहां देश में पिछले 122 सालों का सबसे ज्यादा तापमान दर्ज किया गया, वहीं अप्रैल से देश के पहाड़ी हिस्सों में भी तेज लू चलने लगी। हिमाचल प्रदेश में मार्च-अप्रैल, 2022 में कुल 21 दिन लू की हालत रिकॉर्ड की गई, यहां के उना में अप्रत्याशित तौर पर तापमान 42.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। जबकि देश के सबसे ठंडे स्थानों में से एक लद्दाख के द्रास में तापमान 22.6 डिग्री तक दर्ज किया गया।

राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केन्द्र ने 2015 से 2019 के बीच ऐसी 3775 मौतें दर्ज की, जिनकी वजह गरमी से संबंधित बीमारियां थी। लू में बाहर निकलने से शरीर कई बीमारियों का शिकार बन सकता है, यहां तक कि व्यक्ति की जान भी जा सकती है। वहीं, इन मौतें में कुछ मामलों में गरमी का असर घर के अंदर रहने वालों पर भी पाया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आवास और स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों के मुताबिक, अत्यधिक गर्मी से इमारतों के अंदर नींद संबंधी विकार, अनियमित रक्तचाप, श्वसन और हृदय रोग, मानसिक स्वास्थ्य विकार और गर्भावस्था से संबंधित जटिलता आदि बीमारियां हो सकती हैं।

शहरी ऊष्म द्वीप प्रभाव: जल रहे शहर
शहरी ऊष्म द्वीप प्रभाव के कारण लू का असर गांवों की अपेक्षा शहरों में ज्यादा साफ नजर आ रहा है। शहरी ऊष्म द्वीप एक शहरी या महानगरीय क्षेत्र होता है जो मानवीय गतिविधियों के चलते  अपने आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में काफी गर्म हो जाता है। दोनों में तापमान का अंतर आमतौर पर रात में दिन की तुलना में ज्यादा होता है, और जब हवाएं कमजोर होती हैं तो यह अधिक स्पष्ट होता है। उदाहरण के लिए एक आकलन के मुताबिक, आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कोलकाता में स्थानीय शहरी तापमान में दिन के दौरान कहीं भी एक से तीन डिग्री सेल्सियस और रात में 12 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि देखी जा सकती है।

शहरी ऊष्म द्वीप प्रभाव को उष्णकटिबंधीय जलवायु का मुद्दा समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। यह बिल्कुल शहरी मुद्दा है, जो शहर बनाने की हमारी योजनाओं से जुड़ा है। यहां तक कि लंदन जैसे ठंडे मौसम वाले शहर में भी गर्मियों की रातों में अपने आसपास के हरित क्षेत्र की तुलना में 10 डिग्री सेल्सियस ज्यादा तापमान देखा गया है।

इसकी वजह शहरों में बड़े पैमाने पर निर्माण, उसके कंक्रीट के जंगल में बदलने के साथ-साथ हरे भरे स्थानों और जलाशयों का सिकुड़ना है। इनके चलते शहर गरमी के जाल में फंसते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, कोलकाता में केवल 0.63 वर्ग मीटर प्रति व्यक्ति हरे भरे स्थान हैं, जबकि डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देशों के अनुसार यह स्थान, प्रति व्यक्ति 12 वर्ग मीटर से कम नहीं होना चाहिए।

ज्यादा गरमी का मतलब ज्यादा ऊर्जा की खपत
लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने के अलावा लू हमारा ऊर्जा-बजट भी बिगाड़ रही है। इसके चलते बिजली की मांग बढ़ जाती है क्योंकि लोग एयर‘ कंडीशनर का ज्यादा इस्तेमाल करने लगते हैं। वातावरण को गर्म होने से रोकने और ऊर्जा की खपत को कम करने के लिए नई बिल्डिंगो का निर्माण और पुरानी बिल्डिंगों में अतिरिक्त नया काम इस तरह कराना जरूरी है, जिससे उनके अंदर गरमी एक बार जाकर ठहर न सके।

सीएसई के सस्टेनेबल बिल्डिंग्स एंड हैबिटेट प्रोग्राम के निदेशक रजनीश सरीन के मुताबिक, ‘ऊर्जा की इतनी ज्यादा खपत करने से भारत अपनी कूलिंग डिमांड को 25 से तीस फीसद कम करने के लक्ष्य से चूक जाएगा। यही नहीं, वह 2037-38 तक कूलिंग एनर्जी आवश्यकताओं को 20-40 फीसद तक कम करने के अपने लक्ष्य को भी ूपरा नही कर सकेगा, जैसा इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (नीचे देखें) के तहत निर्धारित किया गया है। इसके लिए देश को ऊर्जा- उपवास की जरूरत है। इसके लिए बिल्डिंगों को अपनी ऊर्जा से जुड़ी जरूरतें कम करनी होंगी। ऐसा करने के लिए हमें प्रेरणा की जरूरत है, जिससे हमें बिल्डिंगों का निर्माण इस तरीके से करें, जो गरमी झेल सकें। हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाने की भी जरूरत है, इससे भी काफी बदलाव आ सकता है।’


हमारे बिल्डिंग सेक्टर में गड़बड़ी क्या है?
किफायती आवास परियोजनाएं नवीनतम ऊर्जा कोड का पालन करने में नाकाम: इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान 2019, नेशनल थर्मल कम्फर्ट स्ट्रेटजी के एक हिस्से के रूप में इको निवास संहिता (ईएनएस) के अनुपालन की योग्यता रखता है। आवासीय भवनों में ऊर्जा संरक्षण के लिए 2018 में ईएनएस जारी किया गया था। सीएसई के आकलन से पता चलता है कि विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में कई किफायती आवास योजनाओं और परियोजनाओं में से कोई भी ईएनएस के अनुसार गर्मी लाभ आवश्यकताओं (रेजीडेंशियल एन्वेलप ट्रांसमिटेंस वैल्यू,  यानी आरईटीवी द्वारा परिभाषित मानकों) को पूरा नहीं करता है।

संबंधित विषय पर अध्ययन की कमी के कारण जलवायु के लिए अनुचित निर्माण सामग्री का बड़े पैमाने पर उपयोग:
 बिल्डिंग निर्माण में इस्तेमाल होने वाली बेहतर सामग्री की जानकारी न होने  और इस वजह से कमतर सामग्री के चयन के कारण ऊर्जा संहिताओं का अनुपालन नहीं हो रहा है। सीएसई ने राज्य अचल संपत्ति विनियमन प्राधिकरण (रेरा) के आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए कई शहरों में सामग्री पर एक अध्ययन किया। जांच से पता चला कि नमूना परियोजनाओं में से एक तिहाई से अधिक कंक्रीट से बनी एक पत्थर की दीवार का उपयोग कर रहे हैं। यह सामग्री पारंपरिक जली हुई मिट्टी की ईंट से बनी दीवार की तुलना में दोगुने से ज्यादा तेजी से गर्म होती है।

आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत भवन निर्माण सामग्री और प्रौद्योगिकी संवर्धन परिषद, तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर नई सामग्री के दस्तावेज तैयार कर रहा है। हालांकि इस सामग्री के जलवायु के उपयुक्त होने संबंधी कोई अध्ययन नहीं किया गया है। जिसका नतीजा यह है कि एक बेखबर भवन-निर्माण इंडस्ट्री अपने आर्थिक-हित साधने और तेजी से निर्माण कराने के चक्कर में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल कर रही है, जो गरमी से बचाव के लिए ठीक नहीं है।

ठंडा करने के लिहाज से ले-आउट और डिजाइन पर कोई नियंत्रण नहीं: कूलिंग एक्शन प्लान के इको निवास संहिता (ईएनएस) के अनुकूल न होने का दूसरा कारण यह है कि देश में बिल्डिंगों के ले- आउट और डिजाइन को लेकर किसी तरह की गाइडेंस का अभाव है। सीएसई द्वारा कम्प्यूटर आधारित एक जांच में पाया गया कि साठ फीसदी बिल्डिंगों में हवा के आने-जाने को लेकर ले- आउट का ध्यान नहीं रखा गया क्योंकि इसके कोई नियम ही नहीं हैं। जबकि ज्यादातर हाउसिंग प्रोजेक्ट में बड़े पैमानों पर घरों का निर्माण किया जाता है तो उनके लिए गरमी से बचाव को वेंटीलेशन संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

आवास एक राज्य का विषय है, और राज्य सरकारें किफायती आवास के लिए बड़े पैमाने पर जमे हुए घिसे-पिटे फॉर्मूले के साथ काम कर रही हैं। वे आवास बनवाने में उसके गरमी के लिहाज से उपयुक्त होने, बिल्डिंग-डिजाइन ले-आउट और दीवारों की सामग्री के चयन में चूक रही है। गाइडलाइंस फॉर हाउसिंग इन तेलंगाना नाम के सीएसई के एक आकलन के मुताबिक, बिना  जानकारी वाले डिजाइन और सामग्री के चयन के चलते ऐसे घरों की तादाद साल में दस से 25 फीसदी तक बढ़ सकती है, जो ज्यादा घंटों तक गर्म रहेंगे या गरमी के प्रति जिनकी अनुकूलता कम होगी।  

राज्यों को चाहिए कि वे अपने चल रहे हाउसिंग प्रोजेक्टों में उनकी गरमी के प्रति क्षमता की जांच करें और भविष्य में बनने वाले प्रोजेक्टों के लिए बेहतर डिजाइन और सामग्री संबंधी दिशा-निर्देश तैयार करें। इन दिशा- निर्देशों के व्यापक प्रसार के लिए इन्हें भवन उप-नियमों के साथ जोड़ने की भी जरूरत है।

ऊर्जा कोड के नए युग में गरमी के प्रति झुकाव वाली पारंपरिक दीवार की उपेक्षा की जा रही है:  प्रधान मंत्री आवास योजना शहरी के तहत स्वीकृत 70 फीसदी आवासीय इकाइयां स्व-निर्माण श्रेणी में आती हैं। इन स्व-निर्मित घरों में पारंपरिक रूप से उच्च तापीय द्रव्यमान वाली दीवारों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे घरों के अंदर ठंडक रहती है।

जबकि आज की हाउसिंग स्कीमों में पक्का मकान बनाने पर जोर दिया जाता है, जिसके इको निवास संहिता (ईएनएस), आधुनिक दीवार बनाने की तकनीकों के साथ संक्रमण के दौर से गुजर रही है। ये नई तकनीकें, सामग्रियों के ताप-अवरोधी गुणों के इर्द-गिर्द घूमती हैं और पारंपरिक दीवारों की गरमी रोकने वाली विशेषता को नजरअंदाज करती हैं। यही विशेषता स्व-निर्मित घरों को स्थानीय जलवायु का सामना करने में मदद करती है।

जलवायु के अनूकूल दीवार बनाने वाले पारंपरिक ज्ञान को सहेजने, उसका दस्तावेजीकरण करने और उसे बढ़ावा देने की जरूरत है।

गरमी को लेकर कोई मानक तय न होने के चलते बेहतर करने वालों को प्रोत्साहन नहीं: नई अफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्प्लेक्स योजना में तकनीकी नवाचार अनुदान के तहत टिकाऊ और संसाधन-कुशल डिजाइन के वित्तपोषण के प्रावधान हैं। जबकि गरमी के अनुकूल संरचना तैयार करने पर किसी तरह का कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता।

किफायती आवासों को गरमी के अनुकूल बनाने को प्राथमिकता देने की जरूरत: शहरों में गरमी बढ़ने से गरीब आदमी को भी कूलर और यहां तक कि एसी जैसी सुविधाओं पर पैसा खर्च करना पड़ रहा है, इससे ज्यादा बिल आता है और उसका असर उनकी जेब पर पड़ता है। जो लोग इन सुविधाओं को नहीं खरीद सकते, उन्हें झुलसती गरमी का सामना करना पड़ता है। जिससे वे गरमी के चलते होने वाली बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। आईआईटी दिल्ली के एक अध्ययन से पता चलता है कि दक्षिण-पूर्व और मध्य दिल्ली दोनों में नौ ऊष्मा द्वीप यानी ऐसी जगहें जहां बहुत ज्यादा गरमी पड़े, हैं। इन क्षेत्रों में पर्याप्त कम आय वाली बस्तियां भी हैं। इस तरह की जगहों और स्थितियों में किफायती आवास के साथ इन्हें ठंडा करने को प्राथमिकता देना बहुत जरूरी है।

फिलहाल प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत देश के शहरी क्षेत्रों में 1.1 करोड़ और ग्रामीण क्षेत्रों में दो करोड़ घरों का निर्माण किया जा रहा है। सीएसई के अनुसंधान और राज्यों के साथ अनुबंध ने दिखाया है कि गरमी के अनुकूल होना,  किफायती आवास योजनाओं (जहां इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है) का जरूरी हिस्सा नहीं है। कई मौजूदा किफायती आवास परियोजनाएं वर्तमान इससे जुड़े दिशा-निर्देशों और ऊर्जा कोड के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर रही हैं। इस स्थिति में बदलाव लाने की जरूरत है।

इसके अलावा नई और पुरानी बिल्डिंगों को गरमी में आरामदायक बनाने के लिए कुछ अन्य उपाय भी हैं।  शहर के स्तर पर एक ऐसा एकीकृत, कूलिंग एक्शन प्लॉन बनाने की जरूरत है, जिसमें शहरी वानिकी, पानी के प्रति संवेदनशील शहरी डिजाइन और योजना, ठंडी छतें, छाायादार संयुक्त रणनीति शामिल हो, जिससे गरमी को थामा जा सके। इसके अलावा महत्वपूर्ण चीज, इसे लेकर लोगों में जागरुकता लाने की जरूरत है। जिससे वे इंडस्ट्री और सरकारी प्रोजेक्ट के निर्माण में उनके गरमी के प्रति अनुकूलता पर नजर रख सकें।

इंडिया कूलिंग एक्शन प्लॉन क्या है?
इंडिया कूलिंग एक्शन प्लॉन (आईसीएपी), पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2019 में जारी किया गया था। इस आधार पर कि 2038 तक भारत में घरों का एक महत्वपूर्ण प्रतिशत खराब डिजाइन के कारण गरमी के प्रति  असुविधाजनक इमारतों में रह रहा होगा और कूलिंग की मांग लगातार बढ़ेगी, आईसीएपी ने 2037-38 तक राष्ट्रीय कूलिंग मांग को 25-30 तक फीसद कम करने और  ऊर्जा जरूरतों को 20-40 फीसद तक कम करने का लक्ष्य रखा है।

सभी के लिए गरमी के अनुकूल माहौल देने के लिए आईसीएपी ने बहु-क्षेत्रीय रणनीतियां बनाई हैं, जिसमें कम ऊर्जा वाली शीतलन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना, ऊर्जा संरक्षण कोड के निर्माण का कार्यान्वयन, शीतलन उपकरणों की दक्षता बढ़ाना और किफायती आवास में थर्मल आराम को एकीकृत करना, आदि शामिल है।

फिर भी, दिशा-निर्देशों को जमीनी स्तर पर अमल में लाने के लिए काफी कुछ किए जाने की जरूरत है। किसी भी राज्य ने अभी तक इको निवास संहिता, 2018 को स्वीकार नहीं किया है। यह संहिता 50 गज से ज्यादा वाले आवासीय बिल्डिंग प्रोजेक्टों पर लागू होती है। दरअसल अभी तक हमारे यहां किफायती आवासों को गरमी के अनुकूल बनाने के काम को प्राथमिकता में रखा ही नहीं गया है। केवल तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे कुछ राज्य हैं, जो इको निवास संहिता को अमल में लाने की तैयारी कर रहे हैं।

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