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विकास

पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा मानव विकास और बुनियादी ढांचे के मामले में गोवा देश का सर्वश्रेष्ठ राज्य: रिपोर्ट

विश्व पर्यावरण दिवस पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट और डाउन टू अर्थ ने ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026: इन फिगर्स' रिपोर्ट जारी की

DTE Staff

डाउन टू अर्थ और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की देशभर के पर्यावरण और विकास संबंधी आंकड़ों पर आधारित वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पांच सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल विकास के कई प्रमुख संकेतकों पर कमजोर प्रदर्शन कर रहे हैं।

जबकि पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर राज्यों के प्रदर्शन का आकलन करने पर गोवा, असम, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और नागालैंड जैसे राज्य शीर्ष स्थानों पर रहे हैं। 

‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरमेंट 2026: इन फिगर्स’ शीर्षक वाली ई-रिपोर्ट विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) की पूर्व संध्या के अवसर पर आयोजित एक वेबिनार में जारी की गई। रिपोर्ट का विमोचन की सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने किया।

रिपोर्ट के लिए आंकड़ों के चयन और विश्लेषण की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी देते हुए डाउन टू अर्थ के प्रबंध संपादक रिचर्ड महापात्रा ने कहा, “हमने भारत के सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का चार प्रमुख विषयगत क्षेत्रों जैसे पर्यावरण, कृषि एवं भूमि, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा मानव विकास एवं सार्वजनिक अवसंरचना के आधार पर मूल्यांकन और रैंकिंग की है। आकलन के लिए उपयोग किए गए लगभग सभी संकेतक सरकारी और आधिकारिक स्रोतों से लिए गए हैं; केवल एक संकेतक इसका अपवाद है।”

पर्यावरण के मोर्चे पर राज्यों का प्रदर्शन

पर्यावरण संबंधी संकेतकों के आधार पर किए गए आकलन में गोवा, असम, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा और ओडिशा शीर्ष पांच राज्यों के रूप में उभरे हैं। दूसरी ओर राजस्थान, तमिलनाडु, बिहार, पंजाब और पश्चिम बंगाल रैंकिंग में सबसे निचले पायदान पर रहे। केंद्र शासित प्रदेशों में चंडीगढ़ ने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया, जबकि पुडुचेरी सबसे नीचे रहा।

रिपोर्ट के अनुसार, कुल 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जिनका प्रदर्शन विश्लेषण के मध्य स्तर (हाफवे मार्क) से भी नीचे रहा। इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कचरा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, जहां वे अपेक्षित स्तर पर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं।

रिपोर्ट की लेखिका और सीएसई में पर्यावरण संसाधन कार्यक्रम की निदेशक किरण पांडे के अनुसार, “गोवा ने बिजली उत्पादन में नए और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की उच्च हिस्सेदारी के कारण पर्यावरण श्रेणी में शीर्ष स्थान हासिल किया है।” हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि गोवा के सामने वन क्षेत्र में बदलाव, सीवेज शोधन और प्रदूषित नदी खंडों के प्रबंधन जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं।

डाउन टू अर्थ के प्रबंध संपादक रिचर्ड महापात्रा का कहना है कि शीर्ष स्थान पाने वाले राज्य भी कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था मजबूत मानी जाती है, लेकिन ‘कृषि निवेश (एग्रीकल्चर इनपुट्स)’ के मामले में उसका प्रदर्शन कमजोर रहा है। इसका मुख्य कारण रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता और जैविक खेती के क्षेत्र में अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति है।

कृषि और भूमि के मोर्चे पर प्रदर्शन

कृषि एवं भूमि से जुड़े संकेतकों के आधार पर पंजाब, हरियाणा, सिक्किम, त्रिपुरा और झारखंड शीर्ष पांच राज्यों में शामिल हैं। वहीं मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, तेलंगाना और गोवा इस श्रेणी में सबसे निचले स्थानों पर रहे।

रिपोर्ट के अनुसार, इस श्रेणी में 27 राज्यों का प्रदर्शन आधे से कम अंक (हाफवे मार्क) तक सीमित रहा, जो कृषि क्षेत्र में व्यापक चुनौतियों की ओर संकेत करता है। सीएसई की कार्यक्रम निदेशक किरण पांडे के अनुसार, अधिकांश राज्यों का सबसे कमजोर पक्ष किसानों के लिए कल्याण कार्यक्रम रहे हैं, जहां अपेक्षित प्रगति देखने को नहीं मिली।

सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर प्रदर्शन 

सार्वजनिक स्वास्थ्य श्रेणी में गोवा, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, केरल और सिक्किम शीर्ष पांच राज्यों के रूप में सामने आए हैं। दूसरी ओर मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और छत्तीसगढ़ सबसे निचले स्थानों पर रहे।

केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली ने सर्वोच्च रैंक हासिल की, जबकि दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव सबसे नीचे रहे।

रिपोर्ट के अनुसार, गोवा भारत का एकमात्र राज्य है जहां सभी पंजीकृत मौतों का चिकित्सकीय प्रमाणन (मेडिकल सर्टिफिकेशन ) किया जाता है और मृत्यु के कारणों का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध है। हालांकि, राज्य के सामने प्रति 1,000 आबादी पर सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की कमी एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।

इस श्रेणी में 16 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश आधे से कम अंक प्राप्त कर सके हैं। इनमें सबसे बड़ी चिंता पर्यावरणीय जोखिम है, जिसे वायु प्रदूषण के कारण होने वाले डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स के आधार पर मापा गया है। रिपोर्ट बताती है कि कमजोर प्रदर्शन करने वाले अधिकांश राज्यों में वायु प्रदूषण जनित स्वास्थ्य बोझ एक प्रमुख समस्या बनकर उभरा है।

सार्वजनिक अवसंरचना और मानव विकास में स्थिति

सार्वजनिक अवसंरचना और मानव विकास के आधार पर किए गए आकलन में गोवा, नागालैंड, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु शीर्ष पांच राज्यों के रूप में उभरे हैं। इसके विपरीत झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश सबसे निचले स्थानों पर रहे। 

केंद्र शासित प्रदेशों में दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव ने सर्वोच्च रैंक प्राप्त की, जबकि लक्षद्वीप सबसे नीचे रहा।

रिपोर्ट के अनुसार, इस श्रेणी में 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 32 का प्रदर्शन आधे से कम अंक के स्तर पर रहा। विश्लेषण से पता चलता है कि सार्वजनिक अवसंरचना विशेषकर सड़क, बिजली और आवास अधिकांश राज्यों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

डाउन टू अर्थ के प्रबंध संपादक रिचर्ड महापात्रा का कहना है कि भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों का शीर्ष रैंकिंग में न होना एक गंभीर संकेत है। उनके अनुसार, “यह दर्शाता है कि देश की बड़ी आबादी अभी भी विकास के प्रमुख संकेतकों पर मजबूत प्रदर्शन का लाभ नहीं उठा पा रही है। इसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, सामाजिक समानता और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में भारत की समग्र प्रगति अपेक्षाकृत धीमी रह सकती है।”

आंकड़े बताते हैं देश की असली तस्वीर

 रिपोर्ट जारी करते हुए सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा, “आज की अनिश्चित दुनिया में आंकड़े ही वह आधार हैं जो हमें वास्तविकता से जोड़े रखते हैं। इन्हीं के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि कौन-से रुझान हमारे वर्तमान और भविष्य को आकार दे रहे हैं, क्या बदल रहा है, कहां सुधार हो रहा है और कहां नहीं। आंकड़े हमें मौजूदा परिस्थितियों और पर्यावरण की वास्तविक स्थिति की स्पष्ट तस्वीर दिखाते हैं। डाउन टू अर्थ और सीएसई की यह रिपोर्ट इन बिखरे हुए आंकड़ों को एक साथ लाकर हमारी समझ को और मजबूत बनाती है।”