भारत दुनिया की सबसे बड़ी कल्याणकारी योजनाओं को चलाने वाला देश भले ही है लेकिन आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी अंतिम व्यक्ति तक बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा संबंधी कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच नहीं बन पाई है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक सार्वजनिक निवेश की मांग भी की जाती रही है, लेकिन नीतिगत लक्ष्य अभी तक हासिल नहीं हो सका है। मसलन, 2010 से अब तक देश में सार्वजनिक शिक्षा व्यय जीडीपी के लगभग 4 प्रतिशत पर स्थिर है जबकि नीतिगत लक्ष्य 6 प्रतिशत हासिल करना था। वहीं, स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का 2 प्रतिशत से कम है जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य 2025 तक 2.5 प्रतिशत खर्च करने का था।
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ द इंडियन इकोनॉमी से जुड़ी दीपा सिन्हा ने 26 जून, 2026 को इंडियन हैबिटेट सेंटर में जारी की गई ‘रियलाइजिंग राइट्स: ए हैंडबुक ऑफ वेलफेयर इन इंडिया’ के लांचिंग के मौके पर यह कहा।
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ द इंडियन इकॉनॉमी (सीएसआईई) द्वारा तैयार इस हैंडबुक में 27 लेखकों ने 18 अध्यायों के माध्यम से भारत की कल्याणकारी संरचना, उसकी उपलब्धियों, सीमाओं और भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण किया है।
हैंडबुक की लांचिंग के मौके पर सीएसआईआई से जुड़े राजेंद्रन नारायण ने कहा कि नागरिक का बुनियादी हक आज लाभार्थी शब्द में तब्दील हो चुका है। यह योजनाओं को हासिल करने वाले लोगों को सशक्त करने के बजाए, उनमें कमतरी का एहसास भर रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षों में "लाभार्थी" शब्द का प्रयोग तेजी से बढ़ा है। इससे नागरिकों को अधिकारों के धारक के बजाय राज्य से लाभ प्राप्त करने वाले व्यक्ति के रूप में देखने की प्रवृत्ति मजबूत हुई है। इसके विपरीत अधिकार आधारित दृष्टिकोण नागरिकों को अधिकारधारी मानता था।
राजेंद्रन ने कहा, “सिटीजन आइडेंटिटी बीते एक दशक में कानूनी तौर पर राइट होल्डर्स से बेनिफिशियरी में बदल चुकी है। डिलेवरी जो कि लोकल इंस्टीट्यूशन के हाथ में थी वह कैश ट्रांसफर जैसी चीजों ने ले लिया है। साथ ही अकाउंटिबिलिटी के नाम पर सोशल ऑडिट की जगह अब डिजिटल डैशबोर्ड ने ले लिया है। जहां नंबर्स पर जोर है। एक और बदलाव हुआ है कि कल्याणकारी योजनाएं पब्लिक सर्विस के तौर पर देखी जाती थीं जो अब एसेड बेस्ड हैं। यानी उन्हें घर, शौचालय और गैस जैसी चीजें दी जा रही हैं।”
अर्थशास्त्री एके शिवकुमार ने कहा, “भारत का कल्याणकारी तंत्र एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां अधिकार आधारित सार्वजनिक प्रणालियों की जगह धीरे-धीरे नकद हस्तांतरण और डिजिटल वितरण व्यवस्था को अधिक महत्व मिल रहा है। अधिकार आधारित ढांचा केवल कुछ योजनाओं का समूह नहीं था, बल्कि वह एक राजनीतिक और संस्थागत व्यवस्था थी, जिसमें नागरिकों की भागीदारी, राज्य की जवाबदेही और अधिकारों की अवधारणा केंद्रीय तत्व थे।“ उन्होंने आगे कहा, कल्याणकारी योजनाओं को केवल लाभ वितरण के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। ये योजनाएं नागरिकों और राज्य के बीच संबंधों को भी परिभाषित करती हैं। उदाहरण के लिए, आधार आधारित वितरण व्यवस्था, डिजिटल प्रणालियों और नकद हस्तांतरण को लेकर चल रही बहसों के बीच यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या ये व्यवस्थाएं लोगों की गरिमा, नागरिकता और क्षमताओं का विस्तार कर रही हैं या नहीं।
वहीं, सामाजिक सुरक्षा अब भी सरकार का एक अधूरा एजेंडा नजर आता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के अनुसार 2023 में भारत सामाजिक सुरक्षा पर अपनी जीडीपी का मात्र 4 प्रतिशत खर्च करता है। तुलना में ब्राज़ील 17 प्रतिशत, मैक्सिको 7.9 प्रतिशत, दक्षिण अफ्रीका 5.4 प्रतिशत और थाईलैंड 4.9 प्रतिशत खर्च करते हैं।
सिकुड़ता केंद्र, बढ़ती राज्यों की भूमिका
हैंडबुक के मुताबिक, सामाजिक क्षेत्र पर होने वाले कुल पब्लिक खर्च का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकारें ही वहन करती हैं। मिसाल के तौर पर 2008-09 में सार्वजनिक खर्च में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 23.6 प्रतिशत थी, जो 2024-25 में घटकर केवल 8.5 प्रतिशत रह गई है। इससे स्पष्ट होता है कि कल्याणकारी कार्यक्रमों के संचालन और वित्तपोषण में राज्यों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। वहीं, आरबीआई डेटाबेस के आंकड़ों पर आधारित 1996-97 से 2024-25 तक के ग्राफ में दिखता है कि राज्यों की यह हिस्सेदारी लगातार 75 से 85 प्रतिशत के बीच बनी रही है जबकि केंद्र सरकार की हिस्सेदारी इस दौरान घटती रही।
दीपा सिन्हा ने कहा, खाद और पेंशन जैसी योजनाओं को हटाकर हमने उन अधिकार वाली कल्याणकारी योजनाओं का चयन किया तो पाया कि इनपर बजट का भारी भरकम हिस्सा खर्च किया जा रहा है। मसलन केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर कल्याणकारी क्षेत्रों और योजनाओं पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग सात प्रतिशत तथा कुल सार्वजनिक व्यय का लगभग 21 प्रतिशत खर्च करती हैं।
डाउन टू अर्थ के एक सवाल पर उन्होंने कहा, फ्रीबीज जैसा शब्द होना ही नहीं चाहिए। यह बेकार की बहस है। कई कल्याणकारी योजनाएं लोगों के जीवन के अधिकार से जुड़ी हैं। यह लोगों का हक है। वहीं पैनल डिस्कशन के दौरान सेवानिवृत्त आईएस आरती आहूजा ने इस बात का समर्थन करते हुए कहा, दरअसल बेनिफिशियरी कहा जाना ही लोगों को कमतर करके आंकने जैसा है।
राजेंद्रन ने कहा, महिलाओं के कैश ट्रांसफर स्कीम्स में अलग-अलग राज्यों में भारी अंतर दिखाई देता है। अध्ययन के अनुसार देश के विभिन्न राज्यों में महिलाओं को मिलने वाली मासिक नकद सहायता राशि में भारी अंतर है। यह राशि 1,000 रुपए मासिक से लेकर 40,000 रूपए सालाना तक है। कुछ राज्यों में एकमुश्त भुगतान का प्रावधान है, जैसे 10,000 रूपए एकमुश्त या 1,250 रूपए मासिक के साथ 10,000 रूपए एकमुश्त तक भेजा जाता है।
अच्छे प्रयोग
हैंडबुक लांचिंग के मौके पर राजेंद्रन ने बताया कि अध्ययन में कुछ राज्यों के ऐसे प्रयोग चिह्नित किए गए हैं जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया जा सकता है। राजस्थान और इंडस एक्शन ने एमआईएस कोड को गिटहब पर सार्वजनिक किया है। दिल्ली और उत्तराखंड में दिव्यांग बच्चों के लिए लॉटरी वरीयता प्रणाली अपनाई गई है। ओडिशा और छत्तीसगढ़ में स्थानीय अधिकारियों द्वारा विकेंद्रित सत्यापन किया जाता है। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में पारिवारिक डेटाबेस से ऑटो-सत्यापन की व्यवस्था है। वहीं, पीएम-किसान के संदर्भ में आंध्र प्रदेश की रायतु भरोसा योजना उल्लेखनीय है जो 2019 में शुरू हुई और भूमिहीन वारिसों को भी लाभ देती है। ओडिशा की कालिया योजना भूमिहीन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों को भी शामिल करती है और बीमा तथा ब्याजमुक्त ऋण प्रदान करती है।
चुनौतियां और निष्कासन
अध्ययन में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन में कई ज़मीनी बाधाएं दर्ज की गई हैं। पीडीएस में पारदर्शिता के लिए दीवार लेखन, सामाजिक ऑडिट और स्थानीय शिकायत निवारण तंत्र बनाए गए हैं। डिजिटल सत्यापन की बाधा के बारे में अध्ययन में दर्ज है कि कई महिलाओं के पास मोबाइल नहीं था जिससे उनके बच्चों का ईकेवाईसी पूरा नहीं हो सका क्योंकि ओटीपी किस नंबर पर आएगा यह उन्हें याद नहीं था। मनरेगा के बारे में अध्ययन में कहा गया है कि स्पष्ट प्रोटोकॉल न होने के कारण कई मजदूरों को "काम करने को तैयार नहीं" बताकर हटाया गया जो कानून का उल्लंघन है।
अध्ययन के अनुसार आईसीडीएस में आधार से सत्यापित बच्चों की संख्या 2023-24 में 8.64 करोड़ थी जो 2024-25 में घटकर 5.81 करोड़ रह गई। इसी अवधि में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं का आधार सत्यापन 1.03 करोड़ से घटकर 0.73 करोड़ हो गया। जबकि रजिस्टर में दर्ज बच्चों की संख्या 8.91 करोड़ से घटकर केवल 8.82 करोड़ हुई और महिलाओं की संख्या 1.07 करोड़ से 1.06 करोड़ रही, यानी रजिस्टर में नाम हैं लेकिन आधार सत्यापन नहीं हो पाया।
वहीं, अधिकार-आधारित पहलों की वजह से कल्याणकारी कार्यक्रमों का दायरा और इससे लाभ पाने वालों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद आंगनवाड़ी केंद्रों की संख्या 6 लाख से बढ़कर 14 लाख हो गई है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत रियायती दरों पर खाद्यान्न हासिल करने वालों की संख्या 36.3 करोड़ से बढ़कर 81 करोड़ से अधिक हो गई है। मनरेगा के तहत हर साल 200 से 300 करोड़ व्यक्ति-दिवस का रोज़गार निर्मित हुआ है। ख़ास बात यह है कि इसमें कुल रोजगार का 55 प्रतिशत से भी ज़्यादा हिस्सा महिलाओं को मिला है।
नकदी रकम ट्रांसफर कार्यक्रमों के तेजी से फैलाव ने कल्याणकारी सेवाओं की वितरण व्यवस्था को नया स्वरूप दिया है। इसके साथ ही बढ़ते डिजिटलीकरण की वजह से कइयों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और कई मामलों में जवाबदेही से जुड़ी नई चुनौतियाँ भी उभर रही हैं।
मातृत्व लाभ, पोषण कार्यक्रमों, पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी कई प्रमुख कल्याणकारी योजनाएं अब भी लोगों तक पहुचने, फंडिंग और लागू करने से जुड़ी कमियों-ख़ामियों का सामना कर रही हैं।
अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की प्रेसिडेंट इंदु प्रसाद ने कहा है, “भारत का संविधान देश के हर एक नागरिक के लिए गरिमा, अवसर और न्याय सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। हमें आशा है कि यह हैण्डबुक इन सार्वजनिक विमर्शों को आगे बढ़ाएगी और ज्यादा से ज्यादा इंसाफ पसंद और आगे भी सभी को साथ लेकर चलने वाला भारत बनाने के लिए मिल-जुल कर किए जाने वाली कोशिशों को मजबूत बनाएगी। साथ ही, यह ऐसे ‘विकसित भारत’ की उम्मीदों को आगे बढ़ाने में योगदान देगी, जो हर किसी को साथ लेकर आगे बढ़े।”
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत की कल्याणकारी व्यवस्था ने पिछले वर्षों में उल्लेखनीय विस्तार किया है, लेकिन सार्वभौमिक, जवाबदेह और उत्तरदायी सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश और संस्थागत सुधारों की अभी भी आवश्यकता बनी हुई है। यह हैंडबुक कल्याणकारी नीतियों, सुशासन और सामाजिक न्याय पर होने वाली बहस को आगे बढ़ाने का प्रयास करती है और ऐसे विकास मॉडल की वकालत करती है जिसमें समाज के सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
प्रोफेसर और अर्थशास्त्री एके शिवकुमार ने कहा, महिलाओं की शिक्षा में बढोत्तरी हुई है और जन्मदर में कमी आई है लेकिन विडंबना यह है कि पढ़ी लिखी महिलाओं के पास रोजगार मौजूद नहीं है। जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं का लाभ यह होना चाहिए था कि महिलाओं की रोजगार में बड़ी भूमिका होती।
वहीं, डॉक्टर पीवी रमेश ने कहा कि आज भी डिलेवरी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई रिमोट एरिया में लोगो के पास वैध पहचान पत्र नहीं है और वह बहिष्करण का सामना कर रहे हैं। वह ऐसे लोग हैं जिन्हें सामाजिक योजनाओं की सख्त जरूरत है लेकिन वह सिस्टम की बेचारगी का सामना कर रहे हैं।
पैनल डिस्कशन में कहा गया, कल्याणकारी योजनाओं की चर्चा केवल लाभों और कार्यक्रमों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि संविधान के नीति निर्देशक तत्वों और सामाजिक न्याय की मूल भावना के संदर्भ में भी की जानी चाहिए। नए कल्याणवाद की भी समीक्षा की गई। विशेष रूप से नागरिक की पहचान को अधिकारधारी के रूप में देखने की अवधारणा को महत्वपूर्ण बताया गया।
हैंडबुक स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर भी जोर देती है। 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों और ग्राम सभाओं को जो महत्व मिला था, वह अधिकार आधारित योजनाओं के कार्यान्वयन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। लेकिन नई डिजिटल आधारित व्यवस्थाओं में स्थानीय संस्थाओं की भूमिका कमजोर होती दिखाई देती है और निर्णय प्रक्रिया अधिक केंद्रीकृत होती जा रही है।