डाउन टू अर्थ, हिंदी के 10 साल: पर्यावरणीय सरोकार का एक दशक
पिछले एक दशक में डाउन टू अर्थ हिंदी के यह चुनिंदा 10 अंक दरअसल उन बदलावों और संकटों की कहानी हैं, जिन्होंने भारत के वर्तमान को गढ़ा। डाउन टू अर्थ ने इस दशक में आंकड़ों और जमीनी रिपोर्टिंग के जरिए उन सवालों को गहराई से समझने की कोशिश की है। हवा में बढ़ता प्रदूषण हो या कृषि और मॉनसून की अनिश्चितता। इन अंकों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी जैसी उम्मीदें हैं, तो स्वराज की अवधारणा पर उठते बुनियादी सवाल भी शामिल हैं। कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था की कमजोरियां उजागर कीं, जबकि भोपाल गैस त्रासदी की विरासत ने याद दिलाया कि विकास की कीमत पीढ़ियों तक चुकानी पड़ सकती है। वहीं, इंसानी व्यवहार के काम, क्रोध, लोभ जैसे विकारों को विज्ञान की कसौटी पर देखने की कोशिश भी इसी पड़ताल का हिस्सा है। ये दस अंक बीते दशक का लेखा-जोखा भर नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए चेतावनी, सवाल और उम्मीद हैं