एक वेबनार में स्टेट आफ इंडियाज एनवायरमेंट इन फिगर्स 2026 रिपोर्ट जारी की गई 
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भारत के पर्यावरण की हालत चिंताजनक, सीएसई-डाउन टू अर्थ की नई रिपोर्ट जारी

‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2026: इन फिगर्स’ रिपोर्ट में सरकारी और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर जलवायु परिवर्तन, चरम मौसमीय घटनाएं, हीटवेव, आंतरिक विस्थापन, जल, वायु, कचरा प्रबंधन, वन तथा राज्यों की स्थिति बताई गई है

DTE Staff

“हमें आंकड़ों का सहारा नहीं छोड़ना चाहिए। मैं हमेशा कहती हूं कि जिस चीज को हम मापते हैं, उसी पर काम होता है। आंकड़े केवल स्थिति नहीं बताते, बल्कि कार्रवाई की दिशा भी तय करते हैं। इसलिए बदलाव लाने के लिए विश्वसनीय डेटा (आंकड़े) बेहद जरूरी हैं।”

यह बात सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने आज यहां जारी की गई रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026: इन फिगर्स’ की भूमिका में कही है।

डाउन टू अर्थ पत्रिका और सीएसई द्वारा प्रकाशित यह वार्षिक ई-रिपोर्ट भारत में पर्यावरण और विकास से जुड़े आंकड़ों का एक अनूठा संकलन है।

सरकारी और आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन, चरम मौसम की घटनाएं, हीटवेव (लू), आंतरिक विस्थापन, जल, वायु, कचरा प्रबंधन और जंगल जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। इसके अलावा रिपोर्ट में ‘स्टेट ऑफ द स्टेट्स’ नामक एक विशेष खंड भी है, जिसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदर्शन का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

रिपोर्ट क्या कहती है?

वन और जैव विविधता

रिपोर्ट के अनुसार, 2020-21 से 2024-25 के बीच भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने लगभग 97,000 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वानिकी गतिविधियों के लिए उपयोग करने की मंजूरी दी। इस अवधि में देश के 26 राज्यों में वन भूमि के डायवर्जन में वृद्धि दर्ज की गई।

मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ता दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट बताती है कि 2020-21 से 2024-25 के बीच 10 राज्यों में हाथियों के हमलों में वृद्धि हुई। वहीं, साल 2025 के पहले छह महीनों में ही बाघों के हमलों में 40 लोगों की मौत हो चुकी है।

पर्यावरणीय अपराध

रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में पर्यावरण संबंधी अपराधों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में कुछ कम हुई, लेकिन इसके बावजूद न्याय व्यवस्था पर इनका बोझ बना हुआ है। वर्ष के अंत तक 99,000 से अधिक पर्यावरणीय मामलों का निपटारा नहीं हो सका था और वे विभिन्न अदालतों में लंबित थे।

जल संकट

रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान ने चेतावनी दी है कि दुनिया अब ‘ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी’ (जल दिवालियापन) के दौर में प्रवेश कर चुकी है। इसका मतलब है कि दुनिया के कई हिस्सों में नदियां, झीलें, भूजल भंडार, आर्द्रभूमियां, मिट्टी और हिमनद इतने अधिक क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि उनका पूरी तरह पुनर्जीवित होना मुश्किल हो गया है।

भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। रिपोर्ट बताती है कि अत्यधिक भूजल दोहन के कारण देश के प्रमुख नदी डेल्टा तेजी से धंस रहे हैं। देश के 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भूजल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है। पंजाब, राजस्थान और हरियाणा ऐसे राज्य हैं जहां भूजल का दोहन उसके प्राकृतिक पुनर्भरण (रिचार्ज) से भी अधिक है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा अप्रैल 2026 में जारी "हाउसहोल्ड सोशल कंजम्प्शन: हेल्थ" रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश की लगभग 13 प्रतिशत आबादी किसी न किसी बीमारी से पीड़ित है। यानी लगभग हर आठ में से एक भारतीय स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सामना कर रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में किशोरियों और महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में अधिक बीमारियों की सूचना दी। पिछले तीन दशकों में बीमारी की सूचना देने वाले लोगों का अनुपात लगभग दोगुना हो गया है।

हृदय रोग अब भारत के लिए सबसे बड़ा स्वास्थ्य बोझ बनकर उभरा है और इसकी चपेट में युवा भी आ रहे हैं। अपनी बीमारियों के बारे में बताने वाले 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के भारतीयों में से 2 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें हृदय से जुड़ी बीमारियां हैं।

30,600 से अधिक लोगों ने बीमारी और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के चलते आत्महत्याएं की, जो स्वास्थ्य संकट के सामाजिक और मानसिक प्रभावों को भी उजागर करता है।

चरम मौसम

रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने किसी न किसी प्रकार की चरम मौसमीय घटना का सामना किया। सीएसई की पर्यावरण संसाधन कार्यक्रम की निदेशक किरण पांडे ने कहा, "यह विश्लेषण सीएसई-डाउन टू अर्थ के चरम मौसम डेटाबेस पर आधारित है, जिसे 2022 से संचालित किया जा रहा है।" 2025 में देश में 99 प्रतिशत दिनों पर किसी न किसी स्थान पर चरम मौसम की घटना दर्ज की गई। इनमें हीटवेव, बाढ़, भारी वर्षा, बिजली गिरना, तूफान और अन्य मौसम संबंधी आपदाएं शामिल हैं।

इन घटनाओं के कारण 4,421 लोगों की मौत हुई, जबकि 1.74 करोड़ हेक्टेयर (17.41 मिलियन हेक्टेयर) से अधिक फसल क्षेत्र को नुकसान पहुंचा।

चरम मौसम की घटनाएं अब अपवाद नहीं, बल्कि भारत में लगभग रोजमर्रा की वास्तविकता बनती जा रही हैं, जिसका सीधा असर लोगों की जान, आजीविका और कृषि पर पड़ रहा है।

उन्होंने जोड़ा कि अब केवल मानसून ही नहीं, बल्कि मानसून से पहले और बाद के मौसम भी अधिक विनाशकारी होते जा रहे हैं। इन अवधियों में पहले की तुलना में अधिक वर्षा और बाढ़ की घटनाएं दर्ज की जा रही हैं।

मार्च और अप्रैल भारतीय किसानों के लिए जोखिम वाले महीने बनते जा रहे हैं। इन महीनों में तापमान बढ़ रहा है, नमी और बारिश अधिक हो रही है तथा ओलावृष्टि प्रभावित क्षेत्रों का दायरा भी फैल रहा है, जिससे फसलों को नुकसान का खतरा बढ़ गया है। सर्दियों के दौरान तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है और ग्लोबल वार्मिंग के स्पष्ट संकेत सामने आ रहे हैं।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि फरवरी 2026 में पहली बार देश में एक भी शीतलहर (कोल्ड वेव) दर्ज नहीं की गई। वहीं, पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश को मार्च 2026 की शुरुआत में ही गंभीर हीटवेव (लू) का सामना करना पड़ा, जो बदलते जलवायु पैटर्न का स्पष्ट संकेत है।

वायु प्रदूषण और आवाजाही

भारत में वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर पड़ने वाला बोझ लगातार बढ़ रहा है। इसके कारण श्वसन संबंधी बीमारियां, हृदय रोग, स्ट्रोक, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली और बच्चों तथा बुजुर्गों पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव बढ़ रहे हैं। वायु प्रदूषण से होने वाली वैश्विक मौतों में भारत की हिस्सेदारी 2014 के 23.76 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 25.34 प्रतिशत हो गई। यानी दुनिया में वायु प्रदूषण से होने वाली हर चार मौतों में से लगभग एक भारत में हो रही है।

साल 2023 में भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्यु दर 1 लाख आबादी पर 186 मौतें थी, जबकि वैश्विक औसत 114 मौतें प्रति लाख आबादी रहा। इससे स्पष्ट है कि भारत में वायु प्रदूषण का प्रभाव दुनिया के औसत स्तर से कहीं अधिक गंभीर है।

बाहरी वातावरण में मौजूद सूक्ष्म कण (पीएम2.5) से जुड़ी मौतों में पिछले एक दशक के दौरान 61 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह शहरीकरण, वाहनों की बढ़ती संख्या, औद्योगिक उत्सर्जन और अन्य प्रदूषण स्रोतों की चुनौती को दर्शाता है।

हालांकि एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है कि घरेलू वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में 22 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण लकड़ी, गोबर और कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों की जगह एलपीजी और अन्य स्वच्छ ईंधनों का बढ़ता उपयोग है।