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विकास

क्रिटिकल्स मिनरल्स : आयात निर्भरता घटाने के लिए रिसाइक्लिंग पर बड़ा भरोसा

रीसाइक्लिंग, खनिज खोज और औद्योगिक कचरे से पुनर्प्राप्ति पर दांव, क्रिटिकल मिनरल्स सुरक्षा के लिए भारत की तीन-स्तरीय रणनीति

Vivek Mishra

भारत की बढ़ती औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं के बीच क्रिटिकल मिनरल्स की सुरक्षित आपूर्ति एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे समय में नई दिल्ली में आयोजित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (आईसीसी) के 15वें इंडिया मिनरल्स एंड मेटल्स फोरम में नीति निर्माताओं, खनन कंपनियों और इस्पात उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस बात पर जोर दिया कि देश की खनिज सुरक्षा केवल नए खनन पर निर्भर नहीं रह सकती। इसके लिए घरेलू खनिज खोज, ई-कचरे और बैटरी कचरे की रीसाइक्लिंग तथा औद्योगिक अपशिष्ट से मूल्यवान खनिजों की पुनर्प्राप्ति- इन तीनों मोर्चों पर एक साथ आगे बढ़ना होगा। वक्ताओं का कहना था कि अगले दो दशकों में इस्पात और धातु उद्योग के तेजी से विस्तार के बीच यही रणनीति भारत की आयात निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भर आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की आधारशिला बन सकती है।

'मिनरल्स टू मेटल्स' विषय पर आयोजित सम्मेलन की शुरुआत आईसीसी की नेशनल एक्सपर्ट कमेटी ऑन मिनरल्स एंड मेटल्स के अध्यक्ष डॉ. पंकज सतीजा ने की। उन्होंने बताया कि हाल ही में कोकिंग कोल को शामिल किए जाने के बाद भारत की क्रिटिकल मिनरल्स सूची में अब 31 खनिज शामिल हैं। इनका उपयोग स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में होता है।

उन्होंने कहा, "क्रिटिकल मिनरल्स भारत के भविष्य को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं। ये स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर रक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और उन्नत विनिर्माण तक हर क्षेत्र के लिए जरूरी हैं। सरकार तीन मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है- घरेलू खोज को तेज करना, ई-कचरे को रीसाइक्लिंग के जरिए मूल्यवान संसाधन में बदलना और स्टील स्लैग तथा फ्लाई ऐश जैसे औद्योगिक अपशिष्ट से क्रिटिकल मिनरल्स की पुनर्प्राप्ति करना। 500 से अधिक ब्लॉकों में पहले से खोज चल रही है। अमेरिका और अर्जेंटीना जैसे देशों के साथ साझेदारी भी हमारी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत कर रही है।"

डॉ. सतीजा ने बताया कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी साझेदारियों का विस्तार कर रहा है। उन्होंने कहा कि 4 फरवरी 2026 को 'फोर्ज' पहल और 20 फरवरी 2026 को 'पैक्ट' पहल के तहत भारत और अमेरिका के बीच क्रिटिकल मिनरल्स क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाया गया। इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान लिथियम रिफाइनिंग, कैथोड सामग्री, रीसाइक्लिंग, फीडस्टॉक कॉरिडोर और सिंथेटिक ग्रेफाइट उत्पादन जैसे विषयों पर चर्चा हुई। उनके अनुसार भारत अर्जेंटीना समेत लैटिन अमेरिका के अन्य देशों के साथ भी खनिज संसाधनों तक पहुंच बढ़ाने के लिए सहयोग का दायरा बढ़ा रहा है।

सम्मेलन में नीति आयोग के कार्यक्रम निदेशक अनुपम लाहिड़ी ने कहा कि घरेलू खनिज खोज से व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में अभी काफी समय लगेगा। ऐसे में मौजूदा अपशिष्ट से मूल्यवान खनिज निकालना भारत के लिए सबसे तेज और व्यावहारिक विकल्प साबित हो सकता है।

उन्होंने कहा, "भारत की क्रिटिकल मिनरल्स यात्रा केवल खनन पर निर्भर नहीं रह सकती। घरेलू खोज में समय लगेगा, इसलिए हमें उन संसाधनों पर भी ध्यान देना होगा जो पहले से हमारे आसपास मौजूद हैं। ई-कचरा, बैटरी कचरा, खदानों का ओवरबर्डन और टेलिंग्स, यदि सही व्यवस्था विकसित की जाए, तो क्रिटिकल मिनरल्स के महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं। रीसाइक्लिंग को व्यावसायिक रूप से लाभकारी बनाना होगा, उद्योग के लिए सही प्रोत्साहन देने होंगे और नई तकनीकों को प्रयोगशाला से बाहर लाना होगा। विदेशी साझेदारियां अपनी जगह महत्वपूर्ण रहेंगी, लेकिन निकट भविष्य में रीसाइक्लिंग ही भारत के लिए अपनी क्रिटिकल मिनरल्स आपूर्ति मजबूत करने का सबसे तेज और व्यावहारिक रास्ता है।"

लाहिड़ी ने बताया कि नीति आयोग ने इस दिशा में एक तकनीकी समिति गठित की है। इस समिति के समक्ष कोल इंडिया, सिंगरेनी कोलियरीज, जिंदल स्टील और अडानी समूह ने प्रस्तुतियां दी हैं। समिति यह आकलन कर रही है कि खदानों के टेलिंग्स और ओवरबर्डन डंप से कितने मूल्य के क्रिटिकल मिनरल्स निकाले जा सकते हैं। उन्होंने नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन द्वारा फ्लाई ऐश से रेयर अर्थ तत्वों की सफल पुनर्प्राप्ति को इस दिशा में शुरुआती सफलता का उदाहरण बताया।

उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न अभी भी अनसुलझे हैं। उदाहरण के लिए, यदि पहले से लाइसेंस प्राप्त किसी कोयला खदान से बाद में क्रिटिकल मिनरल्स की भी प्राप्ति होती है, तो उस पर रॉयल्टी किस प्रकार लागू होगी, इसे लेकर स्पष्ट नीति नहीं है।

लाहिड़ी ने यह भी बताया कि खनन मंत्रालय के तहत तीन केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के संयुक्त उद्यम 'खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड' द्वारा ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और हाल में अमेरिका में खनिज परिसंपत्तियां हासिल करने की दिशा में काम किया जा रहा है। हालांकि कई देशों में अयस्क का प्रसंस्करण स्थानीय स्तर पर करना अनिवार्य है। ऐसे में भारत को उन खनिजों से होने वाले मूल्य संवर्धन का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

टाटा स्टील के फेरो अलॉयज एंड मिनरल्स डिवीजन के कार्यकारी प्रभारी सुशांत कुमार मिश्रा ने क्रिटिकल मिनरल्स की जरूरत को भारत के इस्पात उत्पादन लक्ष्यों से जोड़ते हुए कहा कि देश का इस्पात उत्पादन मौजूदा लगभग 15-16 करोड़ टन से बढ़ाकर 2030 तक 30 करोड़ टन और 2047 तक 50 करोड़ टन करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने बताया कि टाटा स्टील की वर्तमान क्षमता लगभग 2.4 करोड़ टन है, जिसे बढ़ाकर 4 करोड़ टन करने की योजना है।

मिश्रा ने बताया कि कंपनी अपने फेरो अलॉय कारोबार को उच्च मूल्य वाले उत्पादों की ओर ले जा रही है और लक्ष्य है कि इसके पोर्टफोलियो का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा वैल्यू एडेड उत्पादों का हो। उन्होंने कहा कि ओडिशा की सुकिंडा घाटी में क्रोमाइट ओवरबर्डन से निकल और कोबाल्ट की पुनर्प्राप्ति पर अनुसंधान किया जा रहा है, जिसके तहत भारत में निकल पिग आयरन का सफल परीक्षण भी हो चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि खदानों के ओवरबर्डन से प्राप्त खनिजों को मौजूदा लाइसेंस व्यवस्था के तहत किस श्रेणी में रखा जाएगा, इस पर नियामकीय स्पष्टता की जरूरत है।

डेलॉइट टच टोहमात्सु इंडिया एलएलपी के कार्यकारी निदेशक तुषार चक्रवर्ती ने कहा कि यदि भारत को 2030 और 2047 के लिए तय किए गए उत्पादन लक्ष्य हासिल करने हैं, तो केवल क्षमता विस्तार पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ कच्चे माल की सुरक्षित उपलब्धता और प्रतिस्पर्धी लागत भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

उन्होंने कहा, "इस्पात, अलौह धातुओं और अन्य औद्योगिक वस्तुओं की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में चर्चा केवल उत्पादन लक्ष्य हासिल करने तक सीमित नहीं रह सकती। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह वृद्धि प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ भी बनी रहे। इसके लिए उत्पादकता बढ़ानी होगी, कच्चे माल तक भरोसेमंद पहुंच सुनिश्चित करनी होगी और ऐसी आपूर्ति श्रृंखला विकसित करनी होगी जो भविष्य में आने वाले व्यवधानों का सामना कर सके। भारत ने 2030 और 2047 के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए हैं, लेकिन उन्हें हासिल करने में क्षमता विस्तार के साथ-साथ लागत प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। अब उद्योग को ऐसे कच्चे माल के तंत्र के निर्माण पर ध्यान देना होगा जो दीर्घकालिक विकास के साथ भारतीय विनिर्माण को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए रख सके।"

सम्मेलन में अथा एंड अमलगम स्टील समूह के प्रोजेक्ट्स अध्यक्ष एन. डी. राव ने लौह अयस्क की गुणवत्ता और खनिजीय संरचना के संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि विभिन्न प्रकार के लौह अयस्कों में लौह की मात्रा अलग-अलग होती है। मैग्नेटाइट में लगभग 72.3 प्रतिशत, हेमेटाइट में 69.8 प्रतिशत, गोएथाइट में करीब 62.5 प्रतिशत और साइडराइट में 50 प्रतिशत से भी कम लौह होता है। यही अंतर प्रसंस्करण लागत और धातु की पुनर्प्राप्ति को सीधे प्रभावित करता है।

उन्होंने बताया कि भुवनेश्वर की एक प्रयोगशाला में ऐसी रिडक्शन रोस्टिंग तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है, जिसके माध्यम से निम्न गुणवत्ता वाले गोएथाइट और लिमोनाइट अयस्क को मैग्नेटाइट में बदला जा सकता है। इससे लौह की मात्रा बढ़कर 67 से 70 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

राव ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के प्रोफेसर के. ए. नटराजन के साथ बायोलीचिंग परीक्षणों का नेतृत्व किया था। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुस्तान जिंक ने कई दशक पहले जिंक प्रसंस्करण अपशिष्ट से चांदी निकालने का कार्यक्रम शुरू किया था, जिसने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा चांदी उत्पादक बनने में मदद की। उन्होंने वडोदरा स्थित रुबामिन द्वारा ई-कचरे से लिथियम की सफल पुनर्प्राप्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि यह भारत के "कचरे से संपदा" मॉडल की व्यावसायिक संभावनाओं को दर्शाता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि देश के समुद्री तटों पर मौजूद रेयर अर्थ खनिज भंडार का अभी भी पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है, क्योंकि इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित है।

लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी के कार्यकारी निदेशक (एक्सप्लोरेशन एंड बेनिफिसिएशन) आर. आर. सतपथी ने कहा कि वैज्ञानिक, टिकाऊ और जिम्मेदार खनन के बीच अंतर को समझना जरूरी है। उनके अनुसार भारतीय खनन कंपनियां वैज्ञानिक और टिकाऊ खनन के क्षेत्र में तो काफी आगे बढ़ चुकी हैं, लेकिन जिम्मेदार खनन की दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है।

उन्होंने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले स्थित सुरजगढ़ लौह अयस्क खदान का उदाहरण देते हुए कहा कि यह क्षेत्र कभी उग्रवाद प्रभावित होने के कारण जाना जाता था, लेकिन अब वहां पूरी तरह विद्युतीकृत खनन व्यवस्था विकसित की जा रही है। उन्होंने बताया कि बैटरी चालित डंपर, शॉवेल और लोडर के इस्तेमाल से कार्बन उत्सर्जन लगभग 11-12 किलोग्राम प्रति टन से घटकर 3-3.5 किलोग्राम प्रति टन रह गया है। वर्ष के अंत तक 110 मेगावाट क्षमता वाली सौर और पवन ऊर्जा आधारित हाइब्रिड बिजली परियोजना शुरू होने के बाद इसे घटाकर 1-1.5 किलोग्राम प्रति टन तक लाने का लक्ष्य है।

सतपथी ने बताया कि कंपनी 4.5 करोड़ टन क्षमता का बेनिफिसिएशन संयंत्र तीन चरणों में विकसित कर रही है। प्रत्येक चरण की क्षमता 1.5 करोड़ टन होगी और पहला चरण सितंबर 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है। उनके अनुसार इस परियोजना से न्यूनतम उपयोग योग्य अयस्क ग्रेड कम हो जाएगा, जिससे खदान का उपयोग योग्य संसाधन आधार बढ़कर 100 करोड़ टन से अधिक हो गया है।