वो आए घर में हमारे, खुदा की कुदरत है,
कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं।
— मीर तकी 'मीर'
दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर का उद्घाटन 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया जिसे बनाने में 12,000 करोड़ रुपए की लागत आई है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड तीन राज्यों से होकर गुजरने वाले इस 6-लेन एक्सेस कंट्रोल्ड हाइ स्पीड कॉरिडोर से अब 6 की बजाय महज दो-ढाई घंटे में ही दिल्ली-देहरादून के बीच की 213 किमी लंबी दूरी नॉन स्टॉप तय की जा सकेगी।
उत्तराखंड के लिए महत्वपूर्ण इस परियोजना के कार्यान्वयन में निर्बाध हाइ स्पीड कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए 10 इंटरचेंज, तीन रेलवे ओवरब्रिज (आरओबी), चार प्रमुख पुल और सड़क किनारे 12 जन सुविधाओं (वे साइड अमेनिटीज) का निर्माण भी शामिल है। यात्रियों के लिए सुरक्षित और अधिक कुशल यात्रा अनुभव प्रदान करने के लिए यह कॉरिडोर उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली (एटीएम) से सुसज्जित है।
इस परिघटना को दूसरे चश्मे से देखते हैं तो विख्यात शायर मीर तकी 'मीर' साहब बेसाख्ता याद आते हैं जिनका उपरोक्त शेर इस मौजूं पर सटीक बैठता है क्योंकि सचमुच वे आए हमारे घर में बड़ी शान से, हम कभी उन्हें तो कभी अपने घर को देखते हैं।
वजह है कुमाऊं क्षेत्र को हरिद्वार-देहरादून से सीधे-सीधे जोड़ने वाली ब्रिटिशकालीन कंडी सड़क की दयनीय दशा।
उत्तराखंड में गोरखों से 1815 में शासन-सत्ता छीनने और फिर 1816 की सिगौली संधि के बाद अंग्रेजों ने कुमाऊं तथा ब्रिटिश गढ़वाल में 1820-30 के दशक से सड़क निर्माण सक्रिय रूप से शुरू किया।
ट्रेल नामक अंग्रेज अधिकारी ने 1827-28 में हरिद्वार-बदरीनाथ मार्ग की शुरुआत की। इसके अलावा 1835-41 तक पहाड़ी, भाबर व तराई क्षेत्र में विभिन्न सड़कें निर्मित हुईं तो पूर्व में नेपाल सीमा पर टनकपुर से बनबसा, चोरगलिया, हल्द्वानी, कालाढूंगी, पवलगढ़, रामनगर से लेकर पश्चिम में कालागढ़, पाखरो, कोटद्वार, लालढांग होते हुए हरिद्वार तथा उससे भी आगे कासरो, दुधली, बंजारावाला, देहरादून तक सब माउंटेन रोड भी बनाई गई जो स्थानीय बोली में कंडी सड़क कही जाती है।
हरिद्वार का धार्मिक महत्व होने तथा तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर हेनरी रेम्जे द्वारा रामनगर मंडी बसाने से इस 'कंडी सड़क' का इस्तेमाल रामनगर से कालागढ़, कोटद्वार, लालढांग होते हुए हरिद्वार के चंडीघाट तक काफी होने लगा।
ब्रिटिश शासन के दौरान पहले केवल पैदल और भेड़-बकरी, घोड़े-खच्चर मार्ग ही थे।
जब अंग्रेजों ने पहाड़ों, खास तौर से तिब्बत की ओर ध्यान देना शुरू किया तो उन्होंने सैन्य तथा प्रशासनिक सुगमता के लिए दक्षिण में मैदानी इलाकों से उत्तर के पर्वतीय क्षेत्रों की ओर सड़क निर्माण पर जोर दिया। इसके बाद धीरे-धीरे मोटर योग्य सड़कें बनीं।
ब्रिटिश काल में पहले जंगलों से लकड़ी ढुलाई के लिए और फिर यात्रियों के लिए रेल गाड़ियों का प्रचालन किया गया। इस तरह हल्द्वानी में 1880, काठगोदाम 1884, हरिद्वार 1886, कोटद्वार मालगाड़ी 1889-90, यात्री 1901, देहरादून में 1897-1899, रामनगर 1907-1908 और टनकपुर में 1909-1910 में रेलगाड़ी आई।
कुमाऊं के इन रेलमार्गों का निर्माण रुहेलखंड एंड कुमाऊं रेलवे कंपनी तथा गढ़वाल क्षेत्र में अवध एंड रुहेलखंड रेलवे निजी ब्रिटिश कंपनियों द्वारा किया गया था, जिनका उद्देश्य जनसेवा नहीं बल्कि आर्थिक दोहन, संसाधन परिवहन और औपनिवेशिक नियंत्रण था।
उत्तराखंड में पहला मोटर मार्ग काठगोदाम से नैनीताल तक बना और फिर 1910 के दशक में इस पर पहली बार मोटर कार/बसें चलनी शुरू हुईं।
गढ़वाल क्षेत्र के भौगोलिक रूप से अधिक दुर्गम होने से यहाँ सड़क निर्माण देर से हुआ और इसीलिए इस क्षेत्र में मोटर वाहनों का संचालन कुमाऊं की तुलना में थोड़ा देर से, लगभग 1920-1930 के दशक में शुरू हुआ था। जिसका प्रारम्भ सबसे पहले मैदानी भाग से पहाड़ों को जोड़ने वाली कोटद्वार-पौड़ी सड़क से किया गया था।
आजादी के बाद इसी कंडी सड़क पर टनकपुर से हरिद्वार तक नवंबर से जून के बीच मोटर गाड़ी से यातायात शुरू हुआ। जिसमें कुमाऊं मोटर ओनर्स यूनियन द्वारा टनकपुर-हल्द्वानी और हल्द्वानी-रामनगर के बीच तथा रामनगर से कोटद्वार और हरिद्वार तक गढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन द्वारा यात्री बसों का संचालन किया जाता था। जिसे 2019-20 में कुछ एनजीओ के दबाव में बंद कर दिया गया।
रामनगर से कोटद्वार होकर हरिद्वार तक 'कंडी सड़क' से दूरी लगभग 95-98 किमी है, जबकि वर्तमान में धामपुर-नजीबाबाद (उत्तर प्रदेश) होकर जाने पर इसकी लंबाई लगभग 190 किमी है।
पुरानी कंडी सड़क से रामनगर को सीधे-सीधे हरिद्वार से जोड़ने के लिए रामनगर और कोटद्वार में अनेक बार जनांदोलन किए गए हैं। जिनमें 23 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर हरिद्वार जेल में बंद कर दिया गया और वे अब भी मुकदमा झेल रहे हैं। इसी माँग को लेकर आज भी कोटद्वार और लालढाँग के बीच चिलरखाल में सैकड़ों लोग 220 दिन से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि पहाड़ी तथा मैदानी इलाकों को विभाजित करने वाला यह पूरा मार्ग खुलने पर कुमाऊं क्षेत्र से हरिद्वार जाने वालों के लिए इसकी लंबाई 90-95 किमी कम हो जाएगी, जबकि वर्तमान समय में लोगों को 185-190 किमी लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।
पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद कुमाऊं से हरिद्वार, कोटद्वार, राजधानी देहरादून तथा गढ़वाल मंडल के अन्य इलाकों को जाने वाले वाहनों की दैनिक संख्या सैकड़ों में है। जो रामनगर, काशीपुर, नजीबाबाद वाले लंबे रास्ते से होकर गुजरते हैं।
इससे प्रतिदिन जलने वाला लाखों रुपए का ईंधन, पर्यावरण प्रदूषण, श्रमशक्ति का अपव्यय, सड़क तथा वाहनों की टूट-फूट, वाहन चालकों व यात्रियों की थकान आदि विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जाए तो इसकी अपेक्षाकृत छोटे मार्ग से यात्रा करना कहीं ज्यादा बेहतर विकल्प है।
इस सड़क को दिल्ली-देहरादून इकनॉमिक कॉरिडोर की तरह 6-लेन, 4-लेन या चौड़ा करने की माँग नहीं की जा रही है। आंदोलनकारी इस पर सिर्फ और सिर्फ पहले की तरह यातायात व्यवस्था शुरू करने की जरूरत बता रहे हैं। जिसमें इस पूरे मार्ग पर एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा।
जहाँ तक इस सड़क का जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क तथा राजाजी नेशनल पार्क के भीतरी हिस्से से होकर गुजरने का सम्बंध है, इस पर आंदोलनकारी रवीन्द्र सौंड, हेमा नेगी और प्रवीण थापा का कहना है कि लगभग 95-98 किमी लंबी इस सड़क में सिर्फ चिल्लरखाल से हरिद्वार की ओर 4.7 किमी एलिवेटेड रोड बनाने से इसका भी समाधान हो जाता है।
इस सड़क पर सुचारु यातायात व्यवस्था संचालन के लिए रामनगर में लंबे समय तक संघर्ष करते रहे आंदोलनकारी प्रभात ध्यानी कहते हैं कि मोटर परिवहन से लोगों की दिन-रात आवाजाही से वनोपज तथा वन्य जंतुओं के अवैध शिकारियों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने में पुलिस-प्रशासन और वनकर्मियों को मदद मिलती है।
इसके विपरीत सड़क बंद रहने से वे अपनी कारगुजारी बेखटके जारी रख सकते हैं। उन्होंने कहा कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन में स्थित ढेला रेंज और सोना नदी रेंज व राजाजी नेशनल पार्क के पाखरो रेंज में हाथी दाँत के तस्करों की सक्रियता के सभी मामले बरसाती सीजन में सड़क यातायात बंद रहने के दौरान हुए थे। उन्होंने इस मौके का फायदा उठाया।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने 12 अप्रैल को पारित निर्णय में वन विभाग की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश काल में बनी इस 'कंडी सड़क' पर गैर-व्यावसायिक वाहनों के आवागमन के लिए केवल दिन के समय खुला रखने की स्वीकृति दे दी है। आंदोलनकारियों के अनुसार राज्य सरकार की ओर से न्यायालय में सही ढंग से पैरोकारी नहीं करने से यह आधा-अधूरा आदेश दिया गया है। जबकि जनता सभी तरह के वाहनों के निर्बाध संचालन का स्थाई समाधान चाहती है।
आंदोलनकारी जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चिल्लरखाल में धरना-प्रदर्शन करने वाले आंदोलनकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल प्रदेश शासन से वार्ता के लिए आज देहरादून गया है, देखते हैं ऊंट किस करवट बैठता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं। लेख में व्यक्त उनके निजी विचार हैं