छत्तीसगढ़ की सपनों की निर्माणाधीन राजधानी को बनते 25 साल हो गए हैं, लेकिन जिन किसानों की जमीनें अधिग्रहित की गई हैं, उन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिल पाया है। राज्य की नई राजधानी की बुनियाद किसानों के असंतोष पर खड़ी हुई है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी शिकायत जबरन अधिग्रहित की गई जमीन और गैरवाजिब मुआवजे की है।
नई राजधानी प्रभावित किसान कल्याण समिति के अध्यक्ष रुपन चंद्राकर ने डाउन टू अर्थ से कहा, ‘जमीनी हकीकत यह है कि बिलासपुर जिले में स्थित राज्य के उच्च न्यायालय में 6,000 से अधिक शिकायतें किसानों द्वारा दायर की गई हैं। ये सभी मामले अभी तक लंबित हैं।
आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है।’ चंद्राकर का कहना है कि ये मामले आजकल के नहीं हैं, बल्कि 2011 से लंबित हैं। वह बताते हैं कि 16 साल हो गए, अब तक इस संबंध में कोई निर्णय नहीं हुआ है, बस तारीख-दर-तारीख मिल रही है।
अधिगृहित जमीनों के किसान अब रायपुर जाकर मजदूरी करने पर मजबूर हैं। वह कहते हैं कि आखिर उन्हें अपने परिवार का पेट भी भरना है।
ध्यान रहे कि आज के वर्तमान मुख्यमंत्री का जो नई राजधानी का सपना है, इसे वास्तव में राज्य के पहले मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी की कांग्रेस सरकार ने देखा था। इसे आगे बढ़ाने का कार्य बाद की सरकारों ने किया।
लेकिन, यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि जोगी सरकार ने जब इस परियोजना क्षेत्र के लिए ली जाने वाली जमीन की बिक्री पर रोक लगाई थी, तब वर्तमान सरकार ने इसका विरोध किया था।
तबके सांसद पुन्नू लाल मोहले ने इस संबंध में उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र तक लिखा था। जोगी द्वारा स्थापित कैपिटल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी को अब नया रायपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी नाम दिया गया है।
स्वतंत्रता के बाद देश में कई राज्यों में नए शहर बसाए गए हैं। जैसे जमशेदपुर, भिलाई, गांधीनगर, चंडीगढ़ आदि। लेकिन, इन शहरों को बसाने में इतना अधिक समय नहीं लगा, जितना छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 17 किलोमीटर दूर एक नई राजधानी यानी नया रायपुर बसाने में लग रहा है।
बीस साल पहले यह योजना शुरू हुई थी, और अब तक पूरी नहीं हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका निर्माण जिस गति से चल रहा है, उससे लगता है कि आने वाले दो दशक तक भी पूरा नहीं होने वाला है।
आधे-अधूरे बने इस नए शहर को एकबारगी देखने पर लगता है कि आप किसी यूरोपीय देश के शहर में पहुंच गए हैं। जमीनी हकीकत यह है कि इस नए शहर, यानी नया रायपुर को बसाने के लिए 41 गांवों की 8,013 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण किया गया है।
अधिग्रहित किए गए एक कोटराभाटा गांव के सरपंच ललित कुमार यादव ने बताया कि अब नया रायपुर को नवा रायपुर अटल नगर नाम दिया गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस नगर को बसाने के लिए जिस तरह से हमारी ‘अमीर धरती’ यानी पूरी तरह से उपजाऊ जमीन को जोर जबरदस्ती से अधिग्रहित किया गया, उससे हम लोग जो इस अमीर धरती के मालिक थे, अब गरीब किसान बन कर रह गए हैं।
हालांकि अधिकृत तौर पर अब इसे एक तहसील का भी दर्जा भी दे दिया गया है, लेकिन अब तक नई राजधानी के निर्माण के लिए अधिग्रहित किए गए 41 गांवों के लगभग 50 हजार परिवारों को पूरा मुआवजा नहीं मिला है।
नई राजधानी प्रभावित किसान कल्याण समिति के अध्यक्ष रुपन चंद्राकर का कहना है कि हम अपनी जमीन पर राजा थे। यह जमीन पूरी तरह से उपजाऊ और सिंचित थी। ऐसे में इस क्षेत्र के किसानों को किसी प्रकार की कमी नहीं थी।
लेकिन, नई राजधानी के निर्माण के नाम पर हमसे हमारे खेत ले लिए गए। क्षेत्र के किसानों की हालत दिन प्रति दिन और दयनीय होती जा रही है। उनका कहना है कि सरकार ने हमें जो जमीन का मुआवजा दिया, वह बहुत कम है।
ध्यान रहे कि राज्य सरकार ने सिंचित जमीन का मूल्य 5.80 लाख रुपए प्रति एकड़ और असिंचित जमीन का मूल्य 5.40 रुपए लाख प्रति एकड़ दिया। जबकि इसकी वास्तविक कीमत करोड़ों में है।
इस संबंध में समिति के सचिव कामता प्रसाद रात्रे ने ‘डाउन टू अर्थ’ को बताया कि सरकार ने हमसे तो कम रेट पर जमीन हथिया ली, लेकिन हमारी इन जमीनों को बाद में प्लाट काट कर करोड़ों रुपए में बिक्री कर रही है। हमसे वादा किया गया था कि इस जमीन पर काटे गए प्लाट का बीस प्रतिशत हिस्सा किसानों को दिया जाएगा, लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो पाया है।
चमचाती हुई सड़कें, बाटेनिकल गार्डन, सेंट्ल पार्क, अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम, जंगल सफारी, और ऐसी भव्य इमारतें जिसका उद्घाटन करने के लिए देश के प्रधानमंत्री तक आते हैं। 25 बाई 25 किलोमीटर क्षेत्र में बसने वाले नवा रायपुर अटल नगर को वर्तमान में देखते हुए लगता है कि आप सपनों के शहर में आ पहुंचे हैं।
लेकिन पिछले 25 सालों से निमार्णाधीन इस शहर में अब भी शहरवासियों की जरूरत है। इस शहर में हर निर्माण कार्य भव्य तो अवश्य लगता है, लेकिन चारों ओर सन्नाटा पसरा है।
यहां मजदूर छोड़कर कोई नहीं रहता है। हालात ये हैं कि रेलवे स्टेशन की भव्य बिल्डिंग तक तैयार कर दी है, जबकि रेल लाइन अब तक नहीं बिछी है। इस संबंध में रुपन चंद्राकर ने बताया कि सरकार यह शहर 2050 को ध्यान में रखकर तैयार कर रही है।
वह सवाल करते हैं कि ढाई दशक तो हो गए इसे बनते हुए। क्या वे अब अपनी प्लानिंग की तारीख और आगे बढ़ाएंगे। शाम ढलते इस नए शहर में कोई भी आमजन आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है क्योंकि चारों ओर बिजली तो जल रही है, लेकिन सन्नाटा डराता है।
ध्यान रहे कि 2001 में प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने जब इस शहर की प्लानिंग की थी तब चेरिया पौता गांव के आसपास के केवल 12 गांवों को अधिग्रहित करने की योजना थी। लेकिन, सरकार के बदलने के बाद नई सरकार ने इसे बढ़ाकर शुरू में तो 61 कर दिया था, बाद में इसे घटा कर 41 गांव कर दिया। अब वर्तमान में इन्हीं 41 गांवों के किसानों के खेतों पर नवा रायपुर अटल नगर का निर्माण कार्य चल रहा है।