पेयजल और स्वच्छता क्षेत्र में केंद्र सरकार का खर्च अगले वित्त वर्ष में अचानक उछलता दिख रहा है, लेकिन यह बढ़ोतरी जितनी चमकदार दिखती है, उसकी कहानी उतनी सीधी नहीं है। वित्त वर्ष 2026-27 बजट के आंकड़े दरअसल यह बता रहे हैं कि एक साल की धीमी रफ्तार के बाद अब योजनाओं को फिर “मिशन मोड” में धकेलने की कोशिश हो रही है। हालांकि, यह फिर जमीन पर उतरेगी या नहीं, यह संशय का विषय है।
1 फरवरी, 2026 को संसद में पेश किए गए वित्त वर्ष बजट 2026-27 से सबसे बड़ी तस्वीर जल जीवन मिशन से सामने आती है, जो हर ग्रामीण घर तक नल से पानी पहुंचाने का वादा करता है।
जल जीवन मिशन के भीतर सबसे बड़ा हिस्सा प्रोग्राम कम्पोनेंट का है, जहां से असली फील्ड काम जैसे पाइपलाइन बिछाना, जल स्रोत विकसित करना और घर-घर नल कनेक्शन देना आदि चलता है। इसी मद में खर्च की गति का अंतर साफ दिखता है। 2025-26 के बजट अनुमान में इस प्रोग्राम कम्पोनेंट के लिए 66,770.47 करोड़ रुपये रखे गए थे, लेकिन संशोधित अनुमान में यह घटकर सिर्फ 16,944.44 करोड़ रुपये रह गया। यानी लगभग 49,826 करोड़ रुपए का नियोजित खर्च जमीन पर नहीं उतर पाया।
अब वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में यही मद फिर बढ़ाकर 67,363.50 करोड़ रुपए कर दिया गया है। यह उतार-चढ़ाव साफ बताता है कि परियोजनाएं तय रफ्तार से आगे नहीं बढ़ीं, इसलिए पिछले साल की अधूरी भौतिक प्रगति और वित्तीय दायित्व अगले साल में खिसक गए। अगर काम समय पर चल रहा होता, तो संशोधित बजट में इतनी बड़ी कटौती की जरूरत नहीं पड़ती।
आम तौर पर ऐसा तब भी होता है जब राज्यों से प्रस्ताव देर से आए हों, टेंडर प्रक्रिया अटकी हो, या परियोजनाओं का जमीनी काम अनुमान से धीमा चला हो।
अब अगले वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में जल जीवन मिशन को तेज धक्का देने की जरूरत महसूस की गई है। मिशन के भीतर भी यह साफ दिखता है कि प्रोग्राम कम्पोनेंट, यानी असली फील्ड कार्य जैसे - पाइपलाइन बिछाना, स्रोत विकास, घर-घर कनेक्शन पर ही सबसे बड़ी राशि डाली गई है।
गांव में स्वच्छ भारत मिशन
कुछ ऐसा ही पैटर्न स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) में भी दिखाई देता है, हालांकि पैमाना छोटा है। 2025-26 के बजट अनुमान में जहां 7,192 करोड़ रुपये रखे गए थे, संशोधित अनुमान में यह घटाकर 6,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। अब 2026-27 में फिर वही 7,192 करोड़ रुपये का स्तर लौटा दिया गया है। इससे संकेत मिलता है कि शौचालय निर्माण के बाद अब ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन, कचरा निपटान ढांचे और खुले मैं शौच (ओडीएफ) स्थिति को टिकाऊ रखने के कामों को फिर गति देने की योजना है, लेकिन पिछले वर्ष इन गतिविधियों की रफ्तार अपेक्षित नहीं रही।
एक और महत्वपूर्ण संकेत राज्यों को दिए जाने वाले अनुदानों से मिलता है। संशोधित अनुमान 2025-26 में राज्यों को दी जाने वाली राशि काफी कम स्तर पर सिमट गई थी, जबकि 2026-27 के बजट अनुमान में इसे फिर से बहुत ऊंचे स्तर पर रखा गया है।
राज्यों को बीते वित्त वर्ष संशोधित अनुमान 18,686.02 था जबकि इस वित्त वर्ष के लिए 63,089.97 करोड़ रुपए का बजट अनुमान किया गया है। वहीं, केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 678 करोड़ रुपए का प्रावधान बीते वित्त वर्ष में संशोधित बजट में था जबकि इस वित्त वर्ष में 2156 करोड़ रुपए का अनुमान किया गया है।
चूंकि जल और स्वच्छता योजनाओं का वास्तविक क्रियान्वयन राज्यों के माध्यम से ही होता है, यह बदलाव बताता है कि केंद्र अब धन प्रवाह के जरिए राज्यों को फिर तेज काम करने के लिए प्रेरित करना चाहता है। पूर्वोत्तर क्षेत्रों के लिए आवंटन में भी तेज उछाल इसी रणनीति का हिस्सा दिखता है।
इन आंकड़ों से यह समझ आता है कि समस्या केवल पैसों की घोषणा की नहीं, बल्कि खर्च करने की क्षमता और परियोजनाओं की गति की भी है। जब बजट अनुमान ऊंचे रखे जाते हैं लेकिन संशोधित अनुमान में भारी कटौती करनी पड़ती है, तो यह संकेत होता है कि योजना के क्रियान्वयन में रुकावट आई।
अगले साल फिर वही ऊंचा बजट रखना दरअसल एक तरह का नीति संदेश है कि सरकार इन योजनाओं की राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकता कम नहीं करना चाहती, भले ही जमीन पर चुनौतियां बनी हुई हों।
यानी कागज पर यह पानी और स्वच्छता क्षेत्र के लिए बड़े उछाल का साल दिखता है, लेकिन बजट की कहानी यह भी कह रही है कि असली परीक्षा अब खर्च की गति, राज्यों की तैयारी और परियोजनाओं के समय पर पूरा होने में है। अगर यह रफ्तार नहीं सुधरी, तो अगले साल फिर यही कहानी बजट अनुमान और संशोधित अनुमान के बीच दोहराई जा सकती है।
केंद्र सरकार ने बजट प्रावधान में कहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित और पर्याप्त मात्रा में, तय गुणवत्ता का पानी हर घर तक पहुंचाने के लिए कदम बढाए जा रहे हैं। 2025-26 में इस योजना के लिए 341.70 करोड़ रुपये की संशोधित राशि और 2026-27 के बजट अनुमान में पीएम जनजातीय न्याय महा अभियान के लिए 10 लाख रुपये का प्रावधान रखा गया है। वहीं, धर्ती आबा जनजातीय ग्राम उत्थान अभियान के लिए 2025-26 में 10 लाख और 2026-27 में 11 लाख रुपये का प्रावधान है।
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता सुविधाओं के विस्तार पर जोर दे रही है। ओपन डिफेकेशन फ्री स्थिति हासिल करने के बाद अब इसका फोकस इस स्थिति को बनाए रखने और सभी ग्रामीण इलाकों में ठोस एवं द्रव अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था लागू करने पर है। इस योजना में शोध गतिविधियों के तहत नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को कमीशन देने का प्रावधान भी शामिल है।