अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी नई रिपोर्ट में खुलासा किया है कि जेनरेटिव एआई का असर अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि मौजूदा समय की हकीकत बन चुका है। आईएलओ के अनुसार, आसियान क्षेत्र में करीब 8 करोड़ लोग ऐसे पेशों में काम कर रहे हैं, जिन पर एआई का असर पड़ सकता है।
हालांकि राहत की बात यह है कि अभी बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म होने के संकेत नहीं हैं। सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी में केवल 3.3 फीसदी रोजगार आते हैं, जबकि करीब 67 फीसदी नौकरियां फिलहाल इसके सीधे दायरे से बाहर हैं। इससे साफ है कि एआई फिलहाल नौकरियां निगलने से ज्यादा काम की प्रकृति, जिम्मेदारियों और कौशल की मांग को बदल रहा है।
लेकिन इस बदलाव की सबसे चिंताजनक परत इसकी असमानता है। रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं पर एआई का जोखिम पुरुषों की तुलना में दोगुने से अधिक है, क्योंकि वे बड़ी संख्या में प्रशासनिक, क्लेरिकल और पेशेवर भूमिकाओं में हैं।
साथ ही, आसियान देशों की तैयारी भी एक जैसी नहीं है—सिंगापुर जैसे देश आगे हैं, जबकि कई अर्थव्यवस्थाएं अभी बुनियादी तैयारी के दौर में हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ तकनीक के विस्तार का नहीं, बल्कि इस बात का है कि सरकारें, कंपनियां और संस्थान इस बदलाव को कितना मानवीय, न्यायपूर्ण और श्रमिक-केंद्रित बना पाते हैं।
अगर कौशल, पुनर्प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा पर समय रहते निवेश नहीं हुआ, तो एआई उत्पादकता का इंजन बनने के साथ-साथ असमानता को भी गहरा सकता है।
जब मशीनें सिर्फ आदेश मानने के बजाय लिखने, सोचने और फैसले लेने में मदद करने लगें, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इस बदलती दुनिया में इंसानों की नौकरी कितनी सुरक्षित है? दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के लिए यह सवाल अब कल्पना नहीं, बल्कि तेजी से सामने आती हकीकत है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की नई रिपोर्ट 'जेनरेटिव एआई एंड लेबर मार्केट्स इन आसियान' बताती है कि आसियान क्षेत्र में करीब 8 करोड़ लोगों की कामकाजी जिंदगी पर जेनरेटिव एआई का असर पड़ सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि अभी तक बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म होने के संकेत नहीं मिले हैं।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी इस रिपोर्ट में आसियान के 11 देशों के श्रम बाजार पर जेनरेटिव एआई के संभावित प्रभाव का आकलन किया है। इसमें यह समझने की कोशिश की गई है कि किन पेशों पर एआई का असर सबसे ज्यादा पड़ सकता है और इस नई तकनीक को अपनाने की रफ्तार कैसी है।
आईएलओ के 2025 के अनुमान के मुताबिक, आसियान में कुल रोजगार का 22.9 फीसदी, यानी करीब 8 करोड़ लोग, ऐसे पेशों में काम कर रहे हैं जहां जेनरेटिव एआई का कुछ न कुछ असर पड़ सकता है। लेकिन इनमें से केवल 3.3 फीसदी, यानी करीब 1.17 करोड़ लोग, ऐसे कामों में हैं जिन्हें “सबसे अधिक जोखिम” वाली श्रेणी में रखा गया है।
67 फीसदी रोजगार अब भी सुरक्षित
दूसरी तरफ, क्षेत्र के करीब 67 फीसदी लोग अब भी ऐसी रोजगार से जुड़े हैं, जहां फिलहाल जेनरेटिव एआई का सीधा असर नहीं पड़ेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक जिन नौ देशों के आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें सिंगापुर सबसे आगे है, जहां 42.2 फीसदी लोग ऐसे पेशों में हैं जो जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संपर्क में आ सकते हैं। इसके बाद फिलीपींस का स्थान है, जहां यह आंकड़ा 28.1 फीसदी है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह वहां की सेवा और आईटी आधारित अर्थव्यवस्था को भी दर्शाता है। इसके बाद इंडोनेशिया (21.7 फीसदी), वियतनाम (20.8 फीसदी) और थाईलैंड (20.6 फीसदी) का नंबर आता है।
रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि जिन पेशों पर एआई का असर अधिक माना जा रहा है, उनमें रोजगार अब भी बढ़ रहा है। यानी बदलाव की संभावना बड़ी जरूर है, लेकिन फिलहाल यह व्यापक तबाही के रूप में सामने नहीं आया है।
आईएलओ के मुताबिक, एआई को अपनाने की प्रक्रिया अभी शुरुआती और असमान चरण में है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से तकनीक-आधारित पेशों में अधिक दिख रहा है, जबकि दफ्तर और प्रशासनिक कामों में, जहां जोखिम अपेक्षाकृत ज्यादा है, इसका इस्तेमाल अभी भी सीमित है।
महिलाओं पर दोगुना जोखिम
रिपोर्ट ने एआई के असर में एक बड़े लैंगिक अंतर को भी उजागर किया है। इसके मुताबिक महिलाओं के उन नौकरियों में होने की संभावना पुरुषों की तुलना में दोगुने से भी अधिक है, जहां जेनएआई का प्रभाव ज्यादा पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि महिलाएं बड़ी संख्या में क्लेरिकल, प्रशासनिक और पेशेवर भूमिकाओं में कार्यरत हैं। वहीं, 15 से 24 वर्ष के युवाओं और वयस्क कामगारों में एआई के जोखिम का स्तर लगभग समान पाया गया है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि आसियान देशों की तैयारी एक जैसी नहीं है। सिंगापुर इस मामले में सबसे मजबूत नजर आता है, जहां उन्नत डिजिटल ढांचा, कुशल मानव संसाधन और सरकार की समन्वित रणनीति मिलकर एक मजबूत एआई पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करते हैं।
ऐसे में आईएलओ ने चेतावनी दी है कि अगर एआई से उत्पादकता बढ़ानी है, अच्छी नौकरियां बनानी हैं और इसके लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने हैं, तो सरकारों को अभी से ठोस कदम उठाने होंगे।
रिपोर्ट में मानव-केंद्रित नीतियों, कौशल विकास और पुनर्प्रशिक्षण, खासकर महिलाओं और युवाओं पर विशेष ध्यान, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को एआई अपनाने में मदद, और सदस्य देशों के बीच ज्ञान व मानव संसाधन सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है।
तैयारी में क्यों पिछड़ रहे हैं देश
इस रिपोर्ट और आईएलओ से जुड़े अर्थशास्त्री क्रिश्चियन विएगेलाहन के मुताबिक, जेनरेटिव एआई के लाभ उठाने के लिए सिर्फ तकनीक तक पहुंच काफी नहीं है। असली फायदा तभी मिलेगा जब मानव संसाधन और सामाजिक सुरक्षा में निवेश किया जाए।
आखिरकार, भविष्य का श्रम बाजार सिर्फ इस बात से तय नहीं होगा कि एआई का असर कितना है, बल्कि इससे भी ज्यादा इस बात से तय होगा कि सरकारें, संस्थान और कंपनियां अपने कामगारों को इस बदलाव के लिए कितना तैयार करती हैं।
एक बात अब पूरी तरह स्पष्ट है, एआई का दौर भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि हमारे मौजूदा समय की हकीकत बन चुका है। यह बदलाव कामकाज की दुनिया, नौकरियों की प्रकृति और अर्थव्यवस्था की दिशा को तेजी से प्रभावित कर रहा है।
ऐसे में असल सवाल यह नहीं कि बदलाव आएगा या नहीं, बल्कि यह है कि यह बदलाव किसके हित में काम करेगा। क्या एआई केवल तकनीक और मुनाफे को आगे बढ़ाने का माध्यम बनेगा, या फिर इसे इस तरह अपनाया जाएगा कि इंसान, रोजगार, श्रमिकों की गरिमा और सामाजिक सुरक्षा भी इसके केंद्र में रहें?
आने वाला समय इसी बात से तय होगा कि एआई से होने वाली प्रगति का लाभ कितनी न्यायपूर्ण और मानवीय तरीके से समाज तक पहुंचाया जाता है।