दिल्ली की एक व्यस्त सड़क पर बिखरा निर्माण का मलबा और टूटा हुआ कंक्रीट तेजी से हो रहे शहरीकरण की एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा करता है। यह निर्माण एवं ध्वस्तीकरण (सी एंड डी) मलबे के लगातार बढ़ते बोझ का प्रतीक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि निर्माण एवं तोड़फोड (सी एंड डी) के मलबे का प्रभावी पृथक्करण, उचित निस्तारण और पुनर्चक्रण पर्यावरणीय नुकसान को कम करने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए बेहद जरूरी है। इसके अनुचित निस्तारण से धूल प्रदूषण बढ़ता है और सार्वजनिक स्थानों पर अवरोध पैदा होता है।
भारत में हर साल अनुमानित 15 करोड़ टन निर्माण एवं तोड़फोड़ (सी एंड डी) का मलबा पैदा होता है। सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार, इसका 90 प्रतिशत तक हिस्सा भूदृश्य विकास (लैंडस्केपिंग), मिट्टी से जुड़े कार्यों और सिविल इंजीनियरिंग परियोजनाओं में दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि इसका केवल एक प्रतिशत ही पुनर्चक्रित किया जाता है।