विरोध प्रदर्शन करती डूब क्षेत्र प्रभावित महिलाएं, फोटो : डीटीई  
विकास

बसनिया बांध के निर्माण से डूब क्षेत्र में आने वाली 31 ग्राम सभाओं का सर्वे से इनकार

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में प्रस्तावित बसनियां बांध के निर्माण के चलते कई गांव डूब क्षेत्र में आ गए हैं

Anil Ashwani Sharma

’’मध्य प्रदेश के मंडला जिले में प्रस्तावित बसनियां बांध के निर्माण से डूब में आने वाले सभी 31 गांवों की ग्राम सभाओें ने जमीन अधिग्रहण करने की अनुमति नहीं दी है लेकिन प्रशासन बार-बार हमें पुलिस के सहयोग से हमारे गांवों में जोर जबरदस्ती से जमीन का सर्वे करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन हर बार हमने उन्हें गांव में घुसने नहीं दिया है।’’ यह बात  बसनिया (ओढारी) बांध विरोधी संघर्ष समिति के अध्यक्ष बजारी लाल सर्वटे ने डाउन टू अर्थ से कही। उनका कहना है कि भूमि अधिग्रहण का केन्द्रीय कानून 2013 को लेकर मध्यप्रदेश सरकार ने 2015 में नियम बनाया है। नियम की खंड -16 में स्पष्ट रूप से प्रावधान दिया गया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में किसी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के पूर्व ग्राम सभा की सहमति प्राप्त की जाएगी, इसकी पुष्टि मध्यप्रदेश पेसा नियम 2022 का खंड-18(1) में भी किया गया है। सर्वटे ने बताया कि जब किसान अपनी जमीन सरकार को नहीं देना चाहता है तो सर्वे कार्य का कोई औचित्य नहीं उठता है।

डूब प्रभावित भनगांव के सरपंच फूलचंद्र ने डाउन टू अर्थ से कहा कि सरकार ने जो नियम कायदे बनाए हैं पहले तो वह उसका पालन करे फिर हमसे बात करने आए लेकिन वह अपने ही बनाए नियमों को धता बताकर हमें आए दिन प्ररेशान करने पर तुले हुए हैं। वह कहते हैं कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 के प्रावधानों एवं संशोधनों के अनुरूप बसनिया (ओढ़ारी) बांध परियोजना के लिए आवश्यक दर्जन से भ्र से अधिक अध्ययन अभी लंबित हैं। जैसे  संचयी प्रभाव परियोजना निर्माण के कारण नर्मदा नदी एवं संबंधित नालों के जलग्रहण क्षेत्र  वहन क्षमता, जल प्रवाह की निरंतरता तथा संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया जाना अति आवश्यक है। इसके अलावा परियोजना में वन भूमि के उपयोग को यथासंभव कम रखते हुए पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय निरंतरता सुनिश्चित की जाए।

सर्वटे कहते हैं कि वन भूमि परिवर्तन एवं जैव विविधता की हानि से जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का पर्यावरणीय लाभ-हानि विश्लेषण किया जाना भी बहुत जरूरी है। साथ ही जलाशय एवं वन क्षेत्र से लगे कम से कम 10 गांवों में मिट्टी की गुणवत्ता एवं विशेषताओं का अध्ययन किया जाना भी आवयश्क है। वह कहते हैं इसके अलावा परियोजना क्षेत्र के कम से कम 10 स्थानों पर तीनों ऋतुओं (ग्रीष्म, वर्षा एवं शीत) में भूजल स्तर का मापन किया जाना भी जरूरी है।

बरगी बांध संघर्ष समिमि के सदस्य राज कुमार कहते हैं कि ये सभी अध्ययन पूर्ण होने के पश्चात ही पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए । उनका कहना है कि इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जनसुनवाई आयोजित कर स्थानीय नागरिकों एवं प्रभावितों से पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभावों संबंधी आपत्तियां एवं सुझाव आमंत्रित करे। वह कहते हैं कि जनसुनवाई की प्रक्रिया पूर्ण होने तथा प्राप्त आपत्तियों के परीक्षण के उपरांत ही पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए लेकिन इन सभी बातों को सरकार नजरअंदाज कर रही है।

ध्यान रहे कि बसनिया बांध से 8780 हेक्टेयर सिंचाई एवं 100 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है । इस बांध से कुल डूब क्षेत्र 6,343 हेक्टेयर होगा और इसमें निजी भूमि 2,443 हेक्टेयर, शासकीय भूमि 1,793 हेक्टेयर और वन भूमि 2,107 हेक्टेयर डूबेगी । इस परियोजना से कुल 2,737 परिवार विस्थापित होंगे ।

सर्वेटे कहते हैं कि हम यह देखते आए हैं कि अब तक देश के अधिकांश बांधों में घोषित क्षमता का केवल 60–70 प्रतिशत क्षेत्र ही सिंचित होता है, ऐसे में क्या सरकार यह काम नहीं है कि वह इस बांध के सिंचित क्षेत्र का गहन अध्ययन कर आंकड़े दे। वह बताते हैं कि इस बांध के निर्माण से लगभग 5 लाख पेड़ों की कटाई का सरकारी अनुमान है हो सकता है ये और अधिक हो।  अंत में वह कहते हैं कि मंडला और डिंडोरी के किसानों को सिंचाई उपलब्ध कराना आवश्यक है, लेकिन बड़े बांध के बजाय लिफ्ट सिंचाई, सूक्ष्म सिंचाई और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए ताकि विकास के साथ पर्यावरण, वन, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के हितों का संतुलन बना रहे।