“जब मैं 45 साल का था तब से नया रायपुर के निर्माण के कारण मेरे गांव का अधिग्रहण किया गया और तब से अब तक मेरे परिवार का न पुनर्वास हुआ और न मुआवजा मिला, हम पिछले ढाई दशक में किसान से मजदूर बन गए और अब हालात ये हो गए हैं कि हम रोज मजदूरी पाने के लिए रायपुर जाते हैं लेकिन अब वह भी नसीब नहीं हो रही है, परिवार को दो वक्त के भोजन के लिए लाले पड़ गए हैं।” यह बात 70 वर्षीय घसिया राम ने डाउन टू अर्थ से कही। घसिया राम छत्तीसगढ़ की नई राजधानी (नवा रायपुर अटल नगर) के निर्माण के लिए विस्थापित किए गए 41 गांवों में से एक झांझ गांव के निवासी हैं। इस परियोजना के लिए नया रायपुर विकास प्राधिकरण (एनआरडीए) ने 2002 में राज्य की वर्तमान राजधानी से 17 किलोमीटर दूर बसे 41 गांवों की कुल 23,742 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित करने का निर्णय लिया था। प्राधिकरण ने अब तक 13 हजार हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित कर ली है जबकि अभी दस हजार से अधिक हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित करने की तैयारी में है। दूसरी ओर प्राधिकरण के प्लान के अनुसार यह राजधानी 2031 तक पूरी तरह से निर्मित हो जाएगी। इसके लिए केवल 5 साल बचे हैं। लेकिन जिस गति से यहां निर्माण कार्य चल रहा है, उससे तो यह पूरा होने से रहा। हालांकि सरकार में बैठे अधिकारी भी दबी जुबान यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि यह काम 2040 के पहले पूरा होने से रहा। वहीं नई राजधानी प्रभावित किसान कल्याण समिति के अध्यक्ष रूपन चंद्राकर कहते हैं, “केंद्र सरकार के कई विजन हैं और उसमें एक विजन है विकसित भारत 2047 मुझे पूरा विश्वास है कि देश जब केंद्र सरकार के हिसाब से पूरी तरह से विकसित हो जाएगा, इसके बाद ही हमें नई राजधानी नसीब हो सकेगी।”
नई राजधानी के निर्माण के कारण घसिया राम अकेले विस्थापित नहीं हैं, उनके जैसे लोगों की जनसंख्या को यदि जोड़ें तो 41 गांव के 50 हजार अधिक परिवार प्रभावित हुए हैं। राजधानी प्रभावित किसान कल्याण समिति के सचिव कामता प्रसाद रात्रे ने डाउन टू अर्थ को बताया कि यदि इन परिवारों की संख्या को कम से कम एक परिवार में पांच सदस्यों के हिसाब से जोड़ें तो यह संख्या ढाई लाख से ऊपर जा पहुंचती है। वह कहते हैं, “हमारी स्थिति ऐसी है कि न तो हम जी पा रहे और न ही अपनों के लिए कुछ कर पा रहे, अब आखिरी उम्मीद अदालत ही है लेकिन वहां भी अब उम्मीद टूटने लगी है।” रात्रे कहते हैं कि हम सभी किसान (लगभग 6 हजार से अधिक) लोगों ने 16 साल पहले 2011 में एनआरडीए द्वारा अवैध रूप से अधिग्रहित हमारी जमीन का मामला राज्य के बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय में जमीन का सही मूल्य व पुनर्वास पाने के लिए याचिका दायर की थी लेकिन अब तक बस हमें तारीख-पर-तारीख ही मिलती रही है। ध्यान रहे कि अपना विरोध दर्ज कराने के लिए सैकड़ों किसानों ने रायपुर से बिलासुपर के बीच 2018 में 112 किलोमीटर की दूरी चार दिन में पैदल चलकर तय की और अपना मुकदमा दायर कराया था। किसानों का कहना है कि हमारी लड़ाई राज्य सरकार से इसलिए है कि उसने हमारी जमीनों को जोरजबरदस्ती व धोखाधड़ी से हस्तांतरित की है। रात्रे ने बताया कि हमारी लड़ाई इतनी लंबी खिंच गई है कि मामले दायर करने वाले चार किसानों की अब तक मौत भी चुकी है। अधिकांश ग्रामीणों का कहना है कि राज्य की नई राजधानी का निर्माण वास्तव में क्षेत्र में उपजे व्यापक असंतोष के बीच किया जा रहा है और हमारी सबसे बड़ी शिकायत है कि हमारी जमीन को सरकार जबरदस्ती और बिना पर्याप्त मुआवज के अधिग्रहित की है।
नवा रायपुर अटल नगर की “अमीर धरती में गरीब किसान” सरकार की धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं। 8,013 हेक्टेयर की टाउनशिप में छह लेन सड़कें, एलीट हाउसिंग सोसाइटी व क्लब, एक वेदांता अस्पताल और एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, इसके अलावा नया सचिवालय, विधानसभा भवन, जंगल सफारी, बॉटनिकल गार्डन, सेंट्रल पार्क, चार बांध, चार जंगल और अब तक इनमें से चमचामाती सड़कें, विधान सभा भवन व स्टेडियम बन चुके हैं लेकिन यहां ऐसे कार्य अब तक शुरू नहीं हुए जिससे यहां से विस्थापित हुई आबादी को काम मिल सके। रोजगार के नाम पर किसानों को छोटे-मोटे काम ही मिल पा रहे हैं। इस संबंध में विस्थापित टिथा गांव के अशोक कुमार कहते हैं कि आज हालत यह हैं कि हम रोज रायपुर के लेबर चौक पर बैठते हैं और शाम तक इस इंतजार में रहते हैं कि कोई तो आएगा हमें काम देने लेकिन वह दिन हफ्ते में बमुश्किल से दो या एक दिन ही आता है। चंद्राकर कहते हैं कि राज्य सरकार ने पुनर्वास योजना के तहत जो वायदे किए गए थे, उसका फायदा अब तक हम किसानों को नहीं मिला है। वह कहते हैं कि शुरू में 6,464 परिवार नई राजधानी के निर्माण के कारण प्रभावित हुए लेकिन इन परिवारों में से अब तक किसी एक को भी रोजगार नहीं मिला है, यही नहीं पुनर्वास योजना के तहत कुछ ग्रामीणों को दुकानें दी गईं थीं। अब प्राधिकरण उसका किराया भी किसानों से वसूल रहा है। यही नहीं रोजगार की तलाश में विस्थापित होने वाले गांव के लोगों का सामाजिक तानाबाना तक बिगड़ गया हैं। रात्रे बताते हैं कि हमारे गांव के पुरुषों को तो काम नहीं मिलता लेकिन महिलाओं को मजदूर के रूप में काम मिलता है लेकिन हो यह रहा है कि पिछले कुछ सालों में हमारे गांवों से रोजगार की तलाश में महिलाएं शहर जाती हैं और कई शाम को लौटती ही नहीं हैं, ऐसी महिलाओं की संख्या लगभग 2,000 से अधिक है जो गायब हो चुकी हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण 1 नवंबर सन 2,000 को हुआ। प्रदेश बनने के बाद से ही सरकारी महकमे में इस बात की चर्चा होने लगी थी कि मध्य प्रदेश की राजधानी नया भोपाल की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी नया रायपुर बनाया जाए। इसके लिए राज्य सरकार ने दुनियाभर से नौ विशेषज्ञ बुलाए गए और इन्हें कहा गया कि रायपुर के आसपास के 50 किलोमीटर के दायरे में ऐसे स्थान का चयन करना है, जहां कम से कम पुनर्वास करना पड़े, पानी का स्रोत हो, रेलवे व एयरपोर्ट पास हों, पर्यावरण के हिसाब से बेहतर हो और साथ ही गैर उपजाऊ अधिक से अधिक सरकारी जमीन उपलब्ध हो। विशेषज्ञाें ने राष्ट्रीय मार्ग क्रमांक 6 व 43 के बीच स्थित जमीन को उपयुक्त बतलाया। इन्हीं चिन्हित स्थानों के आसपास 41 गांव बसे हुए थे। इसके बाद तात्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने साल 2002 में नया रायपुर बनाने के लिए पौता गांव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से शिलान्यास भी करवाया। पौता के आसपास के 61 गांव को इस योजना में रखा गया। साल 2003 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार के प्लान को बदल दिया।
2005 में नई सरकार ने नया रायपुर के लिए राखी गांव में फिर से शिलान्यास करवाया। नया रायपुर के लिए बनाए गए इस प्लान में तब 61 से घटा कर 41 गांव को लिया गया, साथ ही इस परियोजना के लिए 41 में से 27 गांव में जमीन की खरीदी बिक्री पर तुरंत रोक लगाई गई। इस संबंध में रात्रे कहते हैं कि वास्तविकता ये है कि नई राजधानी की घोषणा के तुरंत बाद 2002 में ही 61 गांवों की जमीन पर रायपुर शहर के जयस्तंभ चौक से लेकर इन 61 गांवों की जमीन कोई भी अपनी मर्जी से खरीद या बिक्री नहीं कर सकता था। हालांकि बाद में सरकार ने इसमें से 27 गांवों की ही जमीन पर प्रतिबंध बनाए रखा। किसानों व प्राधिकरण के बीच चले लंबे संघर्ष के बाद 7 मार्च 2022 को राज्य सरकार ने किसानों की 8 मांगों में से 6 मांगें मान ली और इसके तहत प्रतिबंधित 27 गांवों में से अब केवल 14 गांवों में ही यह प्रतिबंध लागू है। साल 2006 से राज्य सरकार ने किसानों की जमीनों को खरीदना शुरू किया। रात्रे कहते हैं कि योजना शुरू हुई 2008 में और बिना पुनर्वास नीति की घोषणा के ही किसानों से जोर जबरदस्ती से जमीन खरीदना शुरू कर दिया। वहीं इस संबंध में चंद्राकर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि प्रभावित क्षेत्र में आने वाले एक रीको गांव में तात्कालीन शासन की ओर से एक नोटिस दिया गया, इस नोटिस में कहा गया है कि गांव के सभी किसान आपसी समझौता करके अपनी जमीन शासन को दे दें वरना सभी की जमीनें अधिग्रहित कर ली जाएंगी। वह कहते हैं कि शासन द्वारा दिए गए नोटिस के तुरंत बाद किसानों का आंदोलन शुरू हुआ और आज तक अनवरत रूप से जारी है।
नया रायपुर में 41 गांव में से 27 गांवों की 13 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन एनआरडीए ने अधिग्रहित की है। इस जमीन के बारे में प्राधिकरण का कहना है कि उसने यह जमीन किसानों से आपसी समझौते से खरीदी है। इस संबंध में किसान संगठन का कहना है कि सरकार ने उनके सारे विकल्प खत्म कर दिए। अगस्त 2005 में रमन सिंह सरकार ने 27 गांवों में एनआरडीए को छोड़कर किसी और को जमीन की बिक्री पर रोक लगा दी। इस पर चंद्राकर कहते हैं कि ऐसे में यह आपसी सहमति कहां से आ गई है?
किसान कल्याण समिति के सचिव कामता प्रसाद कहते हैं जब भी हमें पैसे की जरूरत होती है, हमें उनकी तय कीमत पर जमीन बेचनी पड़ती है। हालांकि प्राधिकरण का दावा है कि उसने यह सहमति किसानों के साथ हुई एक बैठक में तय की थी जबकि किसानों का दावा है कि यह एक तरफा तय की गई थी। इस संबंध में चंद्राकर बताते हैं कि हम किसानों की जमीन केवल दो लोगों के बीच बातचीत के बाद तय कर ली जाती है। वह कहते हैं कि प्राधिकरण किसी प्रकार की सूचना हमें नहीं देता कि कब वह हमारी जमीन लेगा। वहीं इस संबंध में रात्रे ने बताया कि अधिकारी भू-अर्जन के समय न तो किसी प्रकार इजाजत लेते हैं, हम ग्रामीण चुपचाप खड़े देखते रहते हैं और वो आकर अपना नाप जोख कर चले जाते हैं। वह बताते हैं कि कहीं-कहीं तो वे नापने भी नहीं आते बस कागजों में ही आदान-प्रदान हो जाता है। एक अधिकारी एनआरडीए का और एक तहसीलदार आकर बोलते हैं, “मैं इसको कब्जा देता हूं” और इसके उत्तर में एनआरडीए का अधिकारी कहता है, मैं कब्जा लेता हूं। दोनों के दस्तखत हो जाते हैं और किसानों को पता नहीं चलता कि कब उनकी जमीन एनआरडीए के पास चली गई।
गांवों की जमीन बिक्री 2006 में 12.37 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से शुरू हुई, जिसमें मुआवजा भी शामिल था। जुलाई 2009 में जब एनआरडीए इसे बढ़ा कर 14.75 लाख रुपए दे रहा था तो सरकार ने आपातकालीन धारा लागू कर दी जिससे कलेक्टर के नोटिस के 15 दिनों के भीतर जमीन अधिग्रहित करने का अधिकार मिल गया। उदाहरण के लिए बरौदा गांव निवासी अमृतलाल जोशी ने बताया कि ग्रामीणों को इस धारा के तहत 4.30 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से स्वीकार कर एनआरडीए को जमीन बेचने के लिए मजबूर किया गया। वह कहते हैं कि यह कहां का न्याय है यह तो पूरी तरह से तानाशाही है।
वर्तमान में एक एकड़ सिंचित जमीन की दर 5.90 लाख है और असंचित जमीन की कीमत 5.40 लाख रुपए है। रात्रे कहते हैं कि प्रतिबंधित होने के कारण हमारी जमीन इसी दर पर एनआरडीए जोर जबरदस्ती से अधिग्रहण कर रहा है जबकि हमारे गांव के पास की वह जमीन जिस पर प्रतिबंध नहीं है, एक एकड़ की कीमत एक करोड़ से ढाई करोड़ रुपए तक में बिक्री हो रही है। वह कहते हैं कि बताइए हम किसानों का ये कितना बड़ा शोषण हैं। वहीं दूसरी ओर किसान जिस प्रतिबंध की बात करते हैं, इस पर प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि हम किसानों को बिचौलियों से बचाने के लिए जमीनों पर प्रतिबंध लगाया गया है और हमारे द्वारा दिया जाने वाला मुआवजा सही है।
चंद्राकर कहते हैं कि प्राधिकरण पूरी तरह से किसानों के साथ ज्यादती कर रहा है। वह बताते हैं कि एनआरडीए ने उनकी जमीनें अधिग्रहित कर 1.14 करोड़ रुपए आवासीय और 1.82 करोड़ रुपए प्रति हेक्टेयर खुदरा दर पर लीज पर दी जबकि प्राधिकरण का कहना है कि इस प्रकार का कमाया हुआ पैसा प्रोजेक्ट पर वापस लगाया जाता है। एनआरडीए के अनुसार किसानों को दूसरी जगह जमीन दी गई है। दो छोटी कॉलोनियां बनाई हैं, पहली झांझ-नवागाव में 20 एक कमरे के सेट और राखी गांव में 400 वर्ग फुट के लगभग 200 घर। घसियाराम ने कहा कि मुझे एक कमरा मिला है और मैं उसी कमरे में पिछले डेढ़ दशक से अपने परिवार के 13 लोगों के साथ रह रहा हूं, यहीं पर मेरे आठ-दस मवेशी भी रहते हैं। आसपास कहीं भी नाली नहीं हैं और न ही पीने के पीनी की सुविधा है।
रात्रे ने बताया कि जनवरी 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को निस्तार भूमि पर कब्जा न करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद तत्कालीन प्रधान सचिव ने 10 मार्च 2011 को एक सर्कुलर जारी कर कलेक्टरों से एक सूची तैयार करने और ऐसी जमीन पर अतिक्रमण या अधिग्रहण न करने को कहा था। ध्यान रहे कि नया रायपुर के लिए राज्य सरकार ने 2,764 हेक्टेयर जमीन ट्रांसफर की जिसमें तालाब, चारागाह और कब्रिस्तान शामिल थे और फिर एनआरडीए ने 555 करोड़ रुपए के लोन के लिए हुडको के पास जमीन गिरवी रख दी। हालांकि रात्रे ने बताया कि एनआरडीए का कहना है कि एक आधुनिक टाउनशिप में निस्तार भूमि का स्वरूप बदल जाता है लेकिन यह किसी नियम का उल्लंघन नहीं है। रात्रे कहते हैं कि इन विपरीत हालात में हम यह समझ नहीं पा रहे हैं कि कब हमारे लिए नई सुबह होगी।