फोटो सौजन्य: मनीष मेहरोत्रा
जलवायु

“जो मिट्टी के लिए अच्छा, वह आपके लिए सेहतमंद”

मनीष मेहरोत्रा अपनी अभिनव शैली और भारत की पाक विरासत को संजोने के दृष्टिकोण के लिए वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हैं। स्वाद को यादगार बनाने में महारथी, मेहरोत्रा अक्सर अपने व्यंजनों में स्थानीय सामग्री को प्रमुख तत्व के रूप में जगह देते हैं। विभा वार्ष्णेय के साथ बातचीत में सेलिब्रिटी शेफ मेहरोत्रा जलवायु परिवर्तन के समय में स्थायी भोजन का मतलब समझा रहे

Vibha Varshney

आपका भोजन और टिकाऊपन (सस्टेनिबिलिटी) के प्रति दर्शन क्या है और इस उद्योग में काम करते हुए यह दशकों में कैसे विकसित हुआ है?

आप जो खाते हैं, वह जमीन और मिट्टी के लिए अच्छा होना चाहिए, पर्यावरण के लिए अच्छा होना चाहिए और आपके स्वास्थ्य के लिए भी। यह दर्शन हर किसी के लिए मार्गदर्शक होना चाहिए। चाहे वे होटल की रसोई में खाना बना रहे हों या घर पर। किस सामग्री का उपयोग करना है और कैसे खाना पकाना है, यह महत्वपूर्ण होता है। मौसमी फलों और सब्जियों का उपयोग भी उतना ही जरूरी है। जब हम बच्चे थे, खाना पूरी तरह से मौसमी होता था। मई में फूलगोभी नहीं मिलती थी और जून में ताजा मटर नहीं बिकता था। यह केवल सर्दियों में आते थे, जैसे सरसों का साग। आम गर्मियों का फल था और सिंघाड़ा या शकरकंदी का भी अपना समय था। हम उसी के अनुसार पकाते थे। मिसाल के तौर पर कांजी केवल सर्दियों में बनती थी और धूप वाले दिनों में ही खाई जाती थी। इसमें पाचन संबंधी गुण होते हैं और यह उस मौसम के भारी भोजन के लिए उपयुक्त है। शुरुआत 1980-90 के दशक में हुई। अब, दिल्ली के खान मार्केट जैसे पॉश इलाकों में आप दिसंबर में भी आम हासिल कर सकते हैं, जो कहीं और से एयरफ्रेट होकर आते हैं।

इतनी लंबी दूरी तय करना पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है। मुझे यह भी संदेह है कि यह स्वास्थ्य या स्वाद के लिए बेहतर हैं।

एवोकाडो को ही लीजिए, कोई 30-40 साल पहले इसके बारे में भारत में किसी को पता नहीं था। अब यह मेट्रो शहरों में हर जगह मिल जाता है। क्या यह सच में आपके लिए अच्छा है, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है। क्विनोआ एक और लोकप्रिय सामग्री है लेकिन लोग इसके पर्यावरणीय मूल्य को भूल जाते हैं। भले ही अब क्विनोआ भारत में उगाया जा रहा हो, यह अपने आप “स्थानीय” नहीं बन जाता। किसी फसल को उस क्षेत्र में उगाने के लिए मजबूर करना, जहां यह प्राकृतिक रूप से नहीं उगती दरअसल उसकी गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।

मेरा मानना सरल है कि अपने क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से उगने वाली चीजों का उपयोग करें और वही खाएं जो मौसमी हो। सर्दियों में जब हमें शानदार सिंघाड़े मिलते हैं, हमें उन्हीं से खाना बनाना चाहिए बजाय कि गर्मियों में मिलने वाले डिब्बाबंद उत्पादों पर निर्भर रहने के। क्षेत्र और मौसम हमारे खाद्य-संस्कृति के दो महत्वपूर्ण पहलू रहे हैं लेकिन लगता है कहीं न कहीं हम उस रिश्ते को खो बैठे हैं। सौभाग्य से अब इस ओर लौटने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

हाल ही में आपने कौन-कौन सी ऐसी नई चीजें बनाई हैं जो क्षेत्रीय और मौसमी सामग्री पर आधारित हैं?

मैं इस समय अपने नए रेस्टोरेंट के मेन्यू पर काम कर रहा हूं और एक डिश जिसे लेकर मैं खास उत्साहित हूं, वह है काशीपुर और रामनगर (कोर्बेट के पास) की मौसमी विशेषता से प्रेरित सिंघाड़ा कचरी। यह एक तरह का चाट है जिसमें उबले और मैश किए हुए सिंघाड़े को मसालों और थोड़े मक्खन के साथ तैयार किया जाता है। यह सरल है लेकिन स्वाद में भी बहुत ही लाजवाब स्थानीय और मौसमी है। मेन्यू में हम इसे “चटपटा सिंहारा ह्यूमस” के रूप में भी रख सकते हैं।

एक और सामग्री जो मैं शामिल करने के लिए उत्साहित हूं, वह है मिश्रीकंद, जिसे अंग्रेजी में जिकामा कहा जाता है। शेफ इसे अक्सर जिकामा कार्पाच्चियो या जिकामा टार्टार कहकर विदेशी बनाने की कोशिश करते हैं। बिना यह जाने कि बिहार में इसे सरस्वती पूजा के दौरान प्रसाद के रूप में खाया जाता है। यह बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में उगता है और कच्चा खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है। मैं इसे गार्निश या अपनी डिश में टेक्सचर जोड़ने के लिए इस्तेमाल करने का प्लान बना रहा हूं।

क्या फाइन डाइनिंग में विलासिता और स्थिरता संतुलित हो सकती है?

टिकाऊपन केवल हमारे पकाए जाने वाले भोजन तक सीमित नहीं है। यह संसाधनों के उपयोग से जुड़ा है। रसोई में बहुत पानी और प्लास्टिक खर्च होता है। उदाहरण के तौर पर क्लिंग फिल्म यानी प्लास्टिक की पतली झिल्ली अब हर जगह और घरों में भी आम हो गया है। हमें लोगों को इसे संयमित तरीके से इस्तेमाल करना सिखाना होगा। पानी की खपत भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। पहले मांस को बहते पानी के नीचे पिघलाने की तकनीक सिखाई जाती थी, जो भारी मात्रा में पानी की बर्बादी है। अपशिष्ट कम करना लागत घटाने का सबसे सरल तरीका है। बड़े शहरों में रोजाना कितनी मात्रा में भोजन फेंक दिया जाता है खासतौर से अमेरिका जैसे देशों में यह चलन और अधिक है। यदि रोटी सड़ जाए तो फेंक दी जाती है, यदि सॉस की समयसीमा समाप्त हो जाए तो टॉस कर दिया जाता है। पहले बचा हुआ खाना गायों को खिलाया जाता था लेकिन अब वह प्रथा कम हो गई है।

योजना बनाना महत्वपूर्ण है। छोटी मात्रा में डिश बनाएं। हम छोटे विक्रेताओं से सीख सकते हैं जो गर्व से बताते हैं कि उनका स्टॉक शाम 6 या 7 बजे तक खत्म हो जाता है। वे कभी पुराने स्टॉक को फ्रिज से नहीं निकालते। हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा। किसी डिश का खत्म होना ताजगी का संकेत होना चाहिए, खराब योजना का नहीं। मेहमानों को यह एहसास होना चाहिए कि भोजन ताजा बनाया गया है।

क्या “फार्म-टू-फॉर्क” या “मॉक मीट” जैसी अवधारणाएं स्थायी और पर्यावरण-मित्र जीवनशैली के लिए व्यवहार्य हैं?

मुझे विश्वास करना मुश्किल लगता है जब दिल्ली के कनॉट प्लेस में कोई रेस्टोरेंट खुद को “फार्म-टू-फॉर्क” कहता है। क्या वह यमुना के किनारे उगाए गए मूली परोस रहे हैं? क्या उनकी सामग्री सच में उनके फार्म से आ रही है? यदि किसी डिश में 10 सामग्री हों और केवल एक फार्म-सोर्स की हो तो क्या इसे वास्तव में फार्म-टू-फॉर्क कहा जा सकता है?

जहां तक मॉक मीट की बात है, यह यूरोप या अमेरिका में समझ में आता है, जहां शाकाहारी विकल्प सीमित हैं। वहां दाल, पनीर, टोफू या हमारे यहां की विविध शाकाहारी डिशें नहीं हैं। यदि आप मांस छोड़ना चाहते हैं तो बस छोड़ दें। यह धूम्रपान छोड़ने के समान है। धूम्रपान करने वाले के सामने खड़े होकर धुआं न लें।

आप क्या खाते हैं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप कैसे और कब खाते हैं। प्रकृति द्वारा बनाए गए किसी भी चीज में मूल रूप से कोई हानि नहीं होती। हम उसे अत्यधिक उपयोग करके अस्वास्थ्यकर बना देते हैं। मिठाई भी मात्रा में ठीक है। घी भी उत्तम है लेकिन आधा किलो रोज नहीं। पकौड़े अच्छे हैं लेकिन हर दिन नहीं। वह खास होते हैं, जैसे बारिश के मौसम में उन्हें खाया जाए।

कौन से पर्यावरणीय मुद्दे आपको सबसे ज्यादा परेशान करते हैं? क्या उन्होंने आपके जीवनशैली को प्रभावित किया है?

जो मुझे सबसे ज्यादा परेशान करता है, वह है कचरे का हर जगह बढ़ना। दूसरे देशों ने काफी सुधार किया है लेकिन भारत में हम अब भी बहुत अधिक कचरा पैदा करते हैं। चाहे वह रेस्टोरेंट हो, होटल हो या सामान्य जीवन, अपशिष्ट बहुत अधिक है। मेरे लिए यही सबसे बड़ा पर्यावरणीय मुद्दा है। जब आप गाजीपुर और बुराड़ी में कचरे के ढेर देखते हैं तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा होता है।