मेरे लिए खाना बनाना कोई जल्दी निपटाने वाला काम नहीं है बल्कि एक लंबी प्रक्रिया है बिल्कुल ध्यान लगाने जैसा। यह इसलिए नहीं है कि मेरा परिवार खाने में तरह-तरह की मांग करता है, जैसा कि भारत के अनेक घरों में देश की विविध पाक परंपराओं के कारण आम है। बल्कि असल वजह, खाने के तरीकों को लेकर मेरी जिद है और यह आग्रह कि सिर्फ साबुत अनाज और दालों का ही इस्तेमाल हो। चावल और मोटे अनाज जैसे कठोर दानों को रात भर और दालों को कम से कम चार घंटों के लिए भिगोया जाता है। पकाने का काम मिट्टी के बर्तनों में धीमी आंच पर किया जाता है, फिर चाहे इसमें कितना ही समय क्यों न लगे। मेरे आसपास के लोग अक्सर इस आदत से चिढ़ जाते हैं। फिर भी मैं खुद को फास्ट फूड संस्कृति के आगे झुकने के लिए तैयार नहीं कर पाती। या शायद मैं बस इस डर से बंधी हूं कि आधुनिक खान-पान में जो थोड़ी बहुत पोषण शक्ति बची है कहीं वह भी न खो जाए।
मेरी शिक्षा और प्रयोगशाला के अनुभव ने मुझे अनाजों की रक्षा करने वाली रासायनिक व्यवस्था के प्रति गहराई से सजग किया है। फाइटिक एसिड और लेक्टिन जैसे एंटी न्यूट्रिएंट्स बीजों को अंकुरित होने से पहले के समय में सुरक्षित रखते हैं लेकिन मानव शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण में बाधा डालते हैं। इसी कारण मैं अनाज और दालों को भिगोने पर जोर देती हूं क्योंकि यह अंकुरण की प्रक्रिया की नकल करता है। यह प्रक्रिया अनाज से एंटी न्यूट्रिएंट्स को कम करता है और पोषक तत्वों को शरीर के लिए अधिक उपयोगी बनाता है। इससे भोजन को पचाना भी आसान हो जाता है और पेट फूलने की समस्या कम होती है।
सालों के अनुभव में परिवार और दोस्त मेरी इन अजीब आदतों को सहन करने लगे हैं और कभी-कभी उसकी सराहना भी करने लगे हैं। कुछ ने तो इसे अपनाना भी शुरू कर दिया है। हालांकि, मेरी चिंता कम नहीं हुई है। स्थानीय बाजारों में मैं उन सब्जियों से पीछे हट जाती हूं जो बहुत चमकदार लगती हैं और उन फलों से भी जो बहुत परिपूर्ण दिखाई देते हैं। क्योंकि मुझे पता है कि इस चमक के पीछे कीटनाशकों के अवशेष, मोम की परत और रासायनिक उर्वरक जैसी चीजें छिपी हैं।
इस बेचैनी का एक हिस्सा मेरे प्रयोगशाला के समय से जुड़ा है। मैं फसलों को बेहतर बनाने के लिए काम करती थी लेकिन लगभग हमेशा इसका ध्यान ज्यादा पैदावार और दिखावे की गुणवत्ता पर ही रहता था। स्वच्छ और रासायन मुक्त भोजन शायद ही कभी किसी परियोजना की सफलता का पैमाना रहा हो।
जितना अधिक मैं सीखती गई, उतना ही असहज महसूस करने लगी। मैं खुद को अक्सर खाने-पीने के उत्पाद, निजी देखभाल के उत्पादों और यहां तक कि सफाई के साधनों के लेबल ध्यान से पढ़ते हुए सुपरमार्केट की गलियों और ऑनलाइन पोर्टलों में भटकते हुए पाती हूं। हानिकारक रसायनों की सूची अंतहीन लगती थी। शैम्पू, फर्श साफ करने वाले उत्पाद और पैकेज्ड स्नैक्स जैसी रोजमर्रा की चीजें छिपे हुए खतरे की तरह लगने लगीं। यह सतर्कता थका देने वाली थी।
आखिरकार इसी बेचैनी ने मुझे जैविक भोजन की पहल “बायोकृति” शुरू करने की ओर धकेला। लेकिन इससे मेरी चिंताएं कम होने के बजाय और बढ़ गईं। जमीन की हकीकत से रूबरू होना, किसानों से मिलना, मिट्टी की जांच करना और भोजन की पूरी व्यवस्था को समझना यह साफ दिखाने लगा कि हम उस धरती से कितने कट चुके हैं जो हमें भोजन देती है। इस समझ ने मुझे अपनी ही जिंदगी को नए सिरे से देखने पर मजबूर किया। मैंने थर्मोकोल, एल्युमिनियम फॉइल और एक बार इस्तेमाल होने वाली चीजों का उपयोग करने से मना कर दिया। मैं अपना पानी की बोतल और कपड़े के थैले साथ रखने लगी। घर में तेज रासायनिक क्लीनर और कृत्रिम खुशबुओं का इस्तेमाल कम हो गया।
मेरी खाने की आदतें भी बदल गईं। सुविधा की जगह अब सजगता ने ले लिया है। हम अब कम खाते हैं लेकिन बेहतर खाते हैं। धीरे खाते हैं, सादा खाते हैं और समझ के साथ खाते हैं। अब हमारा भोजन स्थानीय, मौसमी और प्राकृतिक तरीके से उगाया गया होता है। मैं फिर से पारंपरिक अनाजों, बिना प्रोसेस्ड तेलों और धीमी आंच पर पकाने की ओर लौट आई। इस बदलाव का असर सिर्फ स्वाद में ही नहीं दिखा बल्कि इस बात में भी कि मेरा शरीर और मन कैसा महसूस करने लगे। अब हमारा भोजन मिट्टी और उसे संवारने वाले लोगों के प्रति आभार जताने का एक तरीका बन गया है।