मध्य हिमालय और उत्तराखंड इस समय मौसम के सबसे खराब दौर और गंभीर जलवायु परिवर्तन का गवाह बन रहे हैं। सर्दियों में नदारद बारिश और बर्फबारी के चलते राज्य भीषण 'हाइड्रोलॉजिकल ड्रॉट' यानी जलीय सूखे की चपेट में है। हालात यह हैं कि राज्य में ग्लेशियरों का मास बैलेंस नेगेटिव हो सकता है। रबी की फसलें सूख रही हैं, वहीं कड़ाके की ठंड के बीच उच्च हिमालयी जंगल आग से धधक रहे हैं। चमोली जिला प्रशासन को आग बुझाने के लिए वायु सेना की मदद तक मांगनी पड़ी है।
सूखे का सीधा असर रबी की फसलों और बागवानी पर दिखाई देने लगा है। उत्तराखंड कृषि विभाग के निदेशक दिनेश पंवार के अनुसार, प्रारंभिक सर्वे में सूखे के कारण चमोली, टिहरी, और बागेश्वर जैसे जिलों में 15 से 20 प्रतिशत तक फसल नुकसान का आकलन किया गया है। गेहूं की फसल को 15 प्रतिशत तक क्षति पहुंची है। यदि तुरंत बारिश नहीं हुई, तो नुकसान का यह आंकड़ा बढ़ सकता है। विभाग ने सभी जिलों में मॉनिटरिंग के निर्देश दिए हैं। नियमों के अनुसार 33 प्रतिशत से अधिक क्षति की स्थिति में ही किसानों को मुआवजे का प्रावधान है।
दिन का तापमान फसलों को झूठे बसंत का संकेत दे रहा
पूर्व कृषि रक्षा अधिकारी बी.डी. शर्मा बताते हैं कि उत्तराखंड की 90 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित है। मिट्टी से नमी गायब होने के कारण बीजों का अंकुरण नहीं हो पा रहा है। बागवानी के लिए यह मौसम का बदलाव अधिक घातक है। सेब के लिए चिलिंग आवर्स अनिवार्य होते हैं। हर्षिल जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्र जो सेब उत्पादन का केंद्र हैं, वहां रात का तापमान माइनस 10 डिग्री तक जा रहा है, लेकिन दिन में तेज धूप के कारण तापमान 15 डिग्री तक पहुंच रहा है। कुछ अन्य इलाकों में तो दिन का तापमान 20 डिग्री तक जा रहा है। यह पौधों को झूठे वसंत का संकेत दे रहा है, जिससे समय से पहले और अनियमित फ्लावरिंग का खतरा है। नमी की कमी से फलों की साइज और गुणवत्ता प्रभावित होगी। खुमानी, पुलम का आकार व गूदा इस हालात में कम बनेगा।
औसत बारिश 182 मिमी से शून्य पर आई आ गई
मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़े बर्फबारी व बारिश में गिरावट को स्पष्ट तौर पर बता रहे हैं। 2021 में 3 से 4 फीट बर्फबारी दर्ज की गई थी। 2022 में बर्फबारी घटकर 1 से 2 फीट रह गई और अगले तीन वर्षों यानी 2023 से 25 में यह सिमटकर महज 3 इंच से 1 इंच तक हुई। जो 2026 में अब तक लगभग शून्य हो गई है। इसी तरह बारिश भी 2021 की सर्दियों में 182 मिमी बारिश थी, जो उस साल एक रेकार्ड था। 2024 में यह गिरकर 12 मिमी और 2025 में मात्र 4 मिमी रह गई। 2026 के मौजूदा सीजन में अब तक शून्य बारिश दर्ज हुई है।
पश्चिमी विक्षोभ की आवृति बदल रही
आईएमडी देहरादून के मौसम वैज्ञानिक रोहित थपलियाल के अनुसार, 1980 से 2020 के बीच वेस्टर्न डिस्टरबेंस की आवृत्ति और तीव्रता में कमी आई है। पहले बर्फबारी दिसंबर के अंत से शुरू होती थी, जो अब खिसककर फरवरी तक पहुंच गई है। यह 30-40 दिनों की देरी 'स्नो-ड्रॉट' यानी बर्फबारी के सूखे का प्रमुख कारण है। पहले सीजन में 4 से 6 सक्रिय सिस्टम आते थे, जो अब घटकर 2 से 3 रह गए हैं, जिससे बर्फबारी में 70 प्रतिशत तक की कमी आई है।
ग्लेशियरों का मास बैलेंस नेगेटिव जाएगा
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के ग्लेशियोलॉजिस्ट मनीष मेहता कहते हैं कि इस साल कश्मीर, जांस्कर व लद्दाख के कुछ हिस्सों में बर्फबारी हुई है। पर उत्तराखंड में ड्राई स्पेल लंबा हो गया है। इस कारण ग्लेशियरों का मास बैलेंस नेगेटिव हो सकता है। बर्फबारी न होने और तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघलने की दर बढ़ेगी। इससे मौजूदा ग्लेशियर झीलों का आकर बढ़ेगा। साथ ही 'सुप्रा-ग्लेशियर लेक्स' यानी ग्लेशियर की सतह पर बनने वाली झीलों की संख्या भी बढ़ सकती है, जो भविष्य में पर्यावरण के लिहाज से चिंता का कारण बन सकता है। जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट के पूर्व वैज्ञानिक जगदीश चंद्र कुनियाल के मुताबिक, फरवरी-मार्च की बर्फ अधिक तापमान के कारण टिक नहीं पाती, जिससे ग्लेशियर रीचार्ज नहीं हो पाते। देरी से होने वाली बर्फ पर्यटकों को खुश कर सकती है पर ग्लेशियर के लिए यह ज्यादा उपयोगी नहीं होती।
हिमालय में जंगलों में भीषण आग शुरू
सूखे का तात्कालिक प्रभाव वनाग्नि के रूप में सामने आया है। नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के बफर जोन, गंगोत्री घाटी और फूलों की घाटी रेंज के जंगल जल रहे हैं। वन क्षेत्राधिकारी चेतना कांडपाल ने पुष्टि की है कि वन विभाग की टीमें मौके पर हैं। जिलाधिकारी गौरव कुमार के अनुसार, आग पर काबू पाने के लिए एसडीआरएफ और वायु सेना की मदद के लिए शासन को लिखा गया है।