मैं अक्सर सोचती हूं कि क्या आपकी ईको एंजायटी भी मेरी जैसी ही है। मेरी एंजायटी शोर नहीं मचाती। इसमें किसी प्रकार की घबराहट नहीं होती। बल्कि इससे लड़ने के लिए मैंने “जस्ट एनफ” यानी कम में सतोष करने का तरीका अपनाया है।
यह उस दुनिया के साथ मेरा समझौता है जो चिल्लाकर कहती है ज्यादा खरीदो, ज्यादा खपत करो और कुछ बनो। मेरी बेचैनी किसी नुकसान के डर से नहीं आती बल्कि इस चिंता से आती है कि जो मेरे पास पहले से है क्या, मैं उसका सही इस्तेमाल कर रही हूं?
हर छोटा कदम एक हल्का सा सवाल खड़ा कर देता है, क्या मैं जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रही हूं। क्या इसे और आगे तक चलाया जा सकता है।
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां कम खरीदने की जगह हरित खरीदना बेहतर बताकर बेचा जा रहा है, जैसे एक लकड़ी का टूथब्रश, एक नई स्टील की बोतल आदि। यह टिकाऊ होने की फुसफुसाहट करते हैं लेकिन मैं सोचती हूं, क्या हम कम करने के बजाए बस अलग तरीके से खपत कर रहे हैं।
अपराधबोध की मेरी भावना सबसे हरित विकल्प न चुन पाने को लेकर नहीं है। वह तो किसी एक और चीज को खरीद लेने भर से जुड़ी है। यह नई बात नहीं है। बचपन में मुझे इस बात की चिंता रहती थी कि कहीं कपड़े पूरी तरह पहन लेने से पहले ही छोटे न पड़ जाएं। तब मुझे टिकाऊपन का मतलब नहीं पता था। वह बस एक प्रकार की सादगी थी बिल्कुल वैसी जैसी मेरी दादी बिना किसी नाम के जीती थीं।
विडंबना यह है कि आज जब मैं टिकाऊपन के क्षेत्र में काम कर रही हूं तो ऐसे हालात में मेरी बेचैनी और गहरी हो गई है। मैं सिर्फ अपने लिए नहीं, सबके लिए चिंता करती हूं। परिवार द्वारा जरूरत से ज्यादा खरीदारी, दोस्तों का अपने खर्च को नजरअंदाज करना और अमेजन व क्विक डिलीवरी ऐप्स पर हमारी सामूहिक निर्भरता मुझे हमेशा से चिंतित करती रही है। क्या हम हर बार विवेक की जगह सुविधा को चुन रहे हैं? और क्या मैं खुद पूरी तरह से बदली हूं? शायद उतना नहीं। मैं एक ही चक्र में फंसी हूं। पहले प्रतिरोध फिर समझौता और अंत में जरूरत से ज्यादा सोचना।
इसके बाद आता है कचरा जो लगातार याद दिलाता रहता है, जैसे हर खाली जार, हर सब्जी का छिलका जैसे कोई नैतिक परीक्षा हो। क्या मैं इसे फिर से इस्तेमाल कर सकती हूं? क्या मैं सिर्फ कचरा कम फेंकने के लिए अपनी खुशी का त्याग कर रही हूं?
पंद्रह साल पहले, मैंने कुशल रीसाइक्लिंग और सर्कुलर इकोनॉमी की कल्पना की थी। फिर भी 2026 में देखती हूं कि कचरे को हाथ से अलग किया जाता है। मेरे रीफिल और दोबारा इस्तेमाल की गई थैलियां भरे हुए लैंडफिल्स के सामने छोटी सी लगती हैं।
यही मेरे ईको एंजायटी है। अपराधबोध की लगातार गुनगुनाहट है। यह एहसास कि मेरा प्रयास कभी पर्याप्त नहीं बल्कि समुद्र में एक बूंद के समान है। फिर रास्ता क्या है?
मुझे लगता है कि जस्ट एनफ यानी जरूरत भर जीना सीखना ही काफी है। यह परिपूर्ण नहीं है, बस सचेत और संतुलित होना है। यह जानना है कि किसी चीज को कब मना करना है, कब दोबारा इस्तेमाल करना है और कब बस आराम करना है।
टिकाऊपन लगातार सतर्क रहने का नाम नहीं बल्कि यह जानने का नाम है कि मैं क्या कर सकती हूं और क्या मेरे लिए टिकाऊ है, उसके बीच संतुलन कैसे बनाना है। असली बदलाव दोषबोध पर नहीं बल्कि इरादे और लगातार प्रयास पर टिका होता है।
मैं अब भी आधा खाए गए भोजन को देखकर चिंता करती हूं। आपकी एंजायटी अलग दिख सकती है। लेकिन जस्ट एनफ होना छोटा नहीं है। शायद यही वह है जिसकी हमें वास्तव में जरूरत है।