समुद्र का बढ़ता जलस्तर केवल तटीय बस्तियों और जमीन के लिए खतरा नहीं है, यह उन प्रवासी पक्षियों के जीवन पर भी संकट डाल रहा है, जो हर साल हजारों किलोमीटर की यात्रा के दौरान तटीय आर्द्रभूमियों पर भोजन, आराम और ऊर्जा जुटाने के लिए निर्भर रहते हैं।
ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की वैश्विक समीक्षा में 29 प्रजातियों से जुड़े 37 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया।
इनमें 78 फीसदी अध्ययनों में पक्षियों के आवास पर नकारात्मक असर, जबकि 89 फीसदी में पक्षियों या उनकी आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव सामने आया।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब समुद्र बढ़ने के साथ आर्द्रभूमियों के पीछे हटने की राह में सड़कें, बांध और इमारतें खड़ी होती हैं। इसे ‘कोस्टल स्क्वीज’ यानी तटीय दबाव कहा जाता है। इससे पक्षियों के जरूरी पड़ाव सिकुड़ सकते हैं, भोजन की उपलब्धता घट सकती है और घोंसले डूबने का खतरा बढ़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि भविष्य के संकट का इंतजार करने के बजाय अभी से आर्द्रभूमियों के पीछे की जमीन सुरक्षित करनी होगी और प्रकृति आधारित तटीय संरक्षण को बढ़ावा देना होगा।
समुद्र का बढ़ता स्तर अब सिर्फ तटों और इंसानी बस्तियों के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह उन लाखों प्रवासी पक्षियों का आशियाना भी छीन सकता है, जो हर साल हजारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में सामने आया है कि समुद्र के बढ़ते स्तर से तटीय आर्द्रभूमियों के सिकुड़ने का खतरा है, जिसका दुनिया के समुद्री और तटीय पक्षियों की आबादी पर गंभीर असर पड़ सकता है।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल बायोडायवर्सिटी एंड कंजर्वेशन में प्रकाशित हुए हैं। अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पहली बार वैश्विक स्तर पर 29 प्रजातियों के समुद्री पक्षियों पर समुद्र के बढ़ते स्तर के प्रभावों की व्यवस्थित समीक्षा की है। इनमें प्लोवर, सैंडपाइपर और ऑयस्टरकैचर जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पक्षियों पर समुद्र का स्तर बढ़ने के असर से जुड़े 37 शोधों की समीक्षा की गई है। इनमें से 78 फीसदी अध्ययनों में तटीय पक्षियों के आवास पर नकारात्मक असर पाया गया, जबकि 89 फीसदी अध्ययनों ने पक्षियों की आबादी या उनपर प्रतिकूल प्रभाव दर्ज किया।
यानी समुद्र का बढ़ता जलस्तर केवल उनके घरों को ही नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व को भी खतरे में डाल रहा है।
हाल ही में किए एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि दुनिया के आधे से अधिक प्रवासी पक्षियों की आबादी लगातार घट रही है। बढ़ती मानवीय गतिविधियां, जलवायु परिवर्तन और आवासों का विनाश अब उनकी हजारों साल पुरानी महायात्रा पर भारी पड़ रहा है।
अध्ययन दर्शाता है कि दुनिया में प्रवासी पक्षियों की 51 फीसदी आबादी तेजी से घट रही है। हालात इस कदर खराब हैं कि इनमें से 300 प्रजातियां तो पहले ही अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हैं। वहीं जो पक्षी कभी बेहद आम दिखते थे, वे भी अब तेजी से गायब हो रहे हैं।
तटों पर बढ़ रहा ‘कोस्टल स्क्वीज’
शोधकर्ताओं के मुताबिक, समस्या केवल समुद्र के बढ़ने की नहीं है। इंसानों द्वारा तटों पर बनाए बांध, सड़कें, इमारतें और दूसरी संरचनाएं इस खतरे को और गंभीर बना रही हैं।
गौरतलब है कि समुद्र का स्तर बढ़ने पर तटीय आर्द्रभूमि को धीरे-धीरे जमीन की ओर पीछे हटने और नए क्षेत्रों में फैलने की जरूरत होती है। लेकिन जब उनके पीछे सड़कें, बांध या इमारतें खड़ी हों, तो उनके पास आगे बढ़ने की जगह नहीं बचती। इस स्थिति को ‘कोस्टल स्क्वीज’ यानी तटीय दबाव कहा जाता है।
अध्ययन से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता जेनिफर मैगल के मुताबिक, अगर तटों का विकास इस बात को ध्यान में रखे बिना जारी रहा कि भविष्य में आर्द्रभूमि को कहां जगह मिलेगी, तो समुद्री पक्षियों के महत्वपूर्ण आवास खो सकते हैं।
वहीं अध्ययन से जुड़ी अन्य शोधकर्ता और ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉक्टर तारा मार्टिन का कहना है, "इंसानी बुनियादी ढांचे को बचाने के लिए जब तटों को मजबूत किया जाता है, तो इसके साथ उन जीवों के लिए उपलब्ध जगह घटती जाती है, जो समुद्र और जमीन के बीच के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र पर निर्भर हैं।"
आवास कम होने से कहीं बड़ा हो सकता है नुकसान
अध्ययन में यह भी सामने आया कि पक्षियों के लिए खतरा केवल उनके आवास के कम होने तक सीमित नहीं है। नौ में से आठ ऐसे अध्ययनों में, जिनमें आवास और पक्षियों की आबादी दोनों पर असर का अध्ययन किया गया, आबादी पर अनुमानित प्रभाव केवल आवास के नुकसान से होने वाले प्रभाव से कहीं अधिक गंभीर था।
इसका कारण यह है कि प्रवासी पक्षी अपनी लंबी यात्राओं के दौरान तटीय आर्द्रभूमि और ज्वारीय मैदानों पर रुकते हैं। यहां वे आराम करते हैं और आगे की यात्रा के लिए जरूरी ऊर्जा जुटाते हैं। कुछ पक्षी सैकड़ों किलोमीटर, जबकि कुछ हजारों से लेकर दसियों हजार किलोमीटर तक की यात्रा करते हैं।
उदाहरण के लिए कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में फ्रेजर नदी का मुहाना ऐसे ही बेहद महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक है। प्रशांत के प्रवासी मार्ग पर बड़ी संख्या में उड़ने वाले पक्षी यहां एक अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में जमा होते हैं और अपनी अगली लंबी उड़ान के लिए ऊर्जा जुटाते हैं।
कुछ घंटों का बदलता ज्वार भी बन सकता है खतरा
समुद्र का बढ़ता स्तर ज्वारीय मैदानों के उस समय को कम कर सकता है, जब वे भोजन तलाशने वाले पक्षियों के लिए खुले रहते हैं। इसके साथ तलछट, पानी की गहराई और लवणता में बदलाव से पक्षियों के भोजन की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है।
इतना ही नहीं जो पक्षी तटों पर घोंसले बनाते हैं, उनके लिए बढ़ता जलस्तर घोंसलों के डूबने का खतरा भी बढ़ा सकता है।
जेनिफर मैगल के अनुसार, प्रवासी पक्षियों के लिए ये तटीय क्षेत्र केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि लंबी यात्राओं के दौरान आराम करने और ऊर्जा जुटाने के जीवनदायी पड़ाव हैं। अगर इनमें से कोई महत्वपूर्ण पड़ाव प्रभावित होता है, तो इसका असर पूरी पक्षी आबादी पर पड़ सकता है, क्योंकि बड़ी संख्या में पक्षी इन सीमित और महत्वपूर्ण जगहों पर निर्भर होते हैं।
समुद्र बढ़ने का इंतजार नहीं, अभी से योजना की जरूरत
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि समुद्र के बढ़ते स्तर का सबसे गंभीर असर इस सदी के अंत तक दिखाई दे सकता है, लेकिन उससे निपटने के फैसले आज ही लेने होंगे।
उनका सुझाव है कि मौजूदा आर्द्रभूमि के पीछे की जमीन को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाए, जहां संभव हो वहां कृत्रिम अवरोधों को हटाया या बदला जाए और तटीय इलाकों में तलछट की प्राकृतिक आपूर्ति बढ़ाई जाए। कुछ जगहों पर समुद्र के बढ़ते खतरे को देखते हुए तट से धीरे-धीरे पीछे हटने की योजना भी अपनाई जा सकती है।
फ्रेजर नदी के मुहाने पर चल रहा 'स्टर्जन बैंक सेडिमेंट एनहांसमेंट पायलट प्रोजेक्ट' इसका एक उदाहरण है। इसमें यह जांचा जा रहा है कि अतिरिक्त तलछट के जरिए आर्द्रभूमि की ऊंचाई बढ़ाकर तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को समुद्र के बढ़ते स्तर के साथ टिकाए रखने में मदद मिल सकती है या नहीं।
डॉक्टर मार्टिन के मुताबिक, जितनी जल्दी प्रकृति आधारित तटीय संरक्षण के उपाय शुरू किए जाएंगे, आर्द्रभूमि के पास पीछे हटने के लिए उतनी ही अधिक जगह बचेगी और भविष्य के लिए उतना ही अधिक पक्षी आवासों को बचाया जा सकेगा।
हमे समझना होगा कि समुद्र का बढ़ता स्तर सिर्फ तट रेखा को नहीं बदल रहा। यह उन अदृश्य रास्तों और पड़ावों को भी खतरे में डाल रहा है, जिन पर भरोसा करके प्रवासी पक्षी हर साल हजारों किलोमीटर की यात्रा पूरी करते हैं।