अमेरिका के नेशनल ओसेनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) द्वारा साझा जानकारी से पता चला है कि 2021 में मीथेन के औसत स्तर में रिकॉर्ड 17 पार्टस प्रति बिलियन (पीपीबी) की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। गौरतलब है कि ऐसा पहली बार हुआ है जब वातावरण में मौजूद मीथेन में इतनी भारी वृद्धि देखी गई है। इससे पहले यह वृद्धि 2020 में 15.3 पीपीबी दर्ज की गई थी।
इस तरह वातावरण में मौजूद मीथेन का स्तर 2021 में बढ़कर औसत 1,895.7 पार्टस प्रति बिलियन (पीपीबी) पर पहुंच गया था, जोकि औद्योगिक काल से पहले की तुलना में करीब 162 फीसदी ज्यादा है। वहीं यदि 2021 में हुए मीथेन उत्सर्जन की तुलना 1984 से 2006 के बीच हुए औसत उत्सर्जन से करें तो वो करीब 15 फीसदी ज्यादा है।
यदि औद्योगिक काल से पहले की तुलना में देखें तो आज वातावरण में मौजूद मीथेन (सीएच4) का स्तर तीन गुणा बढ़ चुका है। वहीं यदि जलवायु परिवर्तन पर मीथेन के पड़ने वाले असर को देखें तो यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से वातावरण को गर्म कर रही है। यह गैस कितनी हानिकारक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ग्लोबल वार्मिंग के मामले में यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड से करीब 25 गुना ज्यादा शक्तिशाली है।
जर्नल एनवायर्नमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित एक शोध के हवाले से पता चला है कि यदि इस मीथेन की रोकथाम के लिए अभी प्रयास न किए गए तो 2050 तक इसके वैश्विक उत्सर्जन में 30 फीसदी की वृद्धि हो सकती है।
वैज्ञानिकों की मानें तो इस दशक मानव द्वारा उत्सर्जित हो रही मीथेन में 45 फीसदी की कटौती की जा सकती है। यह कटौती 2045 तक तापमान में होने वाली 0.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि को कम कर सकती है।
यह कटौती हर साल करीब 2.6 लाख लोगों की जान बचा सकती है। साथ ही इसकी मदद से अस्थमा के करीब 7.8 लाख मामलों में कमी आएगी। यह कटौती जहां हर साल 2.5 करोड़ टन फसलों के नुकसान को रोक सकती है, साथ ही इसकी मदद से अत्यधिक गर्मी के कारण बर्बाद होने वाले मानव श्रम के 7,300 करोड़ घंटों को बचाया जा सकता है।
सीओ2 उत्सर्जन में भी दर्ज की गई थी रिकॉर्ड 2.66 पीपीएम की वृद्धि
02 नवंबर 2021 को पहली बार कॉप-26 सम्मलेन में मीथेन की भूमिका को रेखांकित किया था और इसके उत्सर्जन को रोकने की बात कही गई थी। इस सम्मलेन में अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के नेतृत्व में 105 देशों ने स्वैच्छिक और गैर-बाध्यकारी रूप से वैश्विक मीथेन संकल्प-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें उन्होंने वादा किया था कि वो 2030 तक मीथेन उत्सर्जन में तीस फीसदी की कटौती करेंगे।
ऐसे में यदि यह देश अपने वादे पर कायम रहते हैं तो वैश्विक मीथेन उत्सर्जन में करीब 40 फीसदी की कटौती की जा सकती है। हालांकि भारत और चीन ने इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
ऐसा नहीं है कि 2021 में ग्रीनहाउस गैसों में हुई वृद्धि केवल मीथेन तक ही सीमित थी। इसके साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में भी रिकॉर्ड दर से बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। गौरतलब है कि 2021 में सतह के पास कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) का वार्षिक औसत स्तर बढ़कर 414.7 पार्टस प्रति मिलियन (पीपीएम) पर पहुंच गया था।
देखा जाए तो यह वृद्धि 2020 के औसत की तुलना में करीब 2.66 पीपीएम ज्यादा थी। गौरतलब है कि पिछले 10 वर्षों में यह लगातार 10 वां मौका है जब कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में होती वार्षिक वृद्धि 2 पीपीएम से ज्यादा है। यह वृद्धि पिछले 63 वर्षों के इतिहास में जब से इसकी निगरानी की जा रही है तबसे सबसे तेज गति से होती वृद्धि है।
देखा जाए तो बढ़ता कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन सदैव से जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह रहा है। जिसमें मीथेन ने भी उसका साथ दिया है। अनुमान है कि इंसानी गतिविधियों के चलते पिछले वर्ष करीब 3,600 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुई थी। वहीं इसी अवधि के दौरान हुआ मीथेन उत्सर्जन करीब 64 करोड़ टन था। देखा जाए तो मीथेन करीब नौ वर्षों तक वातावरण में रहती है जबकि आज उत्सर्जित हुई कार्बन डाइऑक्साइड कई हजार वर्षों तक वातावरण को गर्म करती रहेगी।
इस बारे में एनओएए से जुड़े वैज्ञानिक रिक स्पिनराड का कहना है कि हमारे आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि वैश्विक उत्सर्जन बड़ी तेज गति से गलत दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में हमें इस बढ़ते प्रदूषण की समस्या को दूर करने के लिए तत्काल और प्रभावी कार्रवाई करने में देरी नहीं करनी चाहिए।