फाइल फोटो: माधव शर्मा  
जलवायु

सूखे की चपेट में राजस्थान, थार रेगिस्तान में बिगड़े हालात, फसलें व पशुपालन प्रभावित

राजस्थान के 693 छोटे-बड़े बांधों में से 216 पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जबकि 378 बांधों में आंशिक रूप से पानी बचा है

Raju Sajwan

जैसलमेर के किसान चतर सिंह जाम के पास लगभग 100 बीघा जमीन है। हर साल खरीफ के मौसम में वह अपने खेतों में ग्वार, मोठ, बाजरा और काचरिया उगाते हैं। इन फसलों से उनके परिवार की आजीविका चलती है और खेतों में पैदा होने वाला चारा पशुओं के काम आता है। लेकिन इस साल हालात बिल्कुल अलग हैं। पूरे मानसून सीजन में वह बारिश का इंतजार करते रह गए और खेतों में बुवाई तक नहीं हो पाई।

जाम कहते हैं, “इस साल इतनी भी बारिश नहीं हुई कि खेतों में बुवाई की जा सके। सारे खेत खाली पड़े हैं। सोचा था कि रबी की बुवाई करूंगा, लेकिन खेत इस कदर सूखे हुए हैं कि अब तक कुछ भी नहीं लगा पाया हूं। हमारे तो खड़ीनों में भी पानी नहीं रहा, जिसकी नमी से रबी की बुवाई की जाती है।”

खड़ीन पश्चिमी राजस्थान की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली है, जिसमें बारिश के पानी को खेतों में रोककर मिट्टी में नमी बनाए रखने की कोशिश की जाती है। इस नमी का इस्तेमाल रबी की फसल उगाने में होता है। लेकिन जब बारिश ही पर्याप्त न हो, तो यह पारंपरिक व्यवस्था भी किसानों को राहत नहीं दे पाती। जैसलमेर में इस बार यही स्थिति बन गई है। खरीफ की फसल नहीं हुई और खेतों में नमी की कमी के कारण रबी की बुवाई भी मुश्किल हो गई है।

यह संकट केवल फसल तक सीमित नहीं है। पश्चिमी राजस्थान में खेती और पशुपालन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। खेतों में उगने वाला बाजरा, मोठ और दूसरी फसलें पशुओं के लिए चारे का भी काम करती हैं। इस साल फसल नहीं होने से चारे की उपलब्धता घट गई है और पशुपालकों पर दोहरी मार पड़ी है।

जाम बताते हैं कि पहले जो चारा 6 से 7 रुपए प्रति किलो मिलता था, उसकी कीमत बढ़कर 15 से 16 रुपए प्रति किलो हो गई है। इतनी कीमत चुकाने के बाद भी पर्याप्त चारा मिलना मुश्किल है। ऐसे में पशुपालक अपने पशुओं को भूख से मरने देने के बजाय उन्हें कम कीमत पर बेचने को मजबूर हैं।

जाम का अनुमान है कि अब तक पशुपालक अपनी लगभग 20 फीसदी भेड़-बकरियां बेच चुके हैं। जिन पशुओं की कीमत पहले 8,000 से 10,000 रुपए तक मिलती थी, उन्हें अब 4,000 से 5,000 रुपए में बेचा जा रहा है। पशुपालक इस रकम का इस्तेमाल महंगा चारा खरीदने में कर रहे हैं। जाम को आशंका है कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो जुलाई 2027 में अगले मानसून के आने से पहले तक पशुपालक अपने लगभग 60 फीसदी पशु बेच चुके होंगे। यह उनका स्थानीय हालात पर आधारित अनुमान है, कोई आधिकारिक राज्यव्यापी आंकड़ा नहीं।

पशुपालकों की अर्थव्यवस्था संकट में

पश्चिमी राजस्थान में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका का प्रमुख आधार है। यहां के शुष्क और अर्धशुष्क इलाकों में पशुपालन खेती का केवल सहायक काम नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है। बारिश की कमी, फसल उत्पादन में गिरावट और चारे की बढ़ती कीमतें इस पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं।

राजस्थान सरकार की आर्थिक समीक्षा 2023-24 के अनुसार, राज्य के शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में पशुपालन की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहीं, राजस्थान सरकार के पशुपालन विभाग की 20वीं पशुधन गणना 2019 के मुताबिक, राज्य में कुल 5.68 करोड़ पशुधन दर्ज किया गया था।

पश्चिमी राजस्थान में बाड़मेर पशुधन की संख्या के लिहाज से प्रमुख जिला था। यहां लगभग 50.9 लाख पशुधन दर्ज किया गया, जिसमें करीब 29.47 लाख बकरियां, 10.13 लाख भेड़ और 9.05 लाख गायें शामिल थीं। जैसलमेर में लगभग 11.04 लाख बकरियां और 8.37 लाख भेड़ें थीं, जबकि जोधपुर में करीब 16.41 लाख बकरियां और 6.19 लाख भेड़ें दर्ज की गई थीं।

ये आंकड़े 2019 की पशुधन गणना के हैं और मौजूदा पशुओं की संख्या को नहीं दर्शाते। फिर भी इनसे पता चलता है कि पश्चिमी राजस्थान में पशुपालन कितने बड़े पैमाने पर आजीविका का आधार है। ऐसे में चारे और पानी की कमी का असर केवल पशुओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन परिवारों की आमदनी पर भी पड़ेगा जो दूध, ऊन और पशुओं की बिक्री से अपना खर्च चलाते हैं।

पशुपालकों के लिए पशु बेचना फिलहाल चारे का खर्च जुटाने का एक तरीका हो सकता है, लेकिन कम कीमत पर पशुओं की बिक्री उनकी भविष्य की कमाई को भी प्रभावित करेगी। यदि परिवार अपने पशुधन का बड़ा हिस्सा बेच देते हैं, तो अगले मानसून के बाद हालात सुधरने पर भी उनके लिए पशुपालन दोबारा शुरू करना आसान नहीं होगा।

पश्विमी राजस्थान में 30 फीसदी कम हुई बारिश

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की 30 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में इस साल मानसून सीजन यानी 1 जून से 30 सितंबर के बीच 340.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य बारिश 435.6 मिलीमीटर होती है। इस तरह राज्य में सामान्य से 95.4 मिलीमीटर यानी 22 फीसदी कम बारिश हुई।

राज्य के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बारिश की कमी का अंतर भी महत्वपूर्ण है। पूर्वी राजस्थान में 517.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य औसत 626.6 मिलीमीटर है। यानी यहां सामान्य से 17 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। इसके मुकाबले पश्चिमी राजस्थान में केवल 198.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य औसत 283.6 मिलीमीटर है। इस तरह पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी 30 फीसदी रही।

पश्चिमी राजस्थान के जिलों में स्थिति एक जैसी नहीं रही। जालोर में सबसे अधिक कमी दर्ज की गई, जहां 173.4 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 417.8 मिलीमीटर होती है। यानी जिले में सामान्य से 59 फीसदी कम बारिश हुई। पाली में 226.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य औसत 491.6 मिलीमीटर है। यहां 54 फीसदी की कमी रही।

जैसलमेर में केवल 89.1 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 176.9 मिलीमीटर होती है। इस तरह जिले में सामान्य से 50 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। हनुमानगढ़ में 150.4 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य 253.6 मिलीमीटर से 41 फीसदी कम है। जोधपुर में भी सामान्य से 33 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि पश्चिमी राजस्थान में मानसून के दौरान बारिश की कमी राज्य के औसत से कहीं अधिक रही। जैसलमेर में बारिश सामान्य की आधी रह गई, जबकि जालोर और पाली में कमी और भी गंभीर थी। हालांकि, बारिश की कमी अपने आप में पूरे जिले में सूखे की आधिकारिक घोषणा नहीं है। इसके लिए बोई गई फसलों, मिट्टी की नमी, जल उपलब्धता और अन्य स्थानीय परिस्थितियों का आकलन भी जरूरी होता है।

लेकिन जैसलमेर में खेतों की बुवाई न हो पाने, खड़ीनों में पानी नहीं बचने और चारे की कीमत बढ़ने जैसे जमीनी हालात बताते हैं कि कम बारिश का असर अब खेती और पशुपालन दोनों पर पड़ रहा है।

अक्टूबर में भी बेरूखी जारी

मानसून सीजन में कम बारिश के बाद अक्टूबर में भी राजस्थान के शुष्क इलाकों को राहत नहीं मिली है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की 23 अक्टूबर 2026 तक की जिला वर्षा रिपोर्ट के अनुसार, 1 से 23 अक्टूबर के बीच पूरे राजस्थान में 4.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि इस अवधि का सामान्य औसत 10.2 मिलीमीटर है। यानी राज्य में अक्टूबर की अब तक की बारिश सामान्य से 55 फीसदी कम रही। पूर्वी राजस्थान में 6.9 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य 14 मिलीमीटर से 51 फीसदी कम है। पश्चिमी राजस्थान में स्थिति और खराब रही, जहां केवल 2.7 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य बारिश 7.1 मिलीमीटर होती है। इस तरह पश्चिमी राजस्थान में अक्टूबर की बारिश सामान्य से 61 फीसदी कम रही।

पश्चिमी राजस्थान के जिलावार आंकड़े इस संकट को और स्पष्ट करते हैं। 1 से 23 अक्टूबर के बीच बाड़मेर, जालोर, नागौर और पाली में बिल्कुल बारिश दर्ज नहीं की गई, जबकि इन जिलों में इस अवधि की सामान्य बारिश क्रमशः 8.2, 10.2, 7.3 और 11.4 मिलीमीटर है। जोधपुर में केवल 0.3 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य औसत 5.1 मिलीमीटर है। जैसलमेर में 0.3 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य बारिश 4.9 मिलीमीटर होती है।

इस तरह जैसलमेर में अक्टूबर की बारिश सामान्य से 94 फीसदी और जोधपुर में 95 फीसदी कम रही। दूसरी ओर, श्रीगंगानगर में 14.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य 4.3 मिलीमीटर से 238 फीसदी अधिक है। हनुमानगढ़ में भी सामान्य से 37 फीसदी अधिक बारिश हुई। इससे स्पष्ट है कि पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी हर जिले में एक जैसी नहीं है, लेकिन जैसलमेर, जालोर, जोधपुर, पाली और बाड़मेर में अक्टूबर के दौरान बारिश लगभग न के बराबर रही।

जलाशय हुए खाली

राजस्थान में बारिश की कमी के साथ जल भंडारण की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही है। राजस्थान जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 693 छोटे-बड़े बांधों में से 216 पूरी तरह खाली हैं, जबकि 378 बांधों में आंशिक रूप से पानी बचा है। केवल 99 बांध पूरी तरह भरे हुए हैं।

इन आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के लगभग 31 फीसदी बांध पूरी तरह खाली हैं, जबकि करीब 55 फीसदी बांधों में उनकी पूरी क्षमता के मुकाबले कुछ पानी बचा है। शेष लगभग 14 फीसदी बांध पूरी तरह भरे हुए हैं।

क्षमता के आधार पर देखें तो 4.25 मिलियन घन मीटर से अधिक क्षमता वाले 286 बांधों में से 51 पूरी तरह खाली हैं और 186 आंशिक रूप से भरे हुए हैं। वहीं, इससे कम क्षमता वाले 407 बांधों में 165 पूरी तरह खाली हैं और 192 में आंशिक रूप से पानी बचा है। इस तरह छोटे बांधों में भी बड़ी संख्या में जल भंडारण नहीं बचा है।

राज्य के इन बांधों की कुल जल भंडारण क्षमता 13,029 मिलियन घन मीटर है। 8 अक्टूबर 2026 तक इनमें 8,052.44 मिलियन घन मीटर पानी उपलब्ध था। यानी कुल क्षमता का 61.80 फीसदी पानी बचा था। पिछले साल 8 अक्टूबर को यह स्तर 90.38 फीसदी था। इस तुलना से पता चलता है कि एक साल में बांधों में उपलब्ध पानी की स्थिति काफी कमजोर हुई है।

15 जून 2026 को बांधों में कुल क्षमता का 44.46 फीसदी पानी था, जो मानसून के बाद बढ़कर 61.80 फीसदी तक पहुंचा। लेकिन पिछले साल की समान अवधि की तुलना में मौजूदा स्तर काफी नीचे है। मानसून के दौरान जल भंडारण में बढ़ोतरी होने के बावजूद कई बांधों में पानी की उपलब्धता सीमित बनी हुई है।

छोटे बांधों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। 4.25 मिलियन घन मीटर से कम क्षमता वाले 407 बांधों में उनकी कुल क्षमता का केवल 33.25 फीसदी पानी बचा है।

पश्चिमी राजस्थान में बचा केवल 16 फीसदी पानी

पश्चिमी राजस्थान में जल भंडारण की स्थिति राज्य के औसत से भी कहीं अधिक चिंताजनक है। जोधपुर जल संसाधन जोन के 117 बांधों की कुल जल भंडारण क्षमता 991.65 मिलियन घन मीटर है। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें केवल 155.89 मिलियन घन मीटर पानी उपलब्ध था। यानी कुल क्षमता का महज 15.72 फीसदी पानी बचा था।

पिछले वर्ष इसी अवधि में इन बांधों में कुल क्षमता का 80.25 फीसदी पानी उपलब्ध था। इस तरह एक साल के भीतर जल भंडारण में भारी गिरावट आई है। पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी, खेतों में बुवाई न हो पाना और पशुओं के लिए चारे की बढ़ती कीमतों के बीच बांधों में पानी का इतना कम स्तर संकट को और गंभीर बना सकता है।

अभी घोषित नहीं हुआ सूखा

हालात काफी बिगड़ने के बावजूद राज्य में सूखा घोषित नहीं किया गया है। जबकि राज्य भर में पंचायत चुनावों का सिलसिला शुरू हो चुका है। पंचायत चुनावों में इसे मुद्दा भी बनाया जा रहा है। विपक्षी दल राजस्थान में महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश की तरह सूखा घोषित करने की मांग कर रहे हैं।