जलवायु

महासागरों को चढ़ा रिकॉर्ड बुखार: 21.1 डिग्री पर पहुंचा समुद्र की सतह का औसत तापमान

22 अगस्त को समुद्र की सतह का वैश्विक औसत तापमान रिकॉर्ड 21.1 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया, वैज्ञानिकों ने इसे महासागरों पर बढ़ते जलवायु दबाव और आने वाले खतरों की गंभीर चेतावनी बताया है।

Lalit Maurya

  • महासागरों का बढ़ता तापमान अब जलवायु संकट की एक गंभीर और स्पष्ट चेतावनी बनकर सामने आया है।

  • 22 अगस्त 2026 को समुद्र की सतह का वैश्विक औसत तापमान रिकॉर्ड 21.1 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया, जो मार्च 2024 के पिछले रिकॉर्ड को भी पार कर गया।

  • सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह रिकॉर्ड अगस्त में बना है, जबकि आमतौर पर समुद्र मार्च-अप्रैल में सबसे अधिक गर्म होते हैं। इसके पीछे केवल मजबूत हो रहा अल नीनो नहीं, बल्कि दशकों से मानव गतिविधियों के कारण महासागरों में जमा हो रही अतिरिक्त गर्मी भी जिम्मेदार है।

  • नतीजतन, समुद्री हीटवेव वाले दिनों की संख्या 1990 के दशक की तुलना में तीन गुना से अधिक हो चुकी है।

  • बढ़ती गर्मी प्रवाल भित्तियों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों को नुकसान पहुंचाने के साथ समुद्र का स्तर बढ़ा रही है और तटीय बस्तियों, छोटे द्वीपीय देशों तथा मत्स्य पालन पर निर्भर करोड़ों लोगों के भविष्य को खतरे में डाल रही है। यह रिकॉर्ड सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस धरती की चेतावनी है, जिसका बुखार अब समुद्रों तक पहुंच चुका है।

पृथ्वी पर बढ़ती गर्मी अब सिर्फ जमीन और हवा तक सीमित नहीं रही, महासागर भी लगातार तपने लगे हैं। ऐसा ही कुछ इस महीने भी देखा गया, जब 22 अगस्त 2026 को वैश्विक स्तर पर समुद्र की सतह का औसत तापमान बढ़कर रिकॉर्ड 21.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।

यूरोपियन यूनियन की जलवायु एजेंसी कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस ने पुष्टि की है कि यह दर्ज जलवायु इतिहास का अब तक का सबसे अधिक दैनिक तापमान है, जिसने मार्च 2024 में बने पिछले ऑल-टाइम रिकॉर्ड (21.09 डिग्री सेल्सियस) को भी पीछे छोड़ दिया है। बता दें कि कॉपरनिकस का यह आंकड़ा 1979 से उपलब्ध रिकॉर्ड पर आधारित है।

इस रिकॉर्ड की सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यह अगस्त में बना है। आमतौर पर वैश्विक स्तर पर समुद्र की सतह का औसत तापमान मार्च और अप्रैल में सबसे अधिक रहता है। इसके बावजूद अगस्त में तापमान का पिछले सभी रिकॉर्ड को तोड़ देना दर्शाता है कि महासागर किस असाधारण गर्मी से गुजर रहे हैं।

इससे पहले अगस्त का पिछला रिकॉर्ड 2023 में 20.98 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था।

देखा जाए तो यह सिर्फ एक दिन की गर्मी नहीं है। 2026 में दुनिया के बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान लगातार सामान्य से अधिक रहा है। ऐसे में नया रिकॉर्ड महासागरों पर बढ़ते दबाव का एक और स्पष्ट संकेत है।

अल नीनो ने बढ़ाई गर्मी, लेकिन संकट की जड़ कहीं और

रुझानों को देखें तो इस समय उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में मजबूत अल नीनो विकसित हो रहा है, जो समुद्र के तापमान को और बढ़ा रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के मुताबिक, आने वाले महीनों में अल नीनो के और मजबूत होने की आशंका है। कॉपरनिकस की मौसमी भविष्यवाणी प्रणाली भी संकेत दे रही है कि यह घटना कई दशकों में देखे गए सबसे मजबूत स्तरों तक पहुंच सकती है।

हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि महासागर की मौजूदा गर्मी को केवल अल नीनो से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए दशकों से इंसानों की वजह से जलवायु में हो रहे बदलाव और वैश्विक तापमान में वृद्धि भी जिम्मेवार है।

यानी अल नीनो पहले से गर्म हो चुके महासागर में और गर्मी जोड़ रहा है। यानी बढ़ते इंसानी उत्सर्जन ने समुद्रों में पहले से ही इतनी गर्मी भर दी है कि अब यह नया उबाल आ गया है।

बढ़ रहा समुद्री हीटवेव का कहर

कॉपरनिकस में जलवायु रणनीति प्रमुख सामंथा बर्गेस के मुताबिक, यह रिकॉर्ड ऐसे महासागर का स्पष्ट संकेत है जो लगातार बढ़ते दबाव में है। समुद्र का तापमान बढ़ने के साथ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए खतरे भी बढ़ रहे हैं। दुनिया में समुद्री हीटवेव वाले दिनों की संख्या 1990 के दशक की शुरुआत से तीन गुणा से अधिक हो चुकी है।

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि समुद्र की बढ़ती गर्मी का संकट केवल समुद्री जीवों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर तटों पर बसे शहरों, छोटे द्वीपीय देशों और उन करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है, जिनका जीवन और भविष्य समुद्र से जुड़ा है।

महासागरों का बुखार बढ़ा तो इंसानों की बढ़ेंगी मुश्किलें

गर्म पानी फैलता है, जिससे समुद्र का स्तर बढ़ता है और तटीय इलाकों में बाढ़ तथा कटाव का खतरा गहराता जाता है। साथ ही, समुद्री हीटवेव पहले से कहीं अधिक तीव्र और बार-बार आ सकती हैं।

इस बढ़ती गर्मी की मार प्रवाल भित्तियों और समुद्री घास के मैदानों जैसे नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों पर पड़ती है। इनके कमजोर पड़ने से मछलियों और अन्य समुद्री जीवों का जीवन संकट में आ सकता है, जिसका सीधा असर मत्स्य पालन और जलीय कृषि पर निर्भर लाखों परिवारों की आजीविका पर पड़ेगा।

खतरा यहीं खत्म नहीं होता। गर्म महासागर वातावरण में अधिक गर्मी और नमी पहुंचाते हैं, जिससे कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और तूफानों के और अधिक तीव्र होने की आशंका बढ़ सकती है। दूसरी ओर, समुद्र की बढ़ती गर्मी उनकी वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता को भी कमजोर कर सकती है। यानी, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ प्रकृति की सबसे महत्वपूर्ण ढालों में से एक खुद कमजोर पड़ रही है, और इसका खामियाजा आखिरकार इंसानों को ही भुगतना पड़ सकता है।

एक चेतावनी है रिकॉर्ड टूटना

वैज्ञानिक फिलहाल निगरानी कर रहे हैं कि समुद्र की सतह का यह रिकॉर्ड तापमान कुछ समय की असामान्य स्थिति है या आने वाले दिनों में भी बना रहता है। लेकिन एक बात साफ है, महासागर अब केवल गर्म नहीं हो रहे, वे लगातार बढ़ते जलवायु दबाव का सामना कर रहे हैं।

समुद्र धरती की गर्मी का बड़ा हिस्सा अपने भीतर समेटते हैं और मानव जीवन को सहारा देने वाले अनगिनत पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा करते हैं। इसलिए समुद्र की सतह पर दर्ज हुआ यह नया रिकॉर्ड सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस बदलती जलवायु की चेतावनी है जिसका असर आखिरकार इंसानी बस्तियों, भोजन, आजीविका और जीवन पर पड़ता है।

ऐसे में अगर समय रहते हमने पृथ्वी के इस बुखार को कम नहीं किया, तो इसका खामियाजा हमारी आने वाली पीढ़ियों को चुकाना पड़ेगा।