अध्ययन में 95 मधुमक्खी प्रजातियों पर शोध, घोंसला स्थान के आधार पर गर्मी सहनशीलता का अंतर पाया गया।
पौधों के तनों में रहने वाली मधुमक्खियां सबसे अधिक खतरे में, क्योंकि उन्हें बाहरी तापमान से कोई सुरक्षा नहीं मिलती।
जमीन के नीचे घोंसला बनाने वाली मधुमक्खियां गर्मी से बेहतर सुरक्षित रहती हैं, मिट्टी तापमान को स्थिर बनाए रखती है।
बढ़ता वैश्विक तापमान मधुमक्खियों की आबादी और परागण क्षमता पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है, कृषि उत्पादन भी प्रभावित होगा।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की मधुमक्खियां अधिक संवेदनशील पाई गई, पहले से गर्म वातावरण में अतिरिक्त गर्मी चुनौती बन रही है।
ऑस्ट्रेलिया में हुए एक अहम अध्ययन ने चेतावनी दी है कि बढ़ती गर्मी का असर अलग-अलग मधुमक्खी की प्रजातियों पर अलग तरह से पड़ सकता है। खासकर वे मधुमक्खियां जो पौधों के तनों (स्टेम) के अंदर घोंसला बनाती हैं, उन्हें सबसे ज्यादा खतरा बताया गया है। इसके उलट जमीन के नीचे घोंसला बनाने वाली मधुमक्खियां गर्मी से खुद को बेहतर तरीके से बचा सकती हैं।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुआ है। इसमें पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली 95 देशी मधुमक्खी प्रजातियों का अध्ययन किया गया। ये प्रजातियां उष्णकटिबंधीय उत्तरी क्षेत्रों से लेकर ठंडे दक्षिणी हिस्सों तक फैली हुई हैं।
मधुमक्खियों के घोंसले बनाने के तरीके का असर
ऑस्ट्रेलिया में लगभग 1,700 देशी मधुमक्खी प्रजातियां पाई जाती हैं। ये मधुमक्खियां आमतौर पर तीन तरह से घोंसला बनाती हैं। कुछ मधुमक्खियां जमीन के अंदर सुरंग बनाकर रहती हैं, कुछ पेड़ों के खोखलों या लकड़ी के अंदर बने खाली स्थानों में घोंसला बनाती हैं, और कुछ प्रजातियां पौधों के तनों या टहनियों के अंदर छोटे छेदों में अपना घर बनाती हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, घोंसला बनाने की जगह ही यह तय करती है कि मधुमक्खी गर्मी को कितनी आसानी से सहन कर पाएगी। जमीन के नीचे रहने वाली मधुमक्खियां बाहरी गर्मी से काफी हद तक सुरक्षित रहती हैं, क्योंकि मिट्टी तापमान को संतुलित रखती है। वहीं पौधों के तनों में रहने वाली मधुमक्खियां सीधे बाहरी तापमान के संपर्क में रहती हैं।
शोध पत्र में मैकार्वरी यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि तनों में रहने वाली मधुमक्खियां गर्मी से बच नहीं पातीं, क्योंकि उनके घोंसले में बहुत कम सुरक्षा होती है। इसलिए वे जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ता खतरा
शोध में यह भी पाया गया कि जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इन मधुमक्खियों के लिए खतरा भी बढ़ता जा रहा है। खासकर वे प्रजातियां जो पहले से ही गर्म क्षेत्रों में रहती हैं, उनके पास अब तापमान बढ़ने के साथ खुद को ढालने के लिए बहुत कम अवसर बचा है।
शोध में कहा गया है कि यह समझना बहुत कठिन है कि कौन सी प्रजातियां जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित रहेंगी। उन्होंने कहा कि कई बार जो प्रजातियां गर्मी सहन करने में सक्षम होती हैं, वे भी खतरे में आ सकती हैं, क्योंकि वे पहले से ही अपने अधिकतम सहनशील तापमान के करीब रहती हैं।
मधुमक्खियों की भूमिका और महत्व
मधुमक्खियां केवल शहद बनाने के लिए ही नहीं जानी जातीं, बल्कि वे प्रकृति और कृषि दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ये परागण का काम करती हैं, जिससे पौधों और फसलों का उत्पादन संभव होता है।
शोध के अनुसार, मधुमक्खियां पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत जरूरी हैं। वे कई फसलों के उत्पादन में मदद करती हैं, जिनमें मैकाडामिया नट्स, एवोकाडो, आम और लीची जैसी फसलें शामिल हैं। यदि मधुमक्खियों की संख्या कम होती है, तो इसका असर खाद्य उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की मधुमक्खियां अधिक खतरे में
शोध में यह भी पाया गया कि भूमध्य रेखा के पास रहने वाली मधुमक्खियां जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। इन क्षेत्रों में तापमान पहले से ही अधिक होता है, इसलिए अतिरिक्त गर्मी इनके लिए और अधिक खतरनाक साबित हो सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कोई प्रजाति कितनी गर्मी सह सकती है। यह भी समझना जरूरी है कि वह अपने वातावरण में कितनी सुरक्षा पा सकती है। जो प्रजातियां पहले से ही बहुत गर्म जगहों में रहती हैं, उनके पास आगे बढ़ते तापमान से बचने के सीमित विकल्प होते हैं।
संरक्षण की जरूरत
शोधकर्ताओं ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया की देशी मधुमक्खियों के बारे में अभी भी बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इसलिए ऐसे अध्ययन बहुत जरूरी हैं, ताकि यह समझा जा सके कि कौन सी प्रजातियाँ सबसे ज्यादा खतरे में हैं और उन्हें कैसे बचाया जा सकता है।
यह अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन का असर सभी जीवों पर समान नहीं होता। मधुमक्खियों के मामले में उनका घोंसला बनाने का तरीका ही उनके बचाव या खतरे का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। इसलिए इनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक जानकारी और ठोस कदम दोनों की आवश्यकता है।