फोटो: विकास चौधरी 
जलवायु

नौतपा: लोक विज्ञान से आधुनिक थर्मोडायनेमिक्स तक, भारतीय मानसून को समझने की वैज्ञानिक कुंजी

नौतपा पीढ़ियों के सामूहिक और गहरे अनुभव से उपजा ‘लोक मौसम विज्ञान’ की व्यवहारिक समझ है। मई के अंत में होने वाली यह विशिष्ट तपन ही भारतीय मानसून को सक्रिय करने वाली परिस्थितियों को प्रभावी बनाती है

Vineeta Parmar, Kushagra Rajendra

"तपै नवतपा नव दिन जोय, तौ पुन बरखा पूरन होय।""

सदियों से भारतीय ग्रामीण अंचलों में गूंजती यह कहावत केवल कोई लोक-विश्वास नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के गहरे मौसम-वैज्ञानिक अनुभव का निचोड़ है। हर साल मई के आखिरी सप्ताह में जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तो शुरू होता है भीषण गर्मी का नौ दिवसीय चक्र, जिसे हम 'नौतपा' कहते हैं। आम बोलचाल में माना जाता है कि इन नौ दिनों में धरती जितनी ज्यादा भट्टी की तरह तपेगी, आगे चलकर मानसून उतना ही झमाझम बरसेगा।

भारतीय उपमहाद्वीप में मौसम के चक्र को समझने के लिए सदियों से खगोलीय और ऋतु-वैज्ञानिक अवलोकनों का उपयोग किया जाता रहा है। 'नौतपा' इसी अनुभवजन्य ज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। चंद्र-सौर पंचांग के अनुसार, जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब से अगले नौ दिनों की अवधि को नौतपा कहा जाता है। हमारे लोक-साहित्य में भी साफ कहा गया है कि "नौतपा तपे तो साख (फसल) होवे, ना तपे तो सूखा पड़े।" यह पारंपरिक ज्ञान सदियों से किसानों को आने वाली फसलों की तैयारी और बादलों के मिजाज को भांपने का एक अचूक घरेलू कैलेंडर देता आया है। 

अवलोकन-आधारित मौसमी समझ 

आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखें तो नौतपा, उत्तर और मध्य भारत में चरम ग्रीष्म ऋतु को रेखांकित करता है, प्रमाणिक लोकविज्ञान का उदहारण है। मई के अंत में पृथ्वी के झुकाव के कारण सूर्य की सीधी किरणें भारत के मैदानी भागों पर ठीक लंबवत कोण पर पड़ती हैं, जिससे तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है।

और यह ठीक वही समय होता है, जब ज्येष्ठ मास में सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है (प्रायः 25 मई से 2 जून तक)। यह खगोलीय संरेखण इस भूभाग पर सौर विकिरण को चरम स्तर पर पहुंचा देता है, जिससे इस 9 दिवसीय चक्र में रिकॉर्ड-तोड़ लू और भीषण शुष्कता की स्थिति उत्पन्न होती है। 

वायुमंडलीय भौतिकी कहती है कि जब मैदानी इलाके अत्यधिक गर्म होते हैं, तो वहाँ की हवा हल्की होकर ऊपर उठ जाती है और एक शक्तिशाली कम वायुदाब का क्षेत्र बनता है। यह क्षेत्र एक विशाल वैक्यूम क्लीनर की तरह काम करता है, जो हिंद महासागर की ठंडी और नमी से भरी मानसूनी हवाओं को तेजी से अपनी ओर खींचता है। यही कारण है कि पारंपरिक कृषि-पारिस्थितिकी और समकालीन जलवायु विज्ञान दोनों ही नौतपा को आगामी दक्षिण-पश्चिम मानसून की गतिशीलता और सुदृढ़ता का एक प्रमुख प्राकृतिक संकेतक मानते हैं।  इस तरह, लोक परम्परा की यह पुरानी कहावत कि "धरती जितना तपेगी, उतना ही अच्छा मानसून आएगा", आधुनिक मौसम विज्ञान के 'थर्मोडायनामिक्स' सिद्धांत पर शत-प्रतिशत खरी उतरती है। 

हमारा वर्तमान बौद्धिक विमर्श प्रकृति की हमारी लोक समझ को लेकर दो विपरीत ध्रुवों के बीच फंसी हुई है। तथाकथित प्रगतिशील और यूरो-सेंट्रिक एलीट वर्ग है, जो बिना किसी गहन परीक्षण या वैज्ञानिक जांच के, भारत के सभी पारंपरिक ज्ञान को अंधविश्वास या 'छद्म-विज्ञान' कहकर खारिज कर देता है। दूसरी ओर, एक ऐसा वर्ग भी है जो अति-उत्साह में बिना किसी वैज्ञानिक कार्यप्रणाली के, प्राचीन ग्रंथों में ही ब्रह्मांड की सभी समस्याओं का अंतिम समाधान ढूंढ लेने का दावा करता है।

अनेक स्थानीय पारम्परिक समझदारी की तरह ही ‘नौतपा’ न तो कोई अंधविश्वास है और न ही कोई अलौकिक चमत्कार; बल्कि यह एक विशुद्ध शुद्ध, अवलोकन-आधारित मौसम वैज्ञानिक परिघटना की लोक समझ  है, जिसे आधुनिक थर्मोडायनेमिक्स और वायुमंडलीय भौतिकी के सिद्धांतों के माध्यम से पूरी तरह समझा जा किया जा सकता है।

खगोल-विज्ञान और ज्योतिष का घालमेल 

नौतपा को अंधविश्वास मानने वाले एलीट वर्ग और इसे कोई जादुई चमत्कार मानने वाले पुरातनपंथी दोनों की भूल यह है कि वे 'खगोल-विज्ञान' और 'फलित ज्योतिष' के फर्क को नहीं समझ पाते। प्राचीन भारत में जब प्रकृति को समझने के लिए आज के जैसे थर्मामीटर या बैरोमीटर या सैटेलाइट जैसे उपकरण नहीं थे, तब ऋषियों और किसानों ने हजारों साल के अनुभव के आधार पर समय, ऋतुओं में बदलाव, प्राकृतिक घटनाओ और खासकर बरसात के पूर्वानुमान के सटीक मापन के लिए आसमान के तारो और खगोलीय पिंडो की स्थिति की गणना को आधार बना कर इसे एक 'ज्यामितीय कैलेंडर' के रूप में इस्तेमाल किया। 

सूर्य का रोहिणी नक्षत्र (वृषभ राशि में 10° से 23°20’ तक का क्षेत्र का एक तारा समूह) में प्रवेश करना वास्तव में कोई रहस्यमयी घटना नहीं है, बल्कि वर्ष के उस विशिष्ट समय को दर्शाता है जब हर साल पृथ्वी सूर्य के सबसे निकटतम तापीय प्रभाव क्षेत्र में होती है। यह मात्र एक वार्षिक कैलंडर जैसा है।

हमारी लोक-कथाओं और कुछ ज्योतिषीय मान्यताओं में भले ही रूपक के तौर पर कह दिया जाता है कि "रोहिणी नक्षत्र शीतलता का प्रतीक है और सूर्य पृथ्वी और उसके बीच आकर उसकी ठंडक सोख लेता है, जिससे पृथ्वी तपने लगती है।" लेकिन अगर हम वैज्ञानिक यथार्थ को देखें, तो रोहिणी नक्षत्र के तारे (जैसे मुख्य तारा रोहिणी या अलड़ेबारण) हमारी धरती से लगभग 65 प्रकाश-वर्ष दूर हैं।

इतनी दूरी के कारण उन तारों का पृथ्वी के रोज़मर्रा के मौसम पर कोई सीधा तापीय या गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव नहीं पड़ सकता। अतः, हमारे पूर्वजों द्वारा 'रोहिणी' नाम का उपयोग केवल ग्रीष्म संक्रांति से ठीक पहले पड़ने वाले उन नौ सबसे गर्म दिनों की पहचान और गणना के लिए किया गया था। सीधे शब्दों में कहें तो, नौतपा का आधार कोई अंधविश्वासी ग्रह-नक्षत्रों का खेल नहीं, बल्कि पीढ़ियों के सामूहिक अनुभव से तैयार की गई एक शुद्ध 'खगोलीय घड़ी' है। 

नौतपा का आधार 

नौतपा के पीछे का पूरा विज्ञान सालो भर एक खास आवृति से सूरज की बदलती स्थिति (पृथ्वी के सापेक्ष) और  तापमान का हवा के दबाव पर असर, जिसके आधार पर इन दिनों भारत में पड़ने वाली अधिकतम तपन को आसानी से समझा जा सकता है। मई के अंतिम सप्ताह में पृथ्वी का अपनी धुरी पर 23.5° का झुकाव ऐसी स्थिति में होता है जहाँ सूर्य की किरणें सीधे कर्क रेखा के ऊपर केंद्रित होती हैं और लगभग 90° के लंबवत कोण पर पड़ती हैं।

किरणें जितनी सीधी होंगी, जिससे ऊर्जा का बिखराव न्यूनतम होता है और नतीजा प्रति वर्ग मीटर जमीन पर पड़ने वाली धूप की तीव्रता अपने उच्चत्तम स्तर पर होगी। वही बाकी दिनों में जब तिरछी किरणों को धरती तक आने में ऊर्जा का बिखराव अधिकतम होता है और धूप की तीव्रता कम हो जाती हैं। 

इस असहनीय धूप के कारण उत्तर-मध्य भारत की सूखी मिट्टी भट्टी की तरह तपने लगती है, जिसके कारण उसके ठीक ऊपर मौजूद हवा की परतें भी गर्म होकर फैलती हैं। हल्की होने के कारण यह गर्म हवा तेजी से आसमान की तरफ ऊपर उठने लगती है और जमीन के पास हवा का एक खालीपन या बेहद कम दबाव का क्षेत्र बन जाएगा। इस कारण समूचे क्षेत्र में अत्यधिक शक्तिशाली 'तापीय निम्न-दाब क्षेत्र' विकसित होता है। नौतपा के नौ दिनों में पड़ने वाली भीषण गर्मी इस निम्न-दाब के क्षेत्र को बहुत ज्यादा मजबूत और गहरा बना देती है। 

ठीक इसके विपरीत इसी समय, हिंद महासागर का पानी जमीन के मुकाबले ठंडा होता है, जिससे वहाँ की हवा भारी होती है और एक 'उच्च-वायुदाब क्षेत्र' बना रहता है। वायुमंडल के नियम के अनुसार हवा हमेशा भारी दबाव वाले क्षेत्र से खाली या कम दबाव वाले क्षेत्र की तरफ भागती है। उत्तर भारत के मैदानों में नौतपा के कारण जो हवा का खालीपन (निम्न-दाब) पैदा होता है, एक महाद्वीपीय सक्शन पंप की तरह काम करता है। यह वायुदाब का बड़ा अंतर हिंद महासागर की भारी, नमी से लबालब मानसूनी हवाओं को उपमहाद्वीप खींच लाता है। सीधे शब्दों में कहें तो, नौतपा के दौरान मैदान जितने ज्यादा तपेंगे, हवा का वैक्यूम उतना ही मजबूत होगा और मानसून उतना ही मजबूत होगा। 

नौतपा: मई के अंत में ही क्यों?

यदि सूर्य 21 जून को कर्क रेखा के ठीक ऊपर होता है, तो फिर नौतपा मई के अंत में ही क्यों आता है? आधुनिक वायुमंडलीय भौतिकी के अनुसार मई का अंत उत्तर भारत के वायुमंडल का सबसे सूखा दौर होता है, जब हवा में नमी लगभग शून्य होती है। सूखी हवा नम हवा के मुकाबले तेजी से गर्म होकर ऊपर उठती हैं और सबसे प्रभावी निम्न-दाब बनाती हैं। इसके विपरीत, 21 जून तक आते-आते 'मानसून पूर्व होने वाली छिटपुट बारिश के कारण हवा में उमस और नमी बढ़ा देती हैं। नम हवा भारी होने के कारण आसानी से ऊपर नहीं उठती, जिससे तापमान ऊंचा दिखने के बावजूद वह 'तापीय खिंचाव' पैदा नहीं हो पाता जो मई के अंत में मिलता है।

इसके साथ ही मानसून के लिए जरुरी महाद्वीपीय सक्शन (हवा के दबाब में अंतर) के लिए तिब्बत के ऊंचे पठार का तपना भी इसी समय शुरू होता है। मई के तीसरे हफ्ते तक यह बर्फ पिघलती है और ठीक मई के अंत यानी नौतपा के दिनों में ही वहां की बैरन काली चट्टानें तपने लगती हैं, जिससे मानसून के लिए जरुरी तिब्बत का यह 'तापीय इंजन' पहली बार पूरी ताकत से स्टार्ट होता है। ठीक इसी समय मध्य मई तक उत्तर भारत के ऊपरी आसमान में (करीब 12 किलोमीटर की ऊंचाई पर) पश्चिम से पूर्व की ओर जेट विमानों की रफ्तार से चलने वाली बहुत तेज हवाओं की एक नदी बहती है, 'सबट्रॉपिकल जेट स्ट्रीम'। 'सबट्रॉपिकल जेट स्ट्रीम' एक आसमानी ढक्कन का काम करती है।  नीचे मैदानों में सूरज की गर्मी से हवा गर्म तो हो रही होती है, लेकिन ऊपर बहने वाली यह तेज हवा 'सबट्रॉपिकल जेट स्ट्रीम' नीचे से आ रही गर्म हवा को ऊपर उठने नहीं देती और एक अदृश्य, भारी ढक्कन की तरह उसे नीचे ही दबाकर रखती है। 

इसी सटीक समय (नौतपा के दौरान) पर आसमान के 'ढक्कन' खुलने की प्रक्रिया भी पूरी होती है। मौसम विज्ञान के पिछले  शोध बताते  हैं  कि मई का अंतिम सप्ताह ही वह समय होता है जब यह जेट स्ट्रीम अचानक हिमालय को पार करके उत्तर यानी चीन की तरफ खिसक जाती है और नौतपा की गर्मी से बनी निम्न-दाब वाली हवा विस्फोटक तरीके से ऊपर उठती है।

व्यवहारिकता का विज्ञान

नौतपा का संबंध केवल मानसून की समझ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि खेती-किसानी से भी जुड़ा हुआ है। नौतपा में किसान अपने खेतों को खाली छोड़ने और उनकी गहरी जुताई का भी रिवाज है। आधुनिक कृषि-विज्ञान के अनुसार यह पारंपरिक अभ्यास 'थर्मल सॉइल सोलराइजेशन' यानी  सौर ऊर्जा से मिट्टी का उपचार है। खेतों की गहरी जुताई से मिट्टी की निचली परतें नौतपा के तेज धूप और पराबैंगनी किरणें के संपर्क और पचास डिग्री उच्च तापमान में रहती है। इस तपन से  मिट्टी के भीतर छिपे हानिकारक कवक, बैक्टीरिया, नेमाटोड (कृमि) और फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों के अंडे प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हम किसी घाव या सुई को साफ करने के लिए उसे गर्म पानी में उबालते हैं। पूर्वजों की यह तरकीब बिना किसी महंगे और जहरीले रासायनिक कीटनाशक के पूरी जमीन को हानिकारक बैक्टीरिया से मुक्त कर आने वाली खरीफ फसल के लिए तैयार कर देती है।

कीटों को मारने के साथ-साथ, नौतपा की यह तपन खेतों में अनचाहे उगने वाले खरपतवार के बीजों को भी नष्ट कर देती है। इसके अलावा, गहरी जुताई के कारण मिट्टी के कण बिखर जाते हैं, जिससे मिट्टी की हवा सोखने की क्षमता बढ़ जाती है। जब नौतपा के बाद पहली मानसूनी बारिश होती है, तो यह सूखी और भुरभुरी मिट्टी पानी को बहुत तेजी से और गहराई तक सोखती है। इससे न केवल भू-जल का स्तर सुधरता है, बल्कि मिट्टी में मौजूद अच्छे मित्र-बैक्टीरिया को ऑक्सीजन मिलती है, जो आने वाली फसल के लिए नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्वों को आसानी से सुलभ बना देते हैं।

यहाँ एक महत्वपूर्ण और बारीक पहलु को भी समझना भी जरूरी है। लोक-परंपराओं में माना जाता है कि इन नौ दिनों के तापमान को देखकर पूरे तीन महीने के मानसून का सटीक गणित लगाया जा सकता है। आधुनिक मौसम विज्ञान यहाँ एक व्यवहारिक संतुलन बिंदु रखता है। नौतपा के दौरान बनने वाला स्थानीय निम्न-दाब मानसून को भारत की तरफ खींचने के लिए एक जरूरी आवश्यकता तो है, लेकिन यह एकमात्र कारण नहीं है। आज का विज्ञान हमें बताता है कि पूरे उपमहाद्वीप की बारिश वैश्विक कारकों जैसे एल् नीनो, ला नीना और हिंद महासागर द्विध्रुव पर भी निर्भर करती है। इसलिए, नौतपा स्थानीय स्तर पर खेत और पर्यावरण को तैयार करने का एक अचूक विज्ञान है, भले ही यह वैश्विक जलवायु के लिए सटीक पूर्वानुमान न भी हो।

नौतपा के बहाने जरुरी विमर्श 

नौतपा समेत अनेक स्थानीय पारपरिक समझ को लेकर आज भारतीय बौद्धिक जगत में जो बहस छिड़ी है, वह केवल मौसम विज्ञान का विषय नहीं दो अलग-अलग विचारधाराओं का टकराव भी है। एक तरफ भारत का तथाकथित प्रगतिशील 'एलीट' वर्ग है, अपनी परंपराओं को हीन भावना से देखता है वही पश्चिम से आने वाली हर बात को विज्ञान मानता है। दूसरी तरफ वह पुरातनपंथी वर्ग है, जो बिना किसी तार्किक आधार के हर प्राचीन ढर्रे को श्रेष्ठ साबित करने में जुटा रहता है। 

भारत के अकादमिक तंत्र में एक औपनिवेशिक हैंगओवर कुछ हद तक अब भी दिखाई देता है। किसी भी अवधारणा के साथ अगर परम्परा, पंचांग, नक्षत्र या संस्कृत का कोई शब्द जुड़ जाए, तो यह तबका बिना किसी जांच-परख के उसे तुरंत 'अंधविश्वास' या 'छद्म-विज्ञान' बता देता हैं। यही तो  'एपिस्टेमिक इनजस्टिस' (ज्ञानमीमांसीय अन्याय) है। यह सोच भूल जाती है कि ‘आधुनिक’ और ‘प्रयोगशाला’ वाली विज्ञान के आने से हजारों साल पहले भारतीय प्रकृति, हवा, मिट्टी और आसमान के चक्रों की गहरी समझ के आधार पर सभ्यता गढ़ रहे थे। नौतपा को सिरे से खारिज करना हमारे पूर्वजों के पीढ़ियों से संचित उस व्यवहारिक अनुभव का अपमान है, जो आज मौसम विज्ञान के सिद्धांतों पर सटीक बैठता है।

इसके विपरीत, दूसरा अतिवादी समूह विज्ञान की बुनियादी कार्यप्रणाली (जो भारतीय भी) अवलोकन, परिकल्पना, परीक्षण और प्रमाण का पालन किए बिना ही यह दावा करने लगता है कि प्राचीन ऋषियों को आधुनिक सैटेलाइट और कंप्यूटर मॉडल वाले मौसम विज्ञान के सारे गणितीय सूत्र पहले से पता थे। वे पौराणिक कथाओं के रूपकों को समझे बिना अक्षरशः सत्य मानकर थोपने की कोशिश करते हैं। यह रवैया पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को मजबूत करने के बजाय उसे और कमजोर कर देता है, क्योंकि जब आप किसी अनुभवजन्य सत्य को अंधभक्ति और हठधर्मिता का रूप दे देते हैं, तो आधुनिक पीढ़ी तार्किकता के अभाव में उससे दूर भागने लगती है। और यही नौतपा की अवधारणा के साथ हो भी रहा है। 

नौतपा: लोक मौसम विज्ञान

भारतीय लोक परम्परा में छिपे हुए सूत्रों को आधुनिक कसौटियों पर परखे बिना न तो पूरी तरह स्वीकार किया जा सकता है और न ही खारिज। नौतपा जैसी संकल्पनाए इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि भारत का पारंपरिक ज्ञान कोई कपोल-कल्पित कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव और अनगिनत पीढ़ियों के सामूहिक अवलोकनों से इकट्ठा किया गया एक व्यवहारिक विज्ञान है। इसे 'छद्म-विज्ञान' कहना पूरी तरह गलत है। सूर्य और पृथ्वी की खास खगोलीय स्थिति, लंबवत किरणों का सीधा आना, मैदानी इलाकों में हवा का गर्म होकर ऊपर उठना और उसके कारण बनने वाला 'तापीय निम्न-दाब' ये सभी आधुनिक मौसम विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुकूल हैं। लोक-जीवन का यह विश्वास कि            

“नवतपा में जो बरसे पानी, तो जानो बरखा सब खानी” 

"जेठ मास जो तपे निरासा, तब जानों बरखा की आसा।

वास्तव में गूढ़ वायुमंडलीय थर्मोडायनामिक्स का ही एक सरल, सहज और लोक-सुलभ रूप है, जिसे आम लोग हजारो सालो से समझते आये हैं। यह आज के आधुनिक विज्ञान की एक बेहद महत्वपूर्ण शाखा 'एथ्नो-मीटियोरोलॉजी' ‘या लोक मौसम विज्ञान’ का प्रभावी उदाहरण हो सकता है। 

विज्ञान किसी एक देश, भाषा या संस्कृति से निर्धारित नहीं होती है, हालांकि  पिछले कुछ सौ सालो से इसे यूरोप के नजरिये से ही साधा जा रहा है। पश्चिम ने जहाँ हाल के कुछ सौ सालों में प्रयोग करके सिद्धांतों को गढ़ा, वहीं भारत में बौद्धिक परम्परा के सहयोग से पारंपरिक समाज ने खुली धरती और आसमान को अपनी प्रयोगशाला बनाकर पीढ़ियों के अनुभव से ज्ञान को संचित किया। नौतपा जैसे व्यवहारिक ज्ञान 'लोक मौसम विज्ञान' का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सही मायने में प्रगतिशील समाज वही है जो अपनी जड़ों के अनुभवजन्य सच को आधुनिक विज्ञान की रोशनी में आगे बढ़ाए।