दक्षिणी-पश्चिमी मानसून अपनी विदाई के चरण में है लेकिन इस बार मानसून किसानों की वक्त जरूरत का साथी नहीं बन सका। कई मानसून और कम सिंचाई प्रबंध वाले कृषि प्रधान राज्यों में इस साल किसानों को अप्रत्याशित तौर पर एक लंबे सूखे का सामना करना पड़ रहा है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अपने फसल निगरानी आंकड़े बताते हैं कि खासतौर से राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु समेत कई राज्यों के हिस्सों में बारिश और फसल संबंधी तनाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
यह तस्वीर महलनोबिस राष्ट्रीय फसल पूर्वानुमान केंद्र (एनसीएफसी) ने 21 सितंबर 2026 की "क्रॉप वेदर वॉच" बैठक के लिए तैयार ब्रीफिंग में सामने आई है। इसमें बारिश, सूखे के दौर, मिट्टी की नमी, वनस्पति सूचकांक और उपग्रह रडार के आंकड़ों के जरिए मौजूदा स्थिति का आकलन किया गया है। एनसीएफसी ने अपने विश्लेषण में आईएमडी के जिला स्तर और 25 किलोमीटर ग्रिड आधारित बारिश के आंकड़ों का इस्तेमाल किया है।
दो-तीन हफ्ते के सूखे दौर
एनसीएफसी की ब्रीफिंग के मुताबिक 1 जून से 19 सितंबर 2026 के दौरान देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रही। दस्तावेज में 1 जुलाई से 19 सितंबर के दौरान राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब और हरियाणा में दो से तीन सप्ताह तक चलने वाले सूखे दौर दर्ज किए गए हैं। यहां सूखे दिन की पहचान 25 किलोमीटर ग्रिड में 2.5 मिलीमीटर से कम दैनिक बारिश के आधार पर की गई है।
सितंबर के केवल पहले 19 दिनों में भी राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में करीब दो सप्ताह के सूखे दौर दर्ज किए गए। यानी मानसून के अंतिम चरण में भी कई कृषि क्षेत्रों को लगातार बारिश की कमी का सामना करना पड़ा।
मिट्टी में नमी 10 साल के औसत से कम
बारिश की कमी का एक और संकेत मिट्टी की नमी में दिखाई देता है। एनसीएफसी ने एसएमएपी उपग्रह के रूट जोन सॉइल मॉइश्चर यानी आरजेडएसएम एनोमली का इस्तेमाल किया है। 17 सितंबर 2026 की स्थिति की तुलना 2016 से 2025 के दस साल के औसत से की गई।
आंकड़ों में छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पूर्वी मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और नागालैंड के कुछ हिस्सों में मिट्टी की नमी औसत के बराबर या उससे अधिक है। इसके विपरीत कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और उत्तरी बिहार में मिट्टी की नमी दस साल के औसत से नीचे है।
जलाशयों की स्थिति भी कुछ क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता पर दबाव की ओर इशारा करती है। केंद्रीय जल आयोग की साप्ताहिक रिपोर्ट के आधार पर 17 सितंबर तक 178 प्रमुख जलाशयों के भंडारण का आकलन किया गया है। एनसीएफसी के विश्लेषण में पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कई जलाशयों में भंडारण की कमी दर्ज की गई है।
वनस्पति में कमजोरी
फसल और वनस्पति की स्थिति समझने के लिए एनसीएफसी ने वीआईआईआरएस उपग्रह के 500 मीटर रिजॉल्यूशन वाले आंकड़ों से तैयार नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स (एनडीवीआई) और लैंड सरफेस वाटर इंडेक्स (एलएसडब्ल्यूआई) का इस्तेमाल किया है। 29 अगस्त से 13 सितंबर 2026 के बीच राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में एनडीवीआई पिछले साल की समान अवधि और 2021-25 के औसत से नीचे रहा। यानी वनस्पति उतनी घनी और सक्रिय नहीं है। एनडीवीआई उपग्रह के आंकड़ों से किसी इलाके में हरी और सक्रिय वनस्पति की मात्रा का संकेत मिलता है। इसका मान जितना अधिक होता है आम तौर पर वनस्पति उतनी अधिक घनी और सक्रिय मानी जाती है।
एलएसडब्ल्यूआई में भी राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के हिस्सों में पिछले साल और पांच साल के औसत की तुलना में कमजोरी दर्ज हुई। महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ हिस्से भी पांच साल के औसत की तुलना में कमजोर रहे।
जिला और तालुका स्तर के नक्शों में राजस्थान के जैसलमेर, बीकानेर और बाड़मेर तथा गुजरात के कच्छ में एनडीवीआई में -30 प्रतिशत से अधिक की कमी वाले क्षेत्र दिखाई देते हैं।
हालांकि एनसीएफसी ने इन उपग्रह आंकड़ों की व्याख्या में सावधानी भी बरती है। मध्य प्रदेश में एनडीवीआई की कुछ विसंगतियों को मुख्य रूप से बादलों के कारण उपग्रह आंकड़ों में आई समस्या से जोड़ा गया है। इसी तरह ओडिशा के बालासोर और भद्रक में एनडीवीआई में कमी को सूखे के बजाए बाढ़ से जोड़ा गया है।
रडार में भी बदलाव
सेंटिनल-1 के सिंथेटिक अपर्चर रडार (एसएआर) बैकस्कैटर आंकड़ों में भी कुछ इलाकों में पिछले साल की तुलना में कमी दिखाई गई है। 10 से 31 अगस्त 2026 की तुलना 2025 की इसी अवधि से करने पर गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में बैकस्कैटर कम रहा। एनसीएफसी के अनुसार बैकस्कैटर में कमी सतह के अधिक सूखेपन, देर से बुवाई या कम फसल वृद्धि का संकेत हो सकती है। इसलिए इसे अकेले सूखे का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मौसमी एनडीवीआई प्रगति के विश्लेषण में राजस्थान में इस साल फसल वृद्धि की रफ्तार पिछले साल की तुलना में धीमी दिखाई गई है। गुजरात और आंध्र प्रदेश में पिछले दो वर्षों की तुलना में एनडीवीआई प्रगति में देरी दर्ज की गई है।
धान की रोपाई प्रभावित, दूसरी फसलों को तरजीह
उपग्रह रडार के जरिए धान की रोपाई के क्षेत्र और समय की भी तुलना की गई है। मध्य प्रदेश के श्योपुर, दतिया, भिंड और रीवा में पिछले साल की तुलना में धान का क्षेत्र कम दिखाई देता है।
उत्तर प्रदेश के झांसी, जालौन और हमीरपुर में दस्तावेज फसल पैटर्न में बदलाव का संकेत देता है, जिसमें संभवतः धान से किसी दूसरी फसल की ओर बदलाव शामिल है। पश्चिम बंगाल में अगस्त के दूसरे पखवाड़े तक धान की रोपाई का कुल कवरेज और पैटर्न पिछले साल के लगभग समान रहा। हालांकि बांकुड़ा, पूर्ब बर्धमान, बीरभूम और मुर्शिदाबाद में रोपाई में देरी दर्ज हुई।
झारखंड में धान की रोपाई पिछले साल की तुलना में पीछे है। गिरिडीह, देवघर, पलामू, चतरा और गढ़वा जैसे उत्तरी जिलों में क्षेत्र पिछले साल से कम है, हालांकि 2023 की तुलना में स्थिति बेहतर बताई गई है।
बिहार में भी धान की रोपाई में देरी दर्ज हुई। गया, औरंगाबाद, जमुई और नवादा जैसे दक्षिणी जिलों में धान का क्षेत्र पिछले साल की तुलना में थोड़ा कम है, जबकि उत्तरी बिहार में स्थिति पिछले साल जैसी या उससे बेहतर है।
एक जैसी नहीं है तस्वीर
एनसीएफसी के आंकड़े बताते हैं कि कमजोर मानसून का असर पूरे देश में एक जैसा नहीं है। पश्चिमी भारत में राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के हिस्से, दक्षिणी या प्रायद्वीपीय भारत में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु के हिस्से तथा कुछ अन्य क्षेत्र कई संकेतकों में कमजोरी दिखाते हैं। दूसरी ओर पूर्वी और उत्तर भारत के कई हिस्सों में मिट्टी की नमी अपेक्षाकृत बेहतर है और कुछ राज्यों में धान की रोपाई पिछले साल के करीब या उससे बेहतर स्थिति में है।
जहां खेती सिंचाई और की सबसे कम सुविधा और सीधा मानसून पर निर्भर राज्य जैसे राजस्थान, गुजरात और दक्षिण भारत के भीतरी जिलों के बड़े में सिंचित रकबा 25 फीसदी से कम भी कम है जबकि पूर्वी, उत्तरी और मध्य भारत के बेहतर सिंचित राज्य इसी कमजोर मानसून को कहीं बेहतर तरीके से झेल पाएं हैं।