जलवायु

गुम हुई सर्दी: जनवरी-फरवरी में बढ़ते तापमान से पहाड़ी किसानों की आजीविका पर संकट

“वैसे तो हमारे खेतों से हर साल 50 किलो तक गेहूं हो जाता था, लेकिन इस साल मुश्किल है कि 5-10 किलो भी गेहूं निकले।” रीना देवी निराश हैं, “वो गेहूं भी हमें बीज के लिए रखना होगा और इस साल आटा खरीद कर ही रोटियां बनेंगी”

Varsha Singh

चमोली जिले के दशोली ब्लॉक के नौरख गांव की 22 वर्षीय रीना देवी बैंडमिंटन कोर्ट क्षेत्र जितने 5 छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेतों में खेती करती हैं। दो खेत में वे हर साल गेहूं बोती हैं। घर के नज़दीक के दो खेतों में सब्जियां और एक खेत धान की खेती के लिए छोड़ देती हैं।

वह बताती हैं, “नवंबर-दिसंबर में हम बारिश का इंतज़ार करते रह गए। थक-हार कर दिसंबर में गेहूं बो दिया। जनवरी में गर्मी बहुत ज्यादा थी और बारिश आखिरी हफ़्ते में आई। तब तक ज्यादातर फसल सूख गई। खेत में कुछ-कुछ जगह ही गेहूं की पौध निकली। घर के नज़दीक के खेत में बोई सब्जियों में पीने के पानी से कुछ सिंचाई की। लेकिन गेहूं के लिए बारिश ही सिंचाई का साधन है।” 

फरवरी की हलकी बारिश ने खेतों को कुछ राहत तो पहुंचाई लेकिन ज्यादातर दिन धूप वाले थे। रीना बताती हैं, “मैंने प्याज लगाया था, वो भी कम हुआ है। फिर दोबारा गोभी बोई।” वह उम्मीद कर रही हैं कि मार्च में कुछ बारिश मिले तो कम से घर के इस्तेमाल के लिए सब्जियां तैयार हो जाएं।

रीना देवी के पति दिलवर लाल मजदूरी करते हैं। उनके मुताबिक पति को महीने में 10-15 दिन काम मिलता है। अपने घर और दो गायों के लिए सर्दियों में वह जंगल से लकड़ियां और चारा इकट्ठा करती हैं, “मैंने सर्दियों में जंगल से इकट्ठा कुछ सूखी लकड़ियां गांव के लोगों को बेचकर थोड़े पैसे जुटाए। नजदीक ही पौधों की नर्सरी है। वहां जब काम मिलता है तो कुछ पैसे बन जाते हैं। खेतों से ही घर के लिए सब्जियों और अनाज का इंतज़ाम होता है।”

इस साल सर्दियों का बढ़ा हुआ तापमान रीना जैसे पहाड़ के छोटे-छोटे काश्तकारों के लिए आर्थिक चिंता लेकर आया। किसानों की ये चिंता राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में चल रहे बजट सत्र में भी सुनाई दी।

13 मार्च को विधायक प्रीतम सिंह पंवार ने बजट सत्र के दौरान राज्य के कृषि मंत्री गणेश जोशी से सवाल पूछा कि मौसम परिवर्तन के कारण अक्टूबर से अब तक (मार्च तक) प्रदेश में बारिश न होने से गेहूं, जौ, मटर जैसी फ़सलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं। इसके चलते किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। क्या सरकार प्रभावित किसानों के फ़सलों की क्षतिपूर्ति का भुगतान करेगी।

कृषि मंत्री ने इसका जवाब दिया कि नवंबर में बेहद कम और दिसंबर में कोई बारिश नहीं हुई। जनवरी में सामान्य से तीन प्रतिशत अधिक बारिश हुई। आखिरी हफ्ते में हुई इस बारिश के कारण फसलों के संभावित नुकसान में कमी आई है। जिन किसानों की फ़सल का 33 प्रतिशत से अधिक नुकसान हुआ है, उनकी क्षतिपूर्ति की जाएगी।

रीना कहती हैं, उनके खेत इतने छोटे हैं कि वे बीमा कराने के बारे में नहीं सोचते। उनकी जानकारी में गांव के ज्यादातर किसानों ने बीमा नहीं कराया है।

इसी सत्र में एक अन्य सवाल पूछा गया कि नैनीताल जिले के भीमताल में किसानों ने 5,500 रुपए में आलू की फ़सल का बीमा कराया था। जिसकी एवज में किसानों को मात्र 1,144 रुपए की धनराशि प्रदान की गई और ज्यादातर किसानों को ये रकम नहीं मिली। इस पर मंत्री की ओर से एक जांच समिति गठित करने की जानकारी दी गई।

पहाड़ों में बढ़ती गर्मी काश्तकारों की खेती, उपज, आमदनी के साथ-साथ सेहत को भी प्रभावित कर रही हैं। पांच साल की बेटी और डेढ़ साल के बेटे की मां रीना कहती हैं, “गर्मी बहुत होती है तो काम करने का मन नहीं करता। हमें खेतों में काम करना होता है। जंगल से भी रोजाना चारा-लकड़ी लाने जाना होता है। हम तय करते हैं कि खेत और जंगल का कोई एक काम सुबह जितना जल्दी  निपटा सकें और 12 बजे से पहले घर में आ जाए। फिर शाम 4 बजे के बाद खेतों में जाते हैं। लेकिन जब बहुत जरूरी होता है तो धूप में भी काम करना पड़ता है। हालांकि तेज़ धूप में शरीर से उतना काम हो नहीं पाता।”

वह बताती हैं कि जब मौसम सुहाना होता है तो खेत के ज्यादा से ज्यादा काम निपटाने की कोशिश होती है।

उल्लेखनीय तौर पर अधिक गर्म रहीं सर्दियां

मौसम विज्ञानी भी मानते हैं कि इस साल की सर्दियां सामान्य से उल्लेखनीय रूप से अधिक (appreciably above normal) गर्म रहीं। देहरादून मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ चंदर सिंह तोमर कहते हैं, “हमने पहले ही पूर्वानुमान जारी किया था कि अक्टूबर से फ़रवरी तक राज्य में तापमान सामान्य से अधिक रहेगा। लेकिन मैदानी जिलों की तुलना में पर्वतीय जिलों का तापमान सामान्य से उल्लेखनीय रूप से अधिक रहा। जनवरी-फरवरी में ऊंचाई वाले जिलों में औसत तापमान सामान्य से 4-5 डिग्री तक अधिक अधिक दर्ज किया गया लेकिन मैदानी जिलों में ये 2-3 डिग्री अधिक रहा।”

मौसम विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार इस साल जनवरी में घाटी में बसे देहरादून का औसत अधिकतम तापमान (22.3 डिग्री) में सामान्य से तीन डिग्री तक का अधिक रहा जबकि औसत न्यूनतम तापमान (7.2 डिग्री)  0.6 डिग्री अधिक रहा। वहीं इस अवधि में नैनीताल जिले के पर्वतीय क्षेत्र मुक्तेश्वर का औसत अधिकतम तापमान तकरीबन 3 डिग्री अधिक रहा। जबकि औसत न्यूनतम तापमान 0.7 डिग्री अधिक रहा।

फरवरी महीने में देहरादून का औसत अधिकतम तापमान में सामान्य से 4 डिग्री और औसत न्यूनतम तापमान तकरीबन दो डिग्री उपर रहा। मुक्तेश्वर में औसत अधिकतम तापमान सामान्य से तीन डिग्री अधिक और औसत न्यूनतम तापमान 2.6 डिग्री अधिक रहा।

तापमान के लिहाज से सामान्य से एक से तीन डिग्री तक का उतार-चढ़ाव, सामान्य से अधिक या गर्म के तौर पर परिभाषित किया जाता है। लेकिन 3 से 5 डिग्री का फर्क उल्लेखनीय तौर पर उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। 5 डिग्री या उससे अधिक उतार-चढ़ाव सामान्य से बहुत अधिक माना जाता है।

आईएमडी की वेबसाइट पर उपलब्ध लाइव डेटा के मुताबिक देहरादून में एक से 14 मार्च तक सभी दिनों का अधिकतम तापमान सामान्य से 4 से 8 डिग्री तक अधिक रहा। जबकि न्यूनतम तापमान 3 से 9 डिग्री तक अधिक दर्ज रहा।

वहीं पर्वतीय क्षेत्र मुक्तेश्वर में 8 मार्च को सामान्य से 12 डिग्री तक अधिक 28.2 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हुआ, जो यहां अब तक के तीसरे सबसे गर्म दिन के तौर पर रिकॉर्ड हुआ।  वहीं एक से 14 मार्च तक सभी दिनों का अधिकतम तापमान 5 से 12 डिग्री तक अधिक रहा। वहीं न्यूनतम तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री तक उपर रहा।

डॉ तोमर बताते हैं, “इस साल सर्दियों में तापमान उल्लेखनीय तौर पर अधिक रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि बढ़ते तापमान का रिकार्ड टूटा हो। मुक्तेश्वर में भी ऐतिहासिक तौर पर बीतें वर्षों में दो  बार इससे अधिक गर्मी दर्ज की जा चुकी है। क्लाइमेट स्केल पर हमें तापमान में ऐसे उतार-चढ़ाव पहले भी देखने को मिले हैं।”

राज्य के ज्यादातर पर्वतीय हिस्सों में मौसमी बदलाव को समझने के लिए मैनुअली डेटा इकट्ठा करने की व्यवस्था नहीं है। यहां के तापमान के सामान्य औसत आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि पिछले वर्षों में ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन स्थापित किये गये। आईएमडी वेबसाइट पर लाइव डेटा के मुताबिक 8 से 14 मार्च तक चमोली में अधिकतम तापमान  30 डिग्री से अधिक और न्यूनतम 15 डिग्री के आसपास रहा। मैदानी जिले देहरादून से इसकी तुलना करें तो ज्यादातर दिनों में देहरादून का तापमान चमोली से मात्र एक या दो डिग्री ही अधिक रहा। 

अल्मोड़ा स्थित जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉ. आईडी भट्ट का कहना है कि पहाड़ी ज़िलों में बढ़ते तापमान के पीछे सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन ही एकमात्र कारण नहीं है। इसमें स्थानीय कारक भी अहम भूमिका निभा रहे हैं, “विकास कार्यों के लिए पेड़ों की कटाई, वाहनों की बढ़ती संख्या और उनसे निकलने वाला धुआँ, तापमान में बढ़ोतरी कर रहे हैं।” वह उदाहरण देते हैं, “पहले अल्मोड़ा में लोगों को सीलिंग फ़ैन की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी, लेकिन अब एयर कंडीशनर का इस्तेमाल किया जा रहा है।”

“पर्वतीय क्षेत्रों में मौसमी बदलावों को समझने के लिए हमें अध्ययन और शोध की ज़रूरत है। मौसम संबंधी ऐतिहासिक डेटा सीमित है,” वह जोड़ते हैं।

सर्दियों में जलते जंगल

पहाड़ों पर बढ़ते तापमान का असर वनों पर भी देखने को मिला। उत्तराखंड वन विभाग के मुताबिक 1 नवंबर 2025 से 14 फरवरी 2026 के बीच वनों में आग लगने की 54 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें तकरीबन 42 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। यह क्षेत्र लगभग 60 फुटबॉल मैदानों के बराबर है। वहीं 15 फ़रवरी से 14 मार्च के बीच तापमान बढ़ने के साथ वनाग्नि की 60 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें तकरीबन इतना ही वन क्षेत्र प्रभावित हुआ।

नौरख गांव के आसपास के जंगलों से भी सर्दियों में धुएं की चादर पसर गई। बच्चे को संभालती रीना बताती हैं कि “जनवरी में हमारे गांव के पास के जंगलों में कई दिन आग लगी रही। इस समय भी गांव से कुछ दूरी के जंगल जल रहे हैं। चारों तरफ फैली धुंध से आंखों में जलन हो रही है।”

धूप और बारिश हिमालयी गांवों में पानी की स्थिति भी तय करते हैं। गर्मियों में खेत और जंगल के साथ रीना को पीने का पानी भरने के लिए नज़दीकी गदेरे तक जाना पड़ेगा, “गर्मियां शुरू होने के साथ ही घर में लगे नलों का पानी धीरे-धीरे कम होने लगता है। फिर हमें पानी का बंदोबस्त करने के लिए सुबह-शाम गदेरे जाना पड़ेगा।”