फाइल फोटो: विकास चौधरी 
जलवायु

भारत में ऋतु-चक्र का संकट: हर दिन चरम मौसम घटनाओं से बदलता जलवायु का चेहरा

सीएसई व डाउन टू अर्थ ने 1,500 दिनों में घटित भारत की मौसम-संबंधी आपदाओं का एक नया नक्शा (एटलस) तैयार किया

Richard Mahapatra

ऋतु-चक्र मानव समाज के लिए वह दिशा-सूचक यंत्र है, जो हमें जीवित रहने और आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है, लेकिन क्या होगा यदि ऋतुएं अपनी विशिष्ट पहचान खो दे और उनका निर्धारित समय बिगड़ जाए? यह अब कोई सैद्धांतिक प्रश्न नहीं रहा। पृथ्वी का मौसम अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का स्तर मानव इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया।

इस बदलाव का सबसे प्रारंभिक संकेत है ऋतुओं का लगभग विलय, ऋतुएं आपस में घुल-मिल रही हैं और अपनी पहचान खोती जा रही हैं। मौसम का यह बदलता हुआ रूप हमें हर तरफ गंभीर और बिल्कुल बे-मौसम मौसम की घटनाओं के रूप में दिख रहा है, जो जगह और समय दोनों के हिसाब से असामान्य हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट और डाउन टू अर्थ की टीम भारत में होने वाली चरम मौसम घटनाओं पर साल 2022 से नजर रख रहे हैं, ताकि समझ सकें कि मौसम में यह बड़ा बदलाव कैसे हो रहा है। इस साल 30 सितंबर तक टीम ने हर दिन भारत मौसम विज्ञान विभाग, गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन प्रभाग, राज्यों की एजेंसियों और देशभर के अखबारों की रिपोर्टें ध्यान से देखी और लगभग 1,500 दिनों (अक्टूबर–दिसंबर 2025 को छोड़कर) की भारत की मौसम-संबंधी आपदाओं का एक नया नक्शा (एटलस) तैयार किया। यह दिखाता है कि अब मौसम और जलवायु का स्वरूप पारंपरिक ऋतु-चक्र और मौसम की भूगोल-आधारित पहचान से अलग हो गया है।

आम हो गई आपदाएं

भारत में 1,227 दिनों तक हर दिन कम से कम एक चरम मौसम घटना दर्ज हुई, इसमें कड़ाके की ठंड, लू, बादल फटना, भारी बारिश, आंधी-तूफान या बाढ़ शामिल थे। जो घटनाएं पहले कई दशकों में एक बार होती थीं, वे अब आम हो गई हैं और अनपेक्षित जगहों पर हो रही हैं। जैसे- चेन्नई में बादल फटना, राजस्थान और लेह के रेगिस्तानी इलाकों में बाढ़, और पहाड़ी शहरों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी।

ऋतुओं का चक्र टूट रहा है। जनवरी और फरवरी में लू चली, वहीं मॉनसून जैसी बारिश नवंबर तक खिंच गई। इससे फसलों के चक्र बिगड़ रहे हैं, जिसका असर बड़े पैमाने पर कृषि घाटे के रूप में दिख रहा है। सर्दियों में न्यूनतम तापमान अब शुरुआती गर्मी जैसा महसूस होने लगा है। हिमालयी राज्यों में सालभर तापमान सामान्य से ज्यादा दर्ज हो रहा है।

सीएसई व डाउन टू अर्थ के सालाना प्रकाशन क्लाइमेट इंडिया रिपोर्ट के आकलन के अनुसार जनवरी से सितंबर 2025 के बीच भारत में लगभग हर दिन कोई न कोई चरम मौसम घटना हुई। यह चार वर्षों में पहली बार है जब ऐसी घटनाएं लगभग पूरे साल दर्ज हुईं। यह भी पहली बार हुआ है कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में चरम मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं।

2023 में केवल छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसी घटनाएं दर्ज की गई थीं, लेकिन 2025 में फरवरी से सितंबर तक लगातार आठ महीनों तक, 30 या उससे अधिक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश चरम मौसम घटनाओं की चपेट में रहे।

ऋतुओं की पहचान धुंधली होती साफ दिख रही है। 2025 में सर्दियों (जनवरी–फरवरी) के 59 दिनों में से 57 दिनों पर भारत में कोई न कोई चरम मौसम घटना हुई। इनमें 3 बार लू चली, 51 दिनों तक भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन हुए और 26 दिनों तक ठंडी लहर चली। मार्च से मई के मानसून पूर्व महीनों में 86 दिनों तक भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन हुए, जबकि पिछले वर्षों में इस समय ओलावृष्टि ज्यादा होती थी। मानसून का मौसम अब लोगों और फसलों के लिए और भी खतरनाक होता जा रहा है और हैरानी की बात यह है कि इसी दौरान हीटवेव (लू) जैसी घटनाएं भी बढ़ रही हैं।

ये बदलाव कई तरीकों से दिखाई दे रहे हैं। किसान अब अपनी बुवाई का समय बदल रहे हैं और अक्सर जून में खरीफ फसलें बोना छोड़ देते हैं। कई राज्यों में स्कूल और कॉलेज अब मार्च के आखिरी हफ्ते से ही गर्मियों की छुट्टियां देने लगे हैं। मानसून बाद के महीनों, जैसे अक्टूबर में, भारी बारिश के कारण कई राज्यों में स्कूल-कॉलेज बंद करने पड़े हैं। बहुत-से पेड़ों में फूल आने और फल लगने का समय भी बदल गया है।

यह साबित हो चुका है कि अफ्रीका से इंसानों का बाहर निकलकर दुनिया में फैलना भी जलवायु बदलाव के कारण हुआ था। पिछले 12,000 सालों में मानव सभ्यता स्थिर मौसम और जलवायु में खूब फलती-फूलती रही। लेकिन अब जो बदलाव हो रहे हैं, वे पहले जैसे नहीं हैं और ये हमारे अस्तित्व तक को चुनौती दे रहे हैं।