फाइल फोटो: अंकुर पालीवाल 
जलवायु

भारत के खेतिहर मजदूरों ने रिकॉर्ड गर्मी के कारण गंवाए 54 दिनों के बराबर काम के घंटे: रिपोर्ट

ब्रिटेन स्थित एक अध्ययन के अनुसार, रिकॉर्ड पर दर्ज सबसे गर्म वर्ष में अत्यधिक गर्मी के कारण कृषि श्रमिकों को औसतन 648 कार्य घंटों का नुकसान हुआ। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि संभावित ‘सुपर एल नीनो’ के प्रभाव से 2026 और 2027 में तापमान और अधिक बढ़ सकता है, जिससे श्रमिकों की आजीविका, स्वास्थ्य और खाद्य उत्पादन पर खतरा और गहरा सकता है।

Shagun

  • ब्रिटेन की एक संस्था के विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत के कृषि श्रमिकों ने हीट स्ट्रेस (गर्मी के तनाव) के कारण औसतन 648 कार्य घंटे, यानी 54 पूर्ण कार्य-दिवस, गंवा दिए।

  • अध्ययन में पाया गया कि भारत के कृषि क्षेत्र में गर्मी से संबंधित कारणों से नष्ट हुए कुल कार्य घंटों में पिछले एक दशक के दौरान तेज़ वृद्धि हुई है।

  • अध्ययन में शामिल 15 जलवायु-संवेदनशील देशों में भारत, गर्मी के कारण कृषि श्रम-हानि के मामले में घाना और वियतनाम के बाद तीसरे स्थान पर रहा।

  • वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि संभावित सुपर अल नीनो 2026 और 2027 में गर्मी के जोखिम को और बढ़ा सकता है। यदि यह वैश्विक तापवृद्धि की मौजूदा प्रवृत्ति के साथ मिल जाता है, तो खुले में काम करने वाले श्रमिकों के लिए परिस्थितियां और अधिक कठिन हो सकती हैं।

  • रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ता हीट स्ट्रेस श्रमिकों की आय का संकट बढ़ा सकता है, कृषि श्रम व्यवस्था को बाधित कर सकता है और अंततः खाद्य उत्पादन तथा खाद्य सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

आधुनिक तापमान रिकॉर्ड शुरू होने के बाद 2024 दुनिया का सबसे गर्म वर्ष रहा। इस भीषण गर्मी का असर भारत के खेतिहर मजदूरों पर भी पड़ा। गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस) के कारण एक कृषि मजदूर ने औसतन 648 घंटे काम नहीं कर पाया, जो लगभग 54 दिनों की मजदूरी के बराबर है। यानी अत्यधिक गर्मी के कारण कई दिनों तक खेतों में काम करना इतना मुश्किल हो गया कि मजदूरों को काम रोकना पड़ा।

यह निष्कर्ष यूनाइटेड किंगडम स्थित गैर-लाभकारी संस्था एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलीजेंस यूनिट (ईसीआईयू) के एक विश्लेषण में सामने आया है। अध्ययन बताता है कि अत्यधिक गर्मी लगातार ऐसी स्थिति पैदा कर रही है, जिसमें खुले में काम करना शारीरिक रूप से कठिन या जोखिम भरा होता जा रहा है। इसका सबसे अधिक असर कृषि मजदूरों पर पड़ता है, जिन्हें आमतौर पर दैनिक मजदूरी या उत्पादन के आधार पर भुगतान किया जाता है।

तापमान बढ़ने के साथ मजदूरों को हीट स्ट्रोक और गर्मी से जुड़ी अन्य बीमारियों से बचने के लिए अपने काम के घंटे कम करने, अधिक समय तक विश्राम लेने या कई बार काम पूरी तरह बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। दैनिक मजदूरी पर निर्भर कृषि श्रमिकों के लिए अत्यधिक गर्मी के कारण खोया गया प्रत्येक घंटा आय में कमी के साथ-साथ स्वास्थ्य, आजीविका और परिवार की आर्थिक सुरक्षा पर बढ़ते खतरे का संकेत है।

इस आंकड़े को और अधिक चिंताजनक बनाने वाली बात यह है कि भविष्य में स्थिति और गंभीर होने की आशंका है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि एक शक्तिशाली सुपर अल नीनो विकसित होने की संभावना अब 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यदि ऐसा होता है, तो यह वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) की मौजूदा प्रवृत्ति के साथ मिलकर आने वाले महीनों में और भी अधिक चरम तापमान की आशंका को बढ़ा देगा।

विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार, वर्ष 2027 के अब तक का सबसे गर्म वर्ष बनने का अनुमान है। एल नीनो और मानव गतिविधियों से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव के कारण वैश्विक तापमान ऐसे स्तर तक पहुंच सकता है, जैसा पहले कभी दर्ज नहीं किया गया। इससे दुनिया के कई हिस्सों में भीषण गर्मी, सूखा, जंगलों में आग, अत्यधिक वर्षा और अन्य चरम मौसमीय घटनाओं के बढ़ने का खतरा है।

अध्ययन में शामिल देशों में भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में

ईसीआईयू द्वारा पिछले एक दशक से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत के कार्यबल में गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस) के कारण नष्ट हुए कुल कार्य घंटे 2024 में बढ़कर 16.33 करोड़ घंटे (163.3 मिलियन घंटे) पहुंच गए। यह 2022 की तुलना में 16.7 प्रतिशत और 2014 की तुलना में 45.4 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्शाता है।

दीर्घकालिक रुझान से संकेत मिलता है कि यह समस्या थमने के बजाय लगातार बढ़ रही है। औसतन प्रत्येक वर्ष प्रति श्रमिक करीब 4.5 अतिरिक्त कार्य घंटे हीट स्ट्रेस के कारण नष्ट हो रहे हैं।

स्थिति को और गंभीर बनाने वाला एक अन्य कारक भारत में कृषि क्षेत्र में रोजगार का बढ़ना है। कृषि क्षेत्र में रोजगार 2022 की तुलना में 8.6 प्रतिशत और 2014 की तुलना में 22.6 प्रतिशत बढ़ा है। इसका मतलब है कि पहले की अपेक्षा अधिक संख्या में श्रमिक ऐसे वातावरण में लंबे समय तक काम कर रहे हैं, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) मानव शरीर पर सीधा शारीरिक हमला मानता है। ऐसी परिस्थितियां थकावट, हीट स्ट्रोक और गंभीर मामलों में मृत्यु तक का कारण बन सकती हैं।

ऐसे समय में, जब भारत के अनेक निम्न-आय वाले परिवारों की वास्तविक मजदूरी में वृद्धि कमजोर बनी हुई है, काम के घंटों का नुकसान उनकी आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा सकता है तथा कमजोर परिवारों को गरीबी की ओर और धकेल सकता है।

इसका असर केवल व्यक्तिगत श्रमिकों तक सीमित नहीं है। कृषि श्रम में व्यवधान खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है, खासकर ऐसे देश में जहां सामान्य मौसम की अवधि तेजी से सिमटती जा रही है।

इस खतरे की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) और डाउन टू अर्थ के विश्लेषण के अनुसार, जनवरी से नवंबर 2025 के बीच 334 दिनों में से 331 दिनों में भारत के किसी न किसी हिस्से में चरम मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं। यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट बन चुका है।

ब्रिटेन के अध्ययन में भारत को क्यों शामिल किया गया?

ईसीआईयू के इस अध्ययन में भारत उन 15 देशों में शामिल था, जिनका विश्लेषण यह समझने के लिए किया गया कि जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील और खाद्य उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देशों में बढ़ता हीट स्ट्रेस ब्रिटेन की खाद्य आपूर्ति को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है।

अध्ययन में उन 15 देशों में अत्यधिक गर्मी के कारण कृषि श्रमिकों के खोए हुए कार्य घंटों का आकलन किया गया, जो ब्रिटेन के खाद्य आयात के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। इनमें भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, वियतनाम, आइवरी कोस्ट (कोट डी आइवर), पेरू, कोलंबिया, केन्या, मिस्र, इक्वाडोर, अर्जेंटीना, घाना, इंडोनेशिया, मेक्सिको और पापुआ न्यू गिनी शामिल हैं।

ये सभी देश जलवायु जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं और सामूहिक रूप से ब्रिटेन के कुल खाद्य आयात का लगभग 8.9 अरब पाउंड (13 प्रतिशत) हिस्सा उपलब्ध कराते हैं।

अध्ययन के अनुसार, कृषि श्रम पर गर्मी के प्रभाव के मामले में भारत इन 15 देशों में तीसरे स्थान पर सबसे अधिक प्रभावित देश रहा। भारत से आगे केवल घाना और वियतनाम थे, जहां कृषि श्रमिकों को गर्मी के कारण और अधिक कार्य घंटे गंवाने पड़े।

अध्ययन का व्यापक निष्कर्ष यह भी रहा कि इन 15 देशों के कृषि श्रमिकों ने वर्ष 2024 में हीट स्ट्रेस के कारण अनुमानित 216 अरब कार्य घंटे खो दिए। यह लगभग 36.6 करोड़ कृषि श्रमिकों वाले कार्यबल में प्रति श्रमिक औसतन 590 घंटे के नुकसान के बराबर है।

यह निष्कर्ष बताता है कि बढ़ती गर्मी केवल श्रमिकों के स्वास्थ्य और आय के लिए ही खतरा नहीं है, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला और खाद्य सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

यह आंकड़ा 1990 की तुलना में बेहद तेजी से बढ़ा है। उस समय एक कृषि श्रमिक को अत्यधिक गर्मी के कारण औसतन 394 कार्य घंटे गंवाने पड़ते थे, जबकि अब यह बढ़कर लगभग 590 घंटे प्रति श्रमिक हो गया है। इसका अर्थ है कि पिछले तीन दशकों में हीट स्ट्रेस के कारण कार्य घंटों का नुकसान लगातार बढ़ता गया है।

अध्ययन के अनुसार, 1990 के बाद से औसतन हर वर्ष प्रति श्रमिक लगभग चार अतिरिक्त कार्य घंटे गर्मी के कारण नष्ट हो रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के वर्षों में यह रफ्तार और तेज होती दिखाई दे रही है। अब औसतन प्रति वर्ष करीब पांच अतिरिक्त कार्य घंटे प्रति श्रमिक गंवाए जा रहे हैं।

रिपोर्ट के शब्दों में, “हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति और तेज हुई है तथा प्रति श्रमिक हर साल लगभग पांच अतिरिक्त कार्य घंटे नष्ट हो रहे हैं। यह दर्शाता है कि अत्यधिक गर्मी उन देशों में कृषि उत्पादन के लिए बढ़ता हुआ खतरा बन रही है, जिन पर ब्रिटेन अपनी खाद्य आपूर्ति के लिए निर्भर है।”

अर्थात जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। यह सीधे कृषि श्रमिकों की कार्यक्षमता, फसल उत्पादन, किसानों की आय और वैश्विक खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है। भारत जैसे देशों में, जहां बड़ी आबादी अभी भी कृषि पर निर्भर है, हीट स्ट्रेस के कारण काम के घंटों में लगातार हो रही कमी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य उत्पादन दोनों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

काम के घंटों में नुकसान का आकलन कैसे किया गया?

इस अध्ययन में गर्मी के कारण नष्ट हुए कार्य घंटों का आकलन जलवायु संबंधी आंकड़ों, जनसंख्या के भौगोलिक वितरण और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत लोगों के अनुपात के अनुमानों के आधार पर किया गया।

अध्ययन के निष्कर्ष 2025 की प्रतिष्ठित लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट में प्रकाशित शोध पर आधारित हैं। यह रिपोर्ट हर वर्ष प्रकाशित होने वाले उन सबसे व्यापक अध्ययनों में से एक है, जो यह मूल्यांकन करते हैं कि बढ़ता वैश्विक तापमान मानव स्वास्थ्य और कल्याण को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है।

इस विश्लेषण में वेट-बल्ब ग्लोब तापमान का उपयोग किया गया। यह सूचकांक केवल सामान्य तापमान मापने वाले थर्मामीटर की तुलना में मानव शरीर पर पड़ने वाले वास्तविक गर्मी के प्रभाव का अधिक सटीक आकलन करता है।

वेट-बल्ब ग्लोब तापमान में कई कारकों को शामिल किया जाता है, जैसे- वायु तापमान, आर्द्रता या नमी, सूर्य से प्राप्त विकिरणीय ऊष्मा, शुष्क तापमान, हवा की गति। इन सभी तत्वों को मिलाकर यह पता लगाया जाता है कि मानव शरीर वास्तव में कितनी गर्मी महसूस कर रहा है और वह स्वयं को पसीने तथा अन्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से कितनी प्रभावी ढंग से ठंडा रख सकता है।

कार्य घंटों के नुकसान की गणना 12 घंटे के कार्यदिवस और सप्ताह में सात दिन काम करने की परिकल्पना के आधार पर की गई। यह अवधि सौर दोपहर (सोलर नून ) के आसपास केंद्रित मानी गई, क्योंकि सामान्यतः इसी समय गर्मी का तनाव सबसे अधिक होता है।

विश्लेषण के अनुसार, दुनिया के कई क्षेत्रों में वायु तापमान और वेट-बल्ब ग्लोब तापमान का स्तर सौर दोपहर के कुछ घंटों बाद अपने चरम पर पहुंचता है। अनुमानित कार्य-घंटा हानि का अधिकांश हिस्सा इसी अवधि में होता है, जब अत्यधिक गर्मी के कारण श्रमिकों के लिए काम जारी रखना कठिन या असुरक्षित हो जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो अध्ययन ने केवल तापमान नहीं मापा, बल्कि यह आकलन किया कि गर्मी और नमी का संयुक्त प्रभाव मानव शरीर की काम करने की क्षमता को कितना प्रभावित करता है। इसलिए इसके निष्कर्ष कृषि श्रमिकों और अन्य बाहरी श्रमिकों के सामने बढ़ते जलवायु संकट की अधिक वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।