वर्ष 2024-25 में वानिकी और लॉगिंग का जीडीपी में 1.4% योगदान, सरकार द्वारा ग्रीन योजनाओं से रोजगार और संरक्षण को बढ़ावा।
प्रदूषण नियंत्रण योजना के तहत 3,122 करोड़ रुपये जारी, 2,624 करोड़ उपयोग, एनसीएपी के माध्यम से वायु गुणवत्ता सुधार प्रयास जारी।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026 लागू, कचरे का चार भागों में विभाजन और ऑनलाइन ट्रैकिंग से बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित किया गया।
2031-32 तक बिजली की मांग 388 गीगावाट का अनुमान, नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ाकर भविष्य की जरूरतें पूरी करने पर ध्यान।
एलपीजी उत्पादन में 40 फीसदी की वृद्धि, सी3-सी4 गैसों का उपयोग केवल घरेलू गैस हेतु, साथ ही 100 हवाई अड्डों ने ग्रीन ऊर्जा अपनाया।
वनों और वन आधारित गतिविधियों का जीडीपी में योगदान
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण जारी है, इसी बीच सदन में उठे एक सवाल का लिखित जवाब देते हुए आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने लोकसभा में कहा कि भारत में वन देश की प्राकृतिक संपदा का एक अहम हिस्सा हैं। वनों से हमें लकड़ी, जड़ी-बूटियां, फल, और कई प्रकार के संसाधन मिलते हैं। साथ ही, वन पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में भी मदद करते हैं। साल 2024-25 के लिए “वानिकी और लट्ठे लकड़ी” का योगदान देश के सकल मूल्य वर्धन (जीएवी) में 1.4 प्रतिशत रहा है।
यादव ने कहा कि सरकार वनों के संरक्षण और लोगों की आजीविका बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चला रही है। इनमें ग्रीन इंडिया मिशन, मिष्टी (मैंग्रोव पहल), नगर वन योजना, स्कूल नर्सरी योजना और प्रतिपूरक वनीकरण कोष शामिल हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य पेड़ लगाना, वन क्षेत्र बढ़ाना और स्थानीय लोगों को रोजगार देना है। वनों का महत्व केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन से लड़ने में भी मदद करते हैं। इसलिए सरकार लगातार वनों को बढ़ाने और उनकी सुरक्षा पर ध्यान दे रही है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण योजनाएं
भारत में प्रदूषण एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है, खासकर शहरों में वायु प्रदूषण। इसी को लेकर सदन में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया कि इसे कम करने के लिए सरकार ने “प्रदूषण नियंत्रण” नाम की योजना चलाई है। सिंह ने बताया कि साल 2021-22 से 2025-26 तक इस योजना के तहत 3,122 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
इनमें से 2,624 करोड़ रुपये का उपयोग विभिन्न एजेंसियों द्वारा किया जा चुका है। इस योजना में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) और अन्य स्थानीय निकाय शामिल हैं। मंत्री ने कहा कि इस योजना के तहत राष्ट्रीय, राज्य और शहर स्तर पर समितियां बनाई गई हैं जो प्रदूषण नियंत्रण कार्यों की निगरानी करती हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के माध्यम से शहरों में हवा की गुणवत्ता सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार का उद्देश्य है कि लोगों को स्वच्छ हवा मिले और प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों को कम किया जा सके।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026
सदन में उठे एक और सवाल के जवाब में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में कहा कि कि कचरा प्रबंधन आज के समय की एक बड़ी चुनौती है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने 27 जनवरी 2026 को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 जारी किए हैं। ये नियम एक अप्रैल 2026 से लागू होंगे और पुराने 2016 के नियमों की जगह लेंगे।
इन नए नियमों में कचरे को चार भागों में अलग करने की बात कही गई है। ये हैं गीला कचरा, सूखा कचरा, सैनिटरी कचरा और विशेष देखभाल वाला कचरा। इससे कचरे को सही तरीके से निपटाने में आसानी होगी।
इन नियमों में “बड़ी मात्रा में कचरा उत्पन्न करने वालों की विस्तारित जिम्मेदारी” भी शामिल की गई है, जिसका मतलब है कि बड़े स्तर पर कचरा पैदा करने वालों को उसकी जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। सरकार ने कचरे की निगरानी के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू किया है, जिससे कचरे के संग्रह से लेकर उसके निपटान तक की पूरी प्रक्रिया को ट्रैक किया जा सकेगा। यह कदम स्वच्छ भारत और पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
बिजली की मांग और ऊर्जा आवश्यकता
सदन में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए आज, विद्युत मंत्रालय में राज्य मंत्री श्रीपाद नाइक ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए कहा कि भारत में तेजी से विकास हो रहा है, जिसके कारण बिजली की मांग भी बढ़ रही है। साल 2029-30 तक देश में बिजली की अधिकतम मांग 345 गीगावाट तक पहुंच सकती है।
इसी तरह 2031-32 तक यह मांग बढ़कर 388 गीगावाट हो सकती है। ऊर्जा की कुल आवश्यकता भी लगातार बढ़ रही है। यह 2029-30 में 2388 बिलियन यूनिट और 2031-32 में 2703 बिलियन यूनिट होने का अनुमान है। इससे यह साफ है कि भविष्य में भारत को अधिक बिजली उत्पादन की जरूरत होगी। इसलिए सरकार नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सौर और पवन ऊर्जा पर भी जोर दे रही है, ताकि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना ऊर्जा की जरूरत पूरी की जा सके।
देश में लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) उत्पादन
सदन में सवालों के सिलसिला जारी रहा। सदन में उठाए गए एक सवाल के जवाब में आज, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने राज्यसभा में बताया कि भारत में रसोई गैस यानी एलपीजी की मांग लगातार बढ़ रही है। इस मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने नौ मार्च 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। मंत्री ने कहा कि सभी रिफाइनरी कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे सी3 और सी4 हाइड्रोकार्बन का उपयोग केवल एलपीजी उत्पादन के लिए करें।
गोपी ने कहा इन गैसों में प्रोपेन, ब्यूटेन, प्रोपिलीन और ब्यूटीन्स शामिल हैं। पहले इनका उपयोग अन्य उत्पादों के लिए भी किया जाता था, लेकिन अब इन्हें केवल घरेलू एलपीजी के लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा। इस फैसले के बाद देश में एलपीजी उत्पादन में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इससे घरेलू उपभोक्ताओं को गैस की उपलब्धता बेहतर होगी और आयात पर निर्भरता कम होगी।
दिल्ली में लैंड पूलिंग नीति
दिल्ली में शहरी विकास के लिए जमीन पूलिंग नीति लागू की गई है। इसी को लेकर सदन में पुछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए आज, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री टोखन साहू ने राज्यसभा में बताया कि इस नीति के तहत किसी क्षेत्र में विकास के लिए 70 प्रतिशत जमीन का एक साथ आना जरूरी है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से जमीन मालिकों की स्वैच्छिक भागीदारी पर आधारित है।
साहू ने बताया कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) इस नीति को लागू करने के लिए कई कदम उठा रहा है। सरकार ने कुछ नियमों में बदलाव भी किए हैं, जैसे कि जमीन से जुड़े होने की शर्त में ढील देना और सेक्टरों का विभाजन करना। इसके अलावा 105 गांवों में जागरूकता शिविर लगाए जा रहे हैं ताकि लोग इस नीति को समझ सकें और इसमें भाग लें। इस नीति का उद्देश्य है कि दिल्ली में योजनाबद्ध तरीके से विकास हो और लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
कार्बन-न्यूट्रल विकास और सतत विमानन
सदन में उठे एक सवाल के जवाब में आज, नागरिक उड्डयन मंत्रालय में राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने राज्यसभा में कहा कि भारत में विमानन क्षेत्र भी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण की चिंता भी बढ़ रही है। इसे ध्यान में रखते हुए नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे नए हवाई अड्डों को कार्बन न्यूट्रल बनाने पर ध्यान दें।
मोहोल ने बताया कि देश के 100 हवाई अड्डे अब 100 प्रतिशत ग्रीन ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं। इनमें से चार हवाई अड्डे दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु ने उच्चतम स्तर का कार्बन न्यूट्रल प्रमाणन हासिल किया है। सरकार चाहती है कि भविष्य के सभी ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट शुरू से ही पर्यावरण के अनुकूल बनाए जाएं। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा और देश सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ेगा।