प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
जलवायु

गर्मी की मार और जन्म का गणित: क्या भारत में लिंग अनुपात को प्रभावित कर रहा है बढ़ता तापमान

अध्ययन दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि भारत की आने वाली पीढ़ियों की संरचना को भी प्रभावित कर रहा है

Lalit Maurya

  • बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम का संकट नहीं रही, यह भारत में जन्म लेने वाली आने वाली पीढ़ियों का संतुलन भी बदल सकती है।

  • ऑक्सफोर्ड से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा भारत और 33 अफ्रीकी देशों में 50 लाख से अधिक जन्मों के विश्लेषण पर आधारित अध्ययन में सामने आया है कि 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान लड़कों के जन्म में कमी से जुड़ा है।

  • भारत में यह असर खासकर गर्भावस्था की दूसरी तिमाही के दौरान दिखा, जहां अधिक तापमान के समय लड़कों के जन्म में गिरावट दर्ज की गई। शोध के अनुसार, अत्यधिक गर्मी भ्रूण के जीवित रहने, मातृ स्वास्थ्य और परिवार नियोजन से जुड़े व्यवहारों को प्रभावित कर सकती है।

  • अध्ययन चेतावनी देता है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय या आर्थिक चुनौती नहीं है—यह जनसंख्या की संरचना, लैंगिक संतुलन और सामाजिक समानता तक को प्रभावित कर सकता है। यदि मातृ स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित नहीं की गई, तो बढ़ती गर्मी आने वाली पीढ़ियों की बनावट पर स्थाई असर छोड़ सकती है।

धरती पर बढ़ता तापमान अब महज मौसम से जुड़ा आंकड़ा नहीं, बल्कि यह भारत में आने वाली पीढ़ियों की तस्वीर भी बदल रहा है।

भारत सहित अफ्रीकी देशों पर किए एक नए चौंकाने वाले अध्ययन में सामने आया है कि बढ़ता तापमान जन्म के समय लिंग अनुपात को भी प्रभावित कर सकता है। मतलब कि बढ़ती गर्मी तय कर रही है कि कितने लड़के-कितनी लड़कियां जन्म लेंगी। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन के अनुसार, दुनिया के गर्म होते माहौल में बढ़ती गर्मी केवल मौसम या स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह जनसंख्या के संतुलन और लैंगिक अनुपात पर भी असर डाल सकती है।

50 लाख से अधिक जन्मों का विश्लेषण

डॉक्टर जैस्मिन अब्देल घानी, डॉक्टर जोशुआ वाइल्ड और प्रोफेसर रिद्धि कश्यप के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में भारत सहित उप-सहारा अफ्रीका के 33 देशों के 50 लाख से अधिक जन्मों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों को विस्तृत जलवायु रिकॉर्ड से जोड़कर यह समझने की कोशिश की है कि गर्भावस्था के दौरान गर्मी का असर बच्चे के लिंग अनुपात पर कैसे पड़ता है।

साथ ही पर्यावरण में आता बदलाव आबादी की बुनियादी प्रक्रियाओं को कैसे प्रभावित कर सकता है।

जन्म के समय लिंग अनुपात, यानी लड़कों की संख्या लड़कियों के मुकाबले कितनी है। यह एक अहम जनसांख्यिकीय संकेतक माना जाता है। यह केवल आंकड़ा नहीं होता, बल्कि इससे मां के स्वास्थ्य, गर्भ में शिशु के जीवित रहने की स्थिति और कई मामलों में लैंगिक भेदभाव की झलक मिलती है।

देखा जाए तो पिछले कुछ दशकों में कई क्षेत्रों में लिंग अनुपात बिगड़ने से चिंता बढ़ी है, खासकर वहां जहां बेटे की चाह और लिंग-चयन जैसी प्रवृत्तियां मौजूद हैं।

यह नया शोध इन चिंताओं को बढ़ती वैश्विक गर्मी से जोड़ता है। अध्ययन सवाल उठाता है कि क्या अत्यधिक तापमान और पर्यावरणीय दबाव गर्भावस्था के परिणामों और पूरी आबादी के लैंगिक संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं।

20 डिग्री से ऊपर बदला रुझान

अध्ययन में सामने आया है कि 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान का संबंध लड़कों के जन्म में कमी से जुड़ा है। लेकिन भारत और अफ्रीका में इसके कारण अलग-अलग पाए गए। उदाहरण के लिए उप-सहारा अफ्रीका में गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने से लड़कों के जन्म में गिरावट देखी गई।

शोध के अनुसार, अत्यधिक गर्मी मां के शरीर पर दबाव डालती है, जिससे भ्रूण की मृत्यु का खतरा बढ़ सकता है। यह असर खासकर ग्रामीण क्षेत्रों, कम शिक्षित महिलाओं और अधिक बच्चों को जन्म देने वाली माओं में ज्यादा देखा गया।

भारत में अलग तस्वीर

भारत में स्थिति थोड़ी अलग पाई गई। यहां गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में अधिक तापमान के दौरान लड़कों के जन्म में कमी दर्ज की गई। यह असर खासकर अधिक उम्र की माओं, पहले से कई बच्चों की मां बनने वाली महिलाओं और उत्तरी राज्यों की उन महिलाओं में ज्यादा दिखा जिनके पहले से बेटा नहीं है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि भारत के कुछ हिस्सों में लंबे समय से बेटा पसंद करने की प्रवृत्ति और लिंग चयन की समस्या रही है। ऐसे में अत्यधिक गर्मी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच या लिंग-चयन संबंधी प्रक्रियाओं में अस्थाई कमी आ सकती है, जिससे लिंग अनुपात में थोड़े समय के लिए असंतुलन थोड़ा घट सकता है।

केवल मौसम नहीं, जनसंख्या का सवाल

अध्ययन से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर अब्देल घानी के अनुसार, “अत्यधिक गर्मी सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ा संकट नहीं है। अध्ययन दर्शाता है कि तापमान यह भी प्रभावित करता है कि कौन जन्म लेता है और कौन नहीं। तापमान का असर गर्भ में शिशु के जीवित रहने और परिवार नियोजन से जुड़े फैसलों पर भी पड़ता है।

इसका गहरा और दूरगामी प्रभाव जनसंख्या की बनावट और लड़का-लड़की के प्राकृतिक संतुलन पर पड़ सकता है।" ऐसे में उनके मुताबिक अगर हमें यह समझना है कि गर्म होती दुनिया में पर्यावरण समाज को कैसे प्रभावित करेगा, तो इन प्रक्रियाओं को समझना बेहद जरूरी है।

बढ़ सकती है असमानता

अध्ययन बताता है कि गर्मी का असर सभी पर बराबर नहीं पड़ता। जिन महिलाओं के पास संसाधन कम हैं या जो कमजोर और असुरक्षित परिस्थितियों में रह रही हैं, वे ज्यादा प्रभावित होती हैं। इससे इस बात की भी चिंता बढ़ती है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में स्वास्थ्य से जुड़ी असमानताएं और गहरा सकती हैं।

यह शोध साफ संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन केवल मौसम, पर्यावरण या अर्थव्यवस्था का संकट नहीं है—यह हमारे समाज की बुनियाद को छू रहा है। बढ़ती गर्मी जनसंख्या की संरचना और लड़का-लड़की के प्राकृतिक संतुलन तक को बदल सकती है।

ऐसे में अगर समय रहते मातृ स्वास्थ्य की सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित नहीं की गई, तो जलवायु संकट का असर आने वाली पीढ़ियों की बनावट और सामाजिक संतुलन पर गहरी और स्थाई छाप छोड़ सकता है।