योगेन्द्र आनंद / सीएसई
जलवायु

बदलते मॉनसून के दौर में बारिश की एक-एक बूंद सहेजना जरूरी

यह वर्ष 2026 मौसम के लिहाज से एक बेहद चुनौतीपूर्ण वर्ष होने वाला है। सबसे पहले प्रशांत महासागर में अल नीनो के विकसित होने की खबर है, जिसका पारंपरिक रूप से अर्थ भारतीय मॉनसून के कमजोर पड़ने से लगाया जाता रहा है

Sunita Narain

मॉनसून शायद एकमात्र ऐसा अखिल भारतीय प्राकृतिक घटनाक्रम है जो क्रिकेट के प्रति हमारे राष्ट्रीय प्रेम की बराबरी कर सकता है। हम बड़ी उत्सुकता से यह देखने की प्रतीक्षा करते हैं कि क्या मॉनसून अपने नियत समय पर केरल पहुंचेगा, जहां वह देश में सबसे पहले दस्तक देता है।

हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से आगे बढ़ते हुए मॉनसून के देश में प्रवेश की बारीकी से निगरानी की जाती है और जब भी उसकी गति में थोड़ी भी रुकावट आती है तो अनेक लोगों की धड़कनें तेज हो जाती हैं। किसान अपनी नई फसलों के लिए पानी की उम्मीद में आसमान की ओर देखते हैं।

जलाशयों को फिर से भरने की आवश्यकता होती है ताकि खेतों की सिंचाई हो सके और बिजली का उत्पादन किया जा सके। गर्मियों की भीषण गर्मी से सूख चुकी मिट्टी, पेड़-पौधे और वन माॅनसूनी बारिश की प्रतीक्षा करते हैं ताकि उनमें फिर से जीवन का संचार हो सके।

यहां तक कि हम शहरों में रहने वाले लोग जो प्रकृति से कट चुके हैं और मानो यह मान बैठे हैं कि पीने का पानी (सरकारों और नलों से ही आता है) भी मॉनसून के आने और भीषण गर्मी से राहत मिलने की प्रतीक्षा करते हैं।

सूखी धरती पर पड़ने वाली पहली बारिश की सुगंध जितनी मनमोहक एवं अतुलनीय होती है, वह हमारे लिए एक अकल्पनीय आनंद का क्षण होता है। फिर भी हम भारतीय मॉनसून को पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि यह वैश्विक मौसम प्रणालियों से किस प्रकार जुड़ा हुआ है और जब जलवायु परिवर्तन दुनिया की समुद्री धाराओं, पवन-प्रणालियों और वर्षा चक्रों को बदल रहा है तो मॉनसून पर उसके क्या प्रभाव होंगे।

यह वर्ष 2026 मौसम के लिहाज से एक बेहद चुनौतीपूर्ण वर्ष होने वाला है। सबसे पहले प्रशांत महासागर में अल नीनो के विकसित होने की खबर है, जिसका पारंपरिक रूप से अर्थ भारतीय मॉनसून के कमजोर पड़ने से लगाया जाता रहा है।

अब यह लगभग निश्चित हो चुका है कि यह अल नीनो एक अत्यंत शक्तिशाली या “सुपर” घटना होगी, क्योंकि समुद्र का सतही तापमान औसत से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ने की संभावना है। समुद्र की गर्मी में यह असाधारण वृद्धि वायुमंडलीय दाब प्रणालियों और जेट धाराओं को अस्थिर कर सकती है तथा दुनिया भर में मौसम संबंधी घटनाओं को और अधिक तीव्र बना सकती है।

यह सब जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों के अलावा होगा जो पहले से ही तापमान बढ़ा रहे हैं और मौसम के पैटर्न को अधिक अस्थिर तथा अनिश्चित बना रहे हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर वर्ष 2026 अत्यधिक गर्मी और चरम मौसम घटनाओं वाला वर्ष साबित होने की आशंका है।

इस वर्ष अल नीनो के जून से अगस्त के बीच और अधिक शक्तिशाली होने की आशंका है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने औसत से कम वर्षा वाले मॉनसून का अनुमान लगाया है। एक मौसमी घटना जो इसके सबसे बुरे प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकती है, वह है भारतीय महासागर द्विध्रुव (आईओडी) प्रणाली।

इसे पश्चिमी भारतीय महासागर (पूर्वी अफ्रीका के तट के पास) और पूर्वी भारतीय महासागर (इंडोनेशिया के तट के पास) के बीच तापमान के अंतर के आधार पर मापा जाता है।

सकारात्मक आईओडी की स्थिति, जिसमें पश्चिमी भाग का पानी अधिक गर्म होता है, एक शक्तिशाली अल नीनो के दुष्प्रभावों को कुछ हद तक संतुलित कर सकती है। लेकिन इस वर्ष आईएमडी ने आईओडी की तटस्थ स्थिति का अनुमान लगाया है और मॉनसून के अंत की ओर ही इसके सकारात्मक होने की संभावना जताई है। यह अच्छी खबर नहीं है।

बात यहीं समाप्त नहीं होती है। वैश्विक मौसम प्रणाली तेजी से असंतुलित होती जा रही है। एक ओर जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग हर दिन कोई न कोई चरम मौसमीय घटना घटित हुई हैं।

भारी और अत्यधिक वर्षा, बाढ़ तथा भूस्खलन जैसी घटनाएं वर्ष के 68 से 95 प्रतिशत दिनों में दर्ज की गई हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अब हमें कम दिनों में अधिक वर्षा प्राप्त हो रही है। यह चिंता का विषय है क्योंकि इससे बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

यदि हम इस वर्षा जल को रोककर उसका उपयोग सतही और भूजल भंडारों को पुनर्भरित करने में नहीं कर पाए तो इससे जल की कमी और सूखे की समस्या और भी गंभीर हो जाएगी।

दूसरी ओर पश्चिमी विक्षोभ जो भूमध्यसागर से पश्चिम एशिया होते हुए आने वाली नमी से भरपूर हवाओं (उत्तर भारत में वर्षा तथा हिमपात लाती हैं) में परिवर्तन साफ दिख रहा है। ये हवाएं पहले मुख्यतः सर्दियों के महीनों में आती थीं, लेकिन हिमालय में बर्फबारी की कमी से स्पष्ट है कि अब गर्मियों के दौरान भी यह स्थिति बनने लगी है और मॉनसून के मौसम में भी इनकी सक्रियता बनी रहती है।

यद्यपि ये हवाएं भीषण गर्मी के महीनों में स्वागत योग्य वर्षा लेकर आती हैं, लेकिन साथ ही कट चुकी फसलों को नुकसान पहुंचाने के अलावा उन्हें नष्ट भी कर देती हैं। पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी विक्षोभों ने माॅनसूनी निम्न दाब प्रणालियों से टकराकर अत्यधिक वर्षा और बादल फटने जैसी घटनाओं को जन्म दिया है।

यही कारण था कि पिछले वर्ष हिमालयी राज्यों में भयानक रूप से अचानक आई बाढ़ों और भूस्खलनों जैसी भयानक घटनाएं घटित हुईं। दुनिया के मौसम की कोई सीमाएं नहीं होतीं। वर्षा, गर्मी, हिमपात और ठंड को नियंत्रित करने वाली हवाओं तथा समुद्री धाराओं की प्रणालियां आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं।

इन वैश्विक प्रणालियों पर एक अन्य वैश्विक संकट, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का प्रभाव पड़ रहा है। ये उत्सर्जन भले ही अलग-अलग देशों से होते हों लेकिन अंततः पूरी पृथ्वी के वायुमंडल में फैल जाते हैं। इसलिए जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन तापमान बढ़ा रहा है, आर्कटिक क्षेत्र अधिक गर्म हो रहा है, जिससे ध्रुवीय जेट धाराएं कमजोर पड़ रही हैं।

इसके परिणामस्वरूप भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच तापमान का अंतर कम हो जाता है जो पश्चिमी विक्षोभों को प्रभावित करता है और भारत में असामयिक वर्षा का कारण बनता है।

आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि यह क्यों महत्वपूर्ण है। आखिरकार सिंचाई और मानव निर्मित जल प्रणालियों ने वर्षा पर हमारी निर्भरता को कम कर दिया है लेकिन सच्चाई यह है कि भारत अभी भी मॉनसून की अनिश्चितताओं से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

खाद्य उत्पादन के लिए हमें वर्षा जल का संचयन करना आवश्यक है क्योंकि भारत की अधिकांश कृषि वर्षा पर निर्भर है। यहां तक कि सिंचित खेती भी काफी हद तक भूजल पर निर्भर करती है। पीने के पानी का 70 प्रतिशत से अधिक भाग भी भूजल से ही प्राप्त होता है।

इसी कारण भारत का वास्तविक वित्त मंत्री अर्थात भारतीय मॉनसून हमारे लिए सम्मान का अधिकारी है। हमें वर्षा की प्रत्येक बूंद का महत्व समझना होगा और उसे उसी स्थान तथा उसी समय संजोना होगा जब वह धरती पर गिरे।