भारत में अल नीनो का नाम आते ही सबसे पहले मॉनसून याद आता है। इसकी वजह भी साफ है। खेती, पानी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश पर निर्भर करता है। इसलिए जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म होता है, तो भारत की नजर सबसे पहले मॉनसून पर जाती है।
सवाल केवल यह नहीं है कि अल नीनो के कारण इस साल भारत में कितनी कम बारिश हुई। मुद्दा है कि मॉनसून के खत्म होने के बाद इसका असर कहां-कहां तक जाएगा, रबी की खेती, मिट्टी की नमी, भूजल, जलाशयों, बिजली की मांग, गर्मी और खाद्य कीमतों तक। यही वह जगह है जहां एल नीनो को मॉनसून से आगे समझने की जरूरत है।
भारतीय मौसम विभाग के अंतिम आकलन के अनुसार, इस साल देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की कुल बारिश दीर्घकालिक औसत (868.6 मिमी) से 12.6 प्रतिशत कम रही। केवल 759.4 मिमी बारिश दर्ज होने के कारण इसे 'कमजोर मानसून' माना गया है। राष्ट्रीय स्तर पर इस कमी के अलावा, मानसून का क्षेत्रीय वितरण बेहद बिखरा और असंतुलित रहा। 'इंडिया ड्रॉट मॉनिटर' के अनुसार, सितंबर के मध्य तक देश का लगभग 52.5 प्रतिशत हिस्सा शुष्क या सूखे जैसी परिस्थितियों की चपेट में आ चुका था, जिससे देश के करीब 282 जिले प्रभावित हुए।
क्षेत्रीय स्तर पर, पूर्वी, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में बारिश में 24% से 26% तक की भारी गिरावट देखी गई। मेघालय में चेरापूंजी जैसे अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के बावजूद रिकॉर्ड 60% कम बारिश हुई, जबकि असम और बिहार में 28% से 32% की कमी रही। इसके विपरीत, ओडिशा ने 30% अधिक वर्षा के साथ पिछले 20 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया।
उत्तर प्रदेश (+8%), उत्तराखंड (+9%) और दिल्ली (+4%) में भी सामान्य से अधिक पानी गिरा, जबकि पड़ोसी राज्य पंजाब (41% कमी) और हरियाणा (23% कमी) सूखे रह गए। यह स्पष्ट करता है कि मानसून का मूल्यांकन केवल कुल बारिश से नहीं, बल्कि सही समय और सही भौगोलिक वितरण के आधार पर किया जाना चाहिए।
अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति है, जबकि इसके उलट सतह का तापमान ठंडा होने पर ला नीना बनता है। समुद्र में ऊष्मा का यह उतार-चढ़ाव वातावरण में ऊपर उठती हवा, बादलों और हवाओं के वैश्विक पैटर्न को बदल देता है, जिससे हजारों किलोमीटर दूर भारत में मॉनसून कमजोर पड़ने, बारिश घटने और अत्यधिक गर्मी जैसी स्थितियां बनती हैं।
हालाँकि, भारतीय मौसम सिर्फ प्रशांत महासागर की इस जुगलबंदी पर निर्भर नहीं करता। हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के तापमान का अंतर, जिसे इंडियन ओशन डाइपोल (आईओडी) कहते हैं, इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। जब इसका पश्चिमी हिस्सा (अफ्रीका के पास) अधिक गर्म होता है (सकारात्मक आईओडी), तो यह भारत की ओर नमी से भरी हवाओं को तेजी से धकेलता है, जो अल नीनो के प्रभाव को कमजोर कर देश में बारिश करा देता है।
इसके साथ ही, विषुवतीय आसमान में गतिशील हवा और बादलों की वैश्विक पट्टी, मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (एमजेओ), भारत के ऊपर आने पर कुछ हफ्तों के लिए झमाझम बारिश लाती है। वहीं सर्दियों में भूमध्य सागर से आने वाला पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत में बर्फबारी और बारिश लाता है, जो रबी फसलों के लिए जीवनदायिनी साबित होता है।
वर्ष 2026 में प्रकाशित भारतीय मौसम विभाग के एक अध्ययन में 1975 से 2025 तक के 50 वर्षों के मॉनसून आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह पाया गया कि मॉनसून पर अल नीनो, आईओडी और एमजेओ का प्रभाव अलग-अलग समय और पैमाने पर एक-दूसरे से जुड़ता है। प्रशांत और हिंद महासागर की यह संयुक्त स्थिति मॉनसून की बारिश और उसके वितरण को सीधे प्रभावित करती है।
स्पष्ट है कि किसी वर्ष अल नीनो के मजबूत होने के बावजूद वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि हिंद महासागर और अन्य वायुमंडलीय कारक किस स्थिति में हैं। यही वजह है कि भारत का सूखा, बाढ़ या कमजोर मॉनसून केवल अल नीनो या ला नीना तय नहीं करते, बल्कि यह इन सभी वैश्विक और स्थानीय कारकों के एक संयुक्त तालमेल का नतीजा होता है।
मॉनसून खत्म, संकट की शुरुआत
अक्टूबर की शुरुआत के साथ दक्षिण-पश्चिम मॉनसून भले ही समाप्त हो चुका हो, लेकिन कमजोर मानसून का असर आगामी रबी (अक्टूबर-मार्च) की मुख्य फसलों पर दो अलग-अलग स्तरों पर पड़ने जा रहा है। ताजा आकलनों के अनुसार, मॉनसून की इस विदाई के समय देश का 52.5 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पहले ही शुष्क या सूखे जैसी परिस्थितियों की चपेट में आ चुका है।
इस सूखेपन की पहली मार खेतों की ऊपरी मिट्टी की प्राकृतिक नमीपर पड़ी है, गेहूं, चना और सरसों के के शुरुआती अंकुरण के लिए सबसे जरूरी होती है। दूसरी मार सिंचाई के पानी की उपलब्धता पर लगी है; केंद्रीय जल आयोग की जलाशयों की हालिया लाइव स्टोरेज रिपोर्टें बताती हैं कि देश के 150 से अधिक प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य औसत से काफी नीचे खिसक चुका है।
इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए भारत के कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2026-27 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य को घटाकर 373.93 मिलियन टन (जिसमें रबी का लक्ष्य 177.72 मिलियन टन है) कर दिया है, जो पिछले वर्ष के अनुमानित 376.56 मिलियन टन उत्पादन से कम है। इसके समाधान के लिए सरकार कम पानी वाले क्षेत्रों में दलहन और तिलहन जैसी फसलों को बढ़ावा देने की योजना पर काम कर रही है।
हालांकि, खेतों में नमी के अकाल और नहरों में पानी की किल्लत के इस दोहरे संकट के कारण देश के करोड़ों किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए पूरी तरह से ट्यूबवेलों और भूजल के अत्यधिक दोहन पर निर्भर होने को मजबूर हो जाएंगे।
मानसून का ग्रिड से नाता
जब देश के लाखों किसान रबी फसलों की बुवाई और शुरुआती सिंचाई के लिए बिजली की मांग में एक अप्रत्याशित और तेज उछाल आना तय है। पावर सिस्टम ऑपरेशन कॉरपोरेशन और नेशनल लोड डिस्पैच सेंटर के अनुसार कम मानसूनी बारिश वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र में अक्टूबर और नवंबर के महीनों में बिजली की पीक डिमांड सामान्य से 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। यह स्थिति एक ऐसे खतरनाक दुष्चक्र को जन्म देती है, जहाँ मॉनसून की कम बारिश पहले अपर्याप्त रिचार्ज के कारण भू-जल नीचे चला जाता है और फिर उसी पानी को बाहर खींचने की होड़ देश के पावर ग्रिडों को ओवरलोड और थर्मल पावर प्लांटों को कोयले की अतिरिक्त खपत के भारी दबाव में डाल देती है। और अगर सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ से पर्याप्त बारिश नहीं होती और पानी की कमी अगले गर्मी तक खिंचती है, तो घरेलू उपयोग, कृषि और उद्योग, तीनों एक ही संसाधन के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
अल नीनो स्वयं एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, लेकिन इस बार पहले से ही अत्यधिक गर्म हो चुकी दुनिया के ऊपर घटित हो रही हैं, जब वैश्विक तापमान पहले ही औद्योगिक काल की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की खतरनाक सीमा को पार कर चुका है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के ताजा वैश्विक आकलनों के मुताबिक, प्रशांत महासागर सतह का तापमान अपने सामान्य औसत से लगभग 3.6 डिग्री सेल्सियस अधिक है। सितंबर 2026 में ही समुदी सतह का तापमान सामान्य से 3.08 से 3.11 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया जा चुका है, जो कि मानव इतिहास में अब तक की सबसे भीषण विसंगति है। पिछले सबसे प्रभावी 2015-16 के अल नीनो में औसत समुदी सतह के तापमान 3.02 डिग्री सेल्सियस ही था, फिर भी दुनिया भर के मौसम पर व्यापक प्रभाव पड़ा था।
यही वजह है कि मौजूदा अल नीनो से पैदा होने वाली परिस्थितयों को पुराने अल नीनो वाले साल से सीधे तुलना करना ठीक नहीं है। आज का तापमान आधार पहले से अधिक ऊंचा है। सुपर एल नीनो का मौजूदा दौर नवंबर-दिसंबर के दौरान अपने चरम पर पहुँचकर फरवरी 2027 तक पूरी तरह सक्रिय रहने वाला है। जिसका सीधा मतलब है कि यह प्राकृतिक गर्मी हमारे बढ़े हुए वैश्विक औसत-तापमान के ऊपर एक 'डबल अटैक' की तरह काम करेगी। इस संयुक्त मार का असर भारत में सर्दियों के महीनों को छोटा कर देगा और मार्च 2027 की शुरुआत से ही पूरे देश को जानलेवा लू और हीटवेव का सामना करना पड़ेगा।
समय से पहले आने वाली यह भीषण गर्मी और मौसम का यह असंतुलन अंततः सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करेगा। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के एक मॉडलिंग अध्ययन ने सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में लगभग 15,800 भीषण गर्मी से हिने वाले अतिरिक्त मौत का अनुमान लगाया है। लैंसेट की स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर जारी देश-विशेष की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अत्यधिक और असमय गर्मी के कारण खुले आसमान के नीचे काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों, निर्माण श्रमिकों और किसानों की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है, साथ ही बुजुर्गों और बच्चों में हीट-स्ट्रोक तथा मौसमी बीमारियों का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
स्वास्थ्य के इस संकट के समानांतर, जब खेतों में फसलों के उत्पादन की लागत (पंप चलाने के लिए डीजल और बिजली खर्च) बढ़ती है और सिंचाई के अभाव में मुख्य फसलों का कुल उत्पादन घटता है, तो इसका सीधा असर स्थानीय मंडियों से होता हुआ खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ता है। भारतीय रिजर्व बैंक भी अपनी हालिया मौद्रिक नीति समीक्षाओं में लगातार आगाह करता रहा है कि मॉनसून की यह क्षेत्रीय असमानता खाद्य मुद्रास्फीति को अनियंत्रित कर देती है, जिससे अनाज, दालों और सब्जियों की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर देश के हर आम नागरिक की जेब पर भारी बोझ डालती हैं।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की यह चेतावनी कि वर्तमान सुपर अल नीनो फरवरी 2027 तक पुर्री क्षमता के साथ सक्रिय रहेगा, इस बात का साफ संकेत है कि हमें मौसम के जोखिमों को भांपने के लिए अगले साल का इंतजार नहीं करना है। इसलिए, अल नीनो की निगरानी को केवल जून-सितंबर के मानसूनी हफ्तों तक सीमित रखना एक रणनीतिक भूल होगी।
हमें यह समझना होगा कि मॉनसून की विदाई इस कहानी का अंत नहीं, बल्कि एक बड़े संकट की शुरुआत है—एक ऐसा रास्ता जो प्रशांत महासागर से शुरू होकर भारत की मिट्टी, पानी, बिजली ग्रिड, जन-स्वास्थ्य और अंततः देश की खाद्य सुरक्षा की दहलीज तक जाता है।