कश्मीर के श्रीनगर में रहने वाले 64 वर्ष के मुश्ताक अहमद शाह घाटी से गायब होती सर्दियों के गवाह बन रहे हैं। शाह के मुताबिक, कश्मीर में सर्दी की पहचान बर्फबारी से ही होती है, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। इस सर्दी में कश्मीर घाटी के अधिकांश हिस्सों में बहुत कम बर्फ पड़ी है। हाल के वर्षों में यह कश्मीर की सबसे गर्म और सबसे शुष्क सर्दियों में से एक रही है।
स्वतंत्र मौसम विश्लेषक फैजान आरिफ बताते हैं कि फरवरी का महीना घाटी के कई निगरानी केंद्रों पर अब तक के सबसे गर्म महीनों के तौर पर दर्ज किया गया। श्रीनगर में औसत अधिकतम तापमान 15.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो 2016 में दर्ज 14.9 डिग्री सेल्सियस के पिछले रिकॉर्ड से अधिक है।
मार्च के पहले सप्ताह में स्कीइंग के लिए प्रसिद्ध और जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के सबसे ठंडे स्थानों में से एक गुलमर्ग में तापमान 17.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य से लगभग 13.7 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। यह तापमान मार्च के अब तक के उच्चतम स्तर के करीब है। आरिफ आगे कहते हैं, “साल के सबसे ठंडी अवधि वाले समय में इतनी व्यापक गर्मी कश्मीर के लिए अत्यंत असामान्य है।”
कई मौसम केंद्रों पर फरवरी में वर्षा अपने अब तक के सबसे निचले या लगभग सबसे निचले स्तर पर दर्ज की गई। श्रीनगर में मात्र 5.3 मिलीमीटर वर्षा हुई, जो 1901 में रिकॉर्ड रखे जाने की शुरुआत के बाद से फरवरी के सबसे कम आंकड़ों में से एक है। श्रीनगर स्थित भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के निदेशक मुख्तार अहमद के अनुसार, दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच जम्मू-कश्मीर में वर्षा में 66 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि अकेले फरवरी में यह कमी 89 प्रतिशत तक पहुंच गई।
फैजान आरिफ के विश्लेषण से पता चलता है कि केंद्र शासित प्रदेश में 2025-26 लगातार सातवीं ऐसी सर्दी है, जब वर्षा में उल्लेखनीय कमी रही है। श्रीनगर की जलवायु नीति सलाहकार मुतहर्रा ए डब्ल्यू देवा का कहना है कि सर्दियां खत्म नहीं हो रही हैं, बल्कि ऐसे तरीकों से बदल रही हैं जिन्हें वैज्ञानिक रूप से मापा जा सकता है। वह बताती हैं कि 1980 और 1990 के दशक में बर्फबारी अधिक अनुमानित होती थी और बर्फ की परत लंबे समय तक बनी रहती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा। देवा के मुताबिक, सर्दियों की स्थिर ठंड भूजल का फिर से भरना, आर्द्रभूमि की जलप्रणाली और खेती के चक्र को सही बनाए रखने में मदद करती थी।
देवा के मुताबिक, “सर्दियों की वह स्थिर ठंडक भूजल पुनर्भरण, आर्द्रभूमि की जल-प्रणाली और कृषि चक्र जैसी पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को संतुलित करती थी।” कश्मीर में इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईयूएसटी) के डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरमेंट, सस्टेनिबिलिटी एंड क्लाइमेट चेंज में सहायक प्रोफेसर यासिर अल्ताफ बताते हैं कि 1980 से 2016 के बीच कश्मीर घाटी का औसत तापमान लगभग 0.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है, जबकि अधिकतम तापमान हर वर्ष लगभग 0.03 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रहा है। वह कहते हैं, “यह समग्र गर्माहट सर्दियों को लगातार अधिक हल्का बना रही है और बर्फबारी में कमी ला रही है।”
श्रीनगर में आईएमडी के वैज्ञानिक अहमद भी इससे सहमत हैं और कहते हैं, “वर्षा के स्वरूप में स्पष्ट बदलाव आया है। जो वर्षा पहले अक्टूबर से मार्च के बीच मुख्य रूप से बर्फ के रूप में होती थी, वह अब बढ़ते हुए बारिश के रूप में हो रही है।”
उनका मानना है कि इस मौसम में राहत की संभावना बहुत कम है। वह कहते हैं, “यदि मार्च के अंत में बर्फबारी या बारिश होती भी है तो अब तक की कमी को पूरा करना मुश्किल होगा।” कश्मीर विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के सहायक प्रोफेसर मोहम्मद मुस्लिम इस बदलाव को और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं। वह कहते हैं, “वर्षा के मौसमी स्वरूप में बदलाव आ रहा है, जिसमें सर्दियों की वर्षा धीरे-धीरे खिसककर वसंत की शुरुआत की ओर बढ़ती जा रही है।”
बर्फबारी रहित सर्दी जम्मू-कश्मीर के पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा असर डाल रही है। फैजान आरिफ कहते हैं, “स्थानीय पौधे और जानवर लगातार ठंडे वातावरण पर निर्भर रहते हैं। अगर सर्दियां गर्म होती गईं, तो धीरे-धीरे क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बदल सकता है। मसलन, कुछ प्रजातियां लुप्त हो सकती हैं, जबकि कुछ नई प्रजातियां यहां आकर बस सकती हैं।”
बर्फ की कमी का असर जल उपलब्धता पर भी साफ दिख रहा है। श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (एसकेयूएएसटी) में एग्रोमौसम विज्ञान विभाग की प्रमुख प्रोफेसर समीरा कय्यूम बताती हैं, “यहां की कृषि आसपास के पहाड़ों में होने वाली सर्दियों की बर्फबारी पर बहुत अधिक निर्भर करती है। जब सर्दियां गर्म होती हैं और बर्फ कम पड़ती है तो पूरा जल-तंत्र प्रभावित हो जाता है।”
घाटी की जीवनरेखा मानी जाने वाली झेलम नदी इस समय शून्य-गेज स्तर से भी नीचे बह रही है, जो मार्च की शुरुआत में एक असामान्य स्थिति है, क्योंकि आमतौर पर इसी समय बर्फ पिघलने से जलस्तर बढ़ने लगता है। आरिफ बताते हैं, “पहले सर्दियों या शुरुआती वसंत में हल्की गर्मी पड़ते ही बर्फ पिघलती थी और झेलम का जलस्तर 1.5 से 2 मीटर तक बढ़ जाता था।”
लेकिन इस साल तस्वीर अलग है। गर्मी की शुरुआत में नदी का जलस्तर थोड़ा बढ़ा, फिर दोबारा गिर गया। वह कहते हैं, “यह इस बात का संकेत है कि पहाड़ों में अब बहुत कम बर्फ बची है, जो पिघलकर नदी को पानी दे सके।”
अहमद बताते हैं, “हम यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि क्या ग्लेशियर पिघल रहे हैं और यदि हां, तो अतिरिक्त पानी नदी तक क्यों नहीं पहुंच रहा। संभव है कि हीटवेव के कारण बढ़ी वाष्पीकरण प्रक्रिया नदी तक पहुंचने से पहले ही पानी का एक बड़ा हिस्सा खत्म कर दे रही हो।”
नदियों में पानी की कमी के चलते घाटी की कृषि पहले से ही दबाव में है। पुलवामा जिले के चरसू गांव के चौथी पीढ़ी के किसान अरशद हुसैन भट हर साल नदी के जलस्तर पर बारीकी से नजर रखते हैं। वह 10 कनाल (1 कनाल = 0.05 हेक्टेयर) भूमि पर धान की खेती करते हैं और सिंचाई के लिए झेलम से निकलने वाली नहरों पर निर्भर रहते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में खेती की मौसमी लय बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे खेती मौसम के झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई है। भट याद करते हैं, “पिछले साल हमारी फसल को बहुत नुकसान हुआ था।” देर से हुई बारिश ने बुआई में देरी कर दी और सितंबर में आई बाढ़ ने कटाई से ठीक पहले खेतों को तबाह कर दिया।
इस साल भी हालात बेहतर नहीं हैं, शुरुआती वसंत में ही नदी का जलस्तर सामान्य से काफी नीचे है। पर्याप्त प्रवाह न होने पर सिंचाई नहरें दूर के खेतों तक पानी नहीं पहुंचा पातीं और इससे वार्षिक आय का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह खत्म हो सकता है।
एक पर्वतीय शीत मरुस्थल के तौर पर पड़ोसी क्षेत्र लद्दाख में भी ऐसी स्थिति बनी कि सर्दियां शुरू होते ही खत्म हो गईं। जम्मू-कश्मीर की तरह लद्दाख में भी इस बार असामान्य रूप से गर्मी रही और बर्फबारी बेहद कम हुई। आईएमडी के अनुसार लेह और कारगिल जिलों में हाल के वर्षों की कुछ सबसे गर्म सर्दियां दर्ज की गईं। लद्दाख के लिए आईएमडी के निदेशक सोनम लोटस कहते हैं, “यह सर्दी कई मायनों में असामान्य रही है। वर्षा कम रही है, जबकि तापमान लगातार ऊंचा बना रहा।”
एक अधिक गर्म और कम बर्फीली सर्दी पहले से ही लद्दाख के प्राकृतिक परिदृश्य को बदल रही है। यहां की कृषि मुख्य रूप से उन धाराओं पर निर्भर करती है, जो ग्लेशियरों और बर्फ के पिघलने से मिलते पानी से पोषित होती हैं। लेकिन जैसे-जैसे ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और उनका द्रव्यमान कम हो रहा है, बर्फ के पिघलने से मिलने वाले पानी की मौसमी उपलब्धता में भी बड़ा बदलाव आ गया है।
अब ग्लेशियरों का अधिकतर पिघलाव गर्म शरद और सर्दियों के महीनों में ही हो जाता है, जिससे पानी पहले ही बहकर निकल जाता है। लिहाजा, वसंत के समय, जब बुआई के लिए सिंचाई की सबसे अधिक आवश्यकता होती है तब नदियों और नालों में जलप्रवाह अक्सर बहुत कम रह जाता है। ऐसी स्थिति में किसानों को फसल चक्र की शुरुआत में ही गंभीर जल-संकट का सामना करना पड़ता है।
लेह में कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक कुंजांग लामो कहती हैं कि बढ़ते तापमान के साथ क्षेत्र में फलों की खेती के पैटर्न भी बदल रहे हैं। पहले जिन समशीतोष्ण फलों, जैसे खुबानी, सेब और चेरी की खेती निचले इलाकों में होती थी, अब वे धीरे-धीरे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रहे हैं। वे समझाती हैं, “सभी समशीतोष्ण फलों को सुप्त अवस्था (डॉर्मेंसी) तोड़ने के लिए “चिलिंग आवर्स” की आवश्यकता होती है। यह आवश्यकता सामान्य तौर पर शून्य डिग्री सेल्सियस से सात डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान में पूरी होती है और अधिकांश किस्मों को 500 से 1,500 घंटे तक की ठंडक चाहिए होती है। पहले सर्दियां यह आवश्यकता पूरी कर देती थीं, लेकिन अब तापमान बढ़ने के कारण यह हमेशा संभव नहीं हो पा रहा है।” जब जरूरत भर की ठंडक पूरी नहीं हो पाती तो पेड़ समय पर सुप्तावस्था से बाहर नहीं आ पाते या उनकी कलियां असमान रूप से फूटती हैं, जिससे कुल उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ता है। यहां तक कि जब “चिलिंग आवर्स” की आवश्यकता पूरी हो भी जाती है तब भी गर्म वसंत के कारण फूल समय से पहले आने लगते हैं। लामो कहती हैं, “हमारा मौसम अब बेहद अस्थिर हो गया है और किसी भी निश्चित पैटर्न का पालन नहीं करता।”
अचानक आने वाली ठंड की लहरें पाला पड़ने (फ्रॉस्ट) के खतरे को बढ़ा देती हैं, जिससे कई बार किसानों को अपनी फसल का आधा हिस्सा तक खोना पड़ सकता है। पिछले दो वर्षों में शाम क्षेत्र में उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, क्योंकि समय से पहले फूल आने के कारण फसलें पाले के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई हैं। लामो आगे बताती हैं, “ग्रीनहाउस में उगाई जाने वाली गर्म मौसम की सब्जियां भी इन संरचनाओं के भीतर तनाव झेल रही हैं। उनमें फूल झड़ना या फल बनने से पहले ही गिर जाना जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं, जिससे उपज में तेजी से कमी आ रही है।”
गर्मी बढ़ने के साथ कीटों का फैलाव भी तेज हो रहा है। लेह में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में कीट विज्ञान के कार्यक्रम सहायक जिग्मेट लास्कित बताते हैं कि इस क्षेत्र की कठोर सर्दियां पहले कीटों की आबादी को नियंत्रित रखने में मदद करती थीं।
उनका कहना है, “जब सर्दियां अपेक्षाकृत कम ठंड वाली होने लगती हैं तो कई कीटों के जैविक चक्र बदल जाते हैं। वे पहले ही निकल आते हैं, उनकी संख्या बढ़ जाती है और उनका फैलाव भी अधिक क्षेत्रों में हो जाता है। पहले लेह के किसान केवल कुछ ही सामान्य कीटों, जैसे एफिड्स और गोभी पर लगने वाली तितलियों की शिकायत करते थे, लेकिन अब लगभग रोज ही विभिन्न प्रकार के कीटों की शिकायतें आने लगी हैं।” इनमें से अधिकांश कीट इस क्षेत्र के लिए पूरी तरह नए नहीं हैं, लेकिन गर्म होती परिस्थितियां उनके तेज प्रजनन को बढ़ावा देती हैं, जिससे कभी-कभी बड़े पैमाने पर प्रकोप जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं। कीटों के वितरण पैटर्न में भी बदलाव देखा गया है।
लगभग 2005-06 के आसपास कारगिल में प्याज की मक्खी (ओनियन मैगॉट) के संक्रमण की रिपोर्टें मिली थीं। लामो कहती हैं, “आज कारगिल, लेह की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक गर्म हो गया है और अब वह क्षेत्र प्याज की मक्खी के लिए अनुकूल नहीं रह गया। इसके बजाय यह कीट अब लेह और यहां तक कि चांगथांग क्षेत्र में भी अधिक सामान्य हो गया है, जो इसके फैलाव में एक स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है।”
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार, भारत में 2026 की सर्दी यानी जनवरी और फरवरी असामान्य रूप से ठंड के अभाव के साथ बीती। डाउन टू अर्थ द्वारा आईएमडी के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि परिस्थितियां सामान्य से कितनी भिन्न रहीं।
आईएमडी “कोल्ड डे” यानी शीत दिवस को उस दिन के रूप में परिभाषित करता है जब अधिकतम तापमान औसत से 4.5 डिग्री सेल्सियस से 6.4 डिग्री सेल्सियस तक कम हो। आईएमडी के मुताबिक, औसत अधिकतम तापमान से 6.4 डिग्री सेल्सियस से अधिक की कमी को “गंभीर ठंडा दिन” माना जाता है। कोल्ड वेव यानी शीत लहर तब घोषित की जाती है जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री सेल्सियस से 6.4 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाए और जब यह गिरावट 6.4 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक हो तो उसे “गंभीर शीत लहर” कहा जाता है।
फरवरी में भारत में एक भी ठंडा दिन या शीत लहर दर्ज नहीं की गई। यह हाल के वर्षों से एक स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है। डाउन टू अर्थ के विश्लेषण के अनुसार, फरवरी 2022 में छह शीत लहर वाले दिन, 2023 में एक, 2024 में सात और 2025 में पांच दिन दर्ज किए गए थे। 27 जनवरी को आखिरी ऐसी घटना दर्ज होने के बाद, फरवरी 2026 पिछले पांच वर्षों में पहली बार रही जब कोई शीत लहर दर्ज नहीं हुई।
2026 की सर्दी 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 24 ठंडे दिन या शीत लहर की घटनाओं के साथ समाप्त हुई, जो पिछले पांच वर्षों में दूसरा सबसे कम मौसमी आंकड़ा रहा है। 2023 में 21 दिन दर्ज किए गए थे। यह संख्या 2024 में दर्ज 38 दिनों के उछाल से काफी कम है और 2022 के 30 तथा 2025 के 26 दिनों से भी नीचे है। ठंड की तीव्रता का भौगोलिक वितरण भी बदल रहा है।
2022 से 2026 के बीच शीत लहरें मुख्य रूप से उत्तर, उत्तर पश्चिम और मध्य भारत तक सीमित रहीं, हालांकि चाहे सर्दी की अवधि रही हो या मॉनसून के बाद की अवधि दोनों सीजन में उनका विस्तार हर वर्ष बदलता रहा है। 2022 में 14 राज्यों में सर्दी के 59 दिनों में से 30 दिनों पर शीत लहर दर्ज की गई, जबकि दक्षिणी और दक्षिण पूर्वी भारत में इसका कोई प्रभाव नहीं देखा गया। 2023 में इसका दायरा बढ़कर 17 राज्यों तक पहुंच गया, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक है, हालांकि शीत लहर वाले दिनों की संख्या घटकर 21 रह गई। दक्षिण में तेलंगाना में दो और कर्नाटक में चार दिन ऐसे प्रभावित मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं।
2024 में सर्दी के 60 दिनों में से ठंडे दिन या शीत लहर वाले दिन बढ़कर 38 हो गए, लेकिन यह केवल 13 राज्यों तक सीमित रहे और फिर से दक्षिणी और दक्षिण पूर्वी क्षेत्रों को इसमें शामिल नहीं किया गया। 2025 में इसका दायरा और सिकुड़कर केवल नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक रह गया, जिसमें तेलंगाना एकमात्र दक्षिणी राज्य था जहां एक ही दिन शीत लहर दर्ज की गई।
2026 में शीत लहरों का भौगोलिक विस्तार फिर से बढ़कर 15 राज्यों तक पहुंच गया, जो 2023 के बाद दूसरा सबसे अधिक है और इस बार कर्नाटक एकमात्र दक्षिणी राज्य रहा जो प्रभावित हुआ। यह पैटर्न दर्शाता है कि शीत लहरों का दक्षिणी हिस्सों में असर कभी कभार हुआ लेकिन सीमित रहा, जबकि उनका मुख्य स्वरूप उत्तर केंद्रित ही बना रहा। हालांकि आईएमडी जनवरी और फरवरी को सर्दी के रूप में वर्गीकृत करता है, लेकिन शीत लहर की स्थितियां आमतौर पर नवंबर में शुरू होती हैं और दिसंबर तक जारी रहती हैं, जो दोनों आधिकारिक रूप से मॉनसून के बाद की ऋतु का हिस्सा होते हैं। फिर भी आईएमडी द्वारा वर्गीकृत सर्दी के महीनों में ही ठंडे दिनों और शीत लहर की अधिकांश घटनाएं दर्ज होती हैं।
मिसाल के तौर पर, सर्दियों का योगदान 2022 में 65 फीसदी, 2023 में 72 फीसदी और 2024 में 67 फीसदी रहा, जबकि मॉनसून के बाद के महीनों का हिस्सा 28 से 35 फीसदी के बीच सीमित बना रहा।
साल 2022 से 2026 तक डाउन टू अर्थ द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि शीत लहर की घटनाएं अब केवल मुख्य सर्दी के महीनों तक सीमित नहीं रह गई हैं। 2025 में मॉनसून के बाद के मौसम में इसमें तेज वृद्धि देखी गई, जिसका कारण नवंबर में मौसम का जल्दी और व्यापक रूप से ठंडा होना रहा।
समय में इस बदलाव के साथ-साथ भौगोलिक फैलाव का बढ़ना या घटना यह संकेत देता है कि भारत में अत्यधिक ठंड की घटनाओं के स्वरूप में लगातार बदलाव और अस्थिरता बढ़ रही है। 34 शहरों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान के विश्लेषण से यह स्पष्ट प्रवृत्ति सामने आती है कि जनवरी से मार्च के बीच अधिकांश समय मौसम गर्म बना रहा। अगर पुदुचेरी को छोड़ दें जहां के आधारभूत सामान्य आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं तो सभी शहरों में दिन और रात दोनों समय तापमान मुख्य रूप से सामान्य से अधिक रहा। एक जनवरी से 17 मार्च के बीच 23 शहरों में कम से कम आधे दिनों में अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया गया था, जबकि 30 शहरों में कम से कम आधे दिनों में न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक रहा।
यह विश्लेषण एक स्पष्ट रुझान दिखाता है कि जनवरी से मार्च तक विभिन्न शहरों में तापमान लगातार सामान्य से अधिक रहा, जो देश के कई हिस्सों में गर्मी जैसे मौसम की जल्दी शुरुआत और वसंत ऋतु के स्पष्ट रूप से सिकुड़ने का संकेत देता है। परंपरागत रूप से चरम गर्मी से जुड़े तापमान समय से पहले ही महसूस किए गए और मौसम के बदलते महीनों तक बने रहे। सर्दी के दौरान जिन 10 शहरों में अधिकतम तापमान अक्सर सामान्य से अधिक रहता है, वहां सामान्य दिन अब असामान्य बन गए हैं।
यह रुझान देशव्यापी यानी श्रीनगर और शिमला जैसे पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर पणजी जैसे उष्णकटिबंधीय तटीय शहर तक देखा जा सकता है। हिमालय के 10 शहरों में ठंड कम हो गई और रातें अक्सर दिनों की तुलना में अधिक गर्म रही, जो ऐतिहासिक सामान्य से अलग है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में गर्मी अचानक बढ़ी, जिसमें तापमान में असाधारण उछाल देखे गए जो ऐतिहासिक आंकड़ों से परे थे।
अरुणाचल प्रदेश के इटानगर शहर में 13 जनवरी की रात न्यूनतम तापमान 17.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि सामान्य तापमान 9.8 डिग्री सेल्सियस होता है। हिमाचल प्रदेश के शिमला में 12 जनवरी को तापमान में बड़े बदलाव देखे गए, जिसमें अधिकतम तापमान 17.2 डिग्री सेल्सियस रहा, जबकि सामान्य 11.7 डिग्री सेल्सियस होता है और उस दिन और अगले दिन न्यूनतम तापमान 8.8 डिग्री सेल्सियस रहा जबकि सामान्य 2.9 डिग्री सेल्सियस होता है।
16 जनवरी तक इस पहाड़ी स्टेशन का अधिकतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य 11 डिग्री सेल्सियस से काफी ऊपर था। यह असमानता फरवरी और मार्च तक बनी रही। चार मार्च को अधिकतम और न्यूनतम तापमान क्रमशः 24.1 और 13.6 डिग्री सेल्सियस रहे, जबकि सामान्य तापमान 15.2 और 6.1 डिग्री सेल्सियस था।
छह मार्च को अधिकतम तापमान सामान्य से 10.1 डिग्री सेल्सियस अधिक और न्यूनतम 9.3 डिग्री सेल्सियस अधिक था और 11 मार्च तक तापमान 23 से 24 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहा।
पारंपरिक सर्दियों के चरम समय में, हिमाचल प्रदेश में पिछले पांच वर्षों में सबसे जल्दी हीटवेव आया। राज्य में छह मार्च को “हीटवेव” से लेकर “गंभीर हीटवेव” की स्थितियां दर्ज की गईं। पहली बार ऐसा हुआ कि मार्च के पहले सप्ताह में लगातार इतना अधिक तापमान दर्ज किया गया।
यदि बीते कुछ वर्षों से इस स्थिति की आंकड़ों में तुलना की जाए तो 2025 में पहला हीटवेव एक महीने बाद, छह अप्रैल को आया था। 2024 में 19 मई को, जो करीब 74 दिन बाद था। वहीं, 2023 में कोई हीटवेव नहीं आया और 2022 में गर्मी का दौर 16 मार्च से शुरू हुआ, जो 2026 की तुलना में 10 दिन बाद था।
शिमला के रहने वाले 79 वर्षीय देशबंधु सूद बताते हैं कि राज्य में सर्दियां छोटी और कम ठंड वाली होती जा रही हैं। वह कहते हैं, “बीस साल पहले भी लोग अप्रैल तक गर्म कपड़े पहनते थे। अब अक्सर सर्दियों के कपड़े मार्च के दूसरे सप्ताह तक ही रखे जाते हैं।”
शिमला की ही रहने वाली सुदेश कुमारी कहती हैं कि पहले सर्दियां कड़ी होती थीं, पानी जम जाता था, सड़कें कई दिन बंद रहती थीं और बिजली गुल होना आम बात थी। वह कहती हैं, “इस साल की सर्दी, जिसमें बर्फबारी बहुत कम हुई, ऐसा लगा जैसे तीस साल पहले का मई या जून हो।”
सिकुड़ती हुई सर्दी अब रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगी है। सुदेश बताती हैं, “कड़ी सर्दी से बचने के लिए लोग पहले ऊंचाई वाले क्षेत्रों से मैदानों की ओर चले जाते थे।” यह प्रथा अब लगभग खत्म हो गई है। वहीं, कई पहाड़ी क्षेत्रों में लोग अब पंखे, एसी और फ्रिज जैसी ठंडक देने वाली वस्तुओं पर निर्भर होने लगे हैं जबकि ऐसे उपकरण पहले इन ऊंचाई वाले इलाकों में आम नहीं थे।
हिमाचल प्रदेश में जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख जैसी ही प्रवृत्तियां दिखाई दे रही हैं। सर्दियों में बारिश और बर्फबारी कम हो गई है। आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार हाल के वर्षों में इसका बड़ा अंतर रहा है। 2010 में सर्दियों की बारिश सामान्य से 46 प्रतिशत कम, 2011 में 28 प्रतिशत, 2016 में 70 प्रतिशत और 2018 में 71 प्रतिशत कम रही।
इस कमी का असर 2021 में 70 प्रतिशत, 2023 में 38 प्रतिशत, 2024 में 42 प्रतिशत और 2025 में 26 प्रतिशत रहा, जबकि जनवरी 2026 पहले ही सामान्य से 11 प्रतिशत कम था। दीर्घकालिक रिकॉर्ड बताते हैं कि 2010 के बाद से जनवरी में 11 वर्षों में बारिश सामान्य से कम रही, जिससे सर्दियों की स्थिरता और बर्फबारी पर सीधे असर पड़ा है।
कृषि विभाग के निदेशक रविंद्र सिंह जस्रोटिया के अनुसार, इस साल लंबी शुष्क अवधि के कारण पहले ही 11 करोड़ रूपए की फसल को नुकसान हुआ। बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि फल देने वाले पौधे अब तक बड़े पैमाने पर नुकसान से बच गए हैं, लेकिन यदि अत्यधिक गर्मी और सूखा जारी रहा तो फसलों की पैदावार घट सकती है और पौधों की कीटों और रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है।
सूखी और गर्म सर्दी ने रीना देवी की जिंदगी को संकट में डाल दिया है। उत्तराखंड के चमोली जिले के नौराख गांव की 22 वर्षीय रीना कहती हैं, “मैं आमतौर पर हर साल करीब 50 किलो गेहूं की फसल काटती हूं। इस साल 5 से 10 किलो भी पाना मुश्किल होगा।” वह आगे कहती हैं, “उपलब्ध थोड़े गेहूं को बीज के लिए रखना होगा, इसलिए रोटियां बनाने के लिए मुझे आटा खरीदना पड़ेगा।” वह अपने पांच खेतों में से दो में गेहूं उगाती हैं, जिनमें से प्रत्येक लगभग बैडमिंटन कोर्ट के आकार का है। वह बताती हैं, “हमने नवंबर और दिसंबर में बारिश का इंतजार किया। आखिर में इंतजार से थककर दिसंबर में गेहूं की बुआई करनी पड़ी। यहां तक कि जनवरी असामान्य रूप से गर्म थी और बारिश केवल अंतिम सप्ताह में हुई तब तक फसल का अधिकांश हिस्सा सूख चुका था।” रीना के खेतों में गेहूं पूरी तरह से बारिश पर निर्भर करता है। फरवरी में कभी-कभार हुई बौछारों से कुछ राहत मिली, लेकिन सूखे दिन अब भी अधिक थे।
रीना देवी के पति दिलवर लाल, दैनिक मजदूरी करते हैं और आमतौर पर उन्हें महीने में 10 से 15 दिन ही काम मिल पाता है। सर्दियों के दौरान रीना अपने घर और दो गायों के लिए ईंधन और चारा इकट्ठा करती हैं, कभी-कभी परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए ईंधन बेचती हैं। उनके अधिकतर सब्जी और अनाज उनके खेतों से आते हैं। इस साल यह संतुलन पूरी तरह से बदल गया है। देहरादून के आईएमडी निदेशक चंदर सिंह तोमर कहते हैं, “हमने पूर्वानुमान लगाया था कि राज्य में अक्टूबर से फरवरी तक तापमान सामान्य से ऊपर रहेगा। मैदानों की तुलना में पहाड़ी जिले काफी गर्म रहे।” जनवरी और फरवरी के दौरान ऊंचाई वाले जिलों में औसत तापमान सामान्य से 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जबकि मैदानों में 2 से 3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी देखी गई। उन्होंने चेतावनी दी, “इसका मतलब यह नहीं कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड टूट गए हैं।”
रीना देवी की तरह, कई छोटे किसान गर्म सर्दी के कारण फसल नुकसान की रिपोर्ट कर चुके हैं। इस मुद्दे को उत्तराखंड की गढ़वाल की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में बजट सत्र में उठाया गया। 2016 की 13 मार्च को विधायक प्रीतम सिंह पंवार ने अक्टूबर 2025 से मार्च 2026 तक कम बारिश के कारण फसल नुकसान पर ध्यान दिलाया। सरकार ने उन किसानों को मुआवजा देने का वादा किया, जिनकी फसल का एक तिहाई से अधिक हिस्सा नष्ट हो गया।
इस बीच, राज्य की पहाड़ियों में जंगल की आग मौसम से असामान्य रूप से जल्दी फैल गई। एक नवंबर 2025 से 14 फरवरी 2026 के बीच, राज्य वन विभाग ने 54 आग की घटनाएं दर्ज कीं, जिससे लगभग 42 हेक्टेयर जंगल यानी लगभग 60 फुटबॉल मैदान के बराबर जंगल प्रभावित हुए।
जैसे-जैसे तापमान बढ़ता गया, 15 फरवरी से 14 मार्च के बीच और 60 आग की घटनाएं दर्ज हुईं, जो लगभग समान क्षेत्र को प्रभावित कर रही थीं। उत्तराखंड वन विभाग ने 15 फरवरी से 20 अप्रैल तक आग की कुल 135 घटनाएं दर्ज की हैं, जिसमें 77.17 हेक्टेअर वन क्षेत्र आग से प्रभावित हुआ है। नौराख गांव के पास के जंगल सर्दियों में धुएं से ढक गए थे। रीना देवी इस बात की तस्दीक करती हैं कि पास के जंगल जनवरी में कई दिनों तक जलते रहे।
मौसमी दृष्टिकोण से देखा जाए तो जंगल की आग न केवल सामान्य से पहले लगी हैं, बल्कि पूरे भारत में अधिक व्यापक रूप से फैल गई हैं। डाउन टू अर्थ के विश्लेषण से पता चलता है कि 2026 की सर्दियों (जनवरी-फरवरी) में जंगल की आग पिछले दशक की तुलना में 80 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई है। जंगलों वाले क्षेत्रों में इस वर्ष आग की गतिविधि 2024 की तुलना में 50 प्रतिशत से अधिक रही, जो अब तक का सबसे गर्म वर्ष था।
पूर्वोत्तर भारत में सबसे तीव्र आग की घटनाएं दर्ज की गईं। फरवरी में अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के बड़े हिस्से एक सप्ताह तक आग की चपेट में रहे, जिसके कारण भारतीय वायु सेना को उच्च हिमालयी इलाकों में लगातार हवाई अग्निशमन करना पड़ा। 2,800 मीटर से अधिक ऊंचाई पर पानी छिड़कने के लिए हेलीकॉप्टर तैनात किए गए। अरुणाचल प्रदेश की लोहित घाटी में आग को नियंत्रित करने के लिए 12,000 लीटर से अधिक पानी डाला गया। राज्य में आग 13 फरवरी से शुरू हुई, कई क्षेत्रों को प्रभावित किया और कुछ स्थानों पर लोगों को खाली करने के लिए मजबूर होना पड़ा। स्थानीय मीडिया ने बताया कि भारतीय सेना के जवानों ने वायु सेना की टीमों के साथ मिलकर अंजाव जिले के दूरदराज इलाकों में, 900 से 1,060 मीटर ऊंचाई पर लगी आग को काबू करने में मदद की।
अरुणाचल प्रदेश में जनवरी से मार्च तक असामान्य रूप से गर्म और सूखी सर्दी रही। निवासियों ने कम बारिश, लगभग शून्य मिट्टी की नमी और घटते जल स्रोतों की शिकायतें की। वहीं, पासीघाट के उप-प्रभागीय बागवानी अधिकारी ओयिन तायेंग कहते हैं, “यह सर्दी सामान्य से अधिक गर्म महसूस हुई। आमतौर पर हम पीछे हटते मॉनसून से सितंबर और अक्टूबर में बारिश पाते हैं लेकिन इस साल बहुत कम वर्षा हुई।”
जहां कुछ सूखा रोधी फसलें बच गईं, वहीं पारंपरिक बागवानी फसलों को भारी नुकसान हुआ। तेयांग कहते हैं कि कुछ बागों में सूखापन शुरू हो गया है और हानिकारक कीटों की संख्या काफी बढ़ गई है।
उनका मानना है कि मौसमी पैटर्न बदल रहे हैं। वह कहते हैं, “पहले सर्दी लगभग मध्य नवंबर में शुरू होती थी। अब यह लंबे समय तक गर्म महसूस होती है।” सियांग जिले के किसान डुबिट सिराम सहमति में कहते हैं, “यह सर्दी सामान्य से बहुत अधिक गर्म थी। जनवरी से मार्च तक तापमान पिछले वर्षों की तुलना में लगभग 3 से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक महसूस हुआ।”
संतरा, केला और इलायची जैसी मुख्य फसलें प्रभावित हुईं और कुछ क्षेत्रों में पीने के पानी की कमी हो गई। नदियों और प्राकृतिक झरनों पर निर्भर नुकुंग गांव में कई जलस्रोत इस सर्दियों में सूख गए।
पारंपरिक रूप से झूम या स्थानांतरित खेती करने वाले मिश्मी जनजाति के प्रमुख उपसमूह कामान और ताराओन अपने खेतों को तैयार करने के लिए नियंत्रित आग लगाते हैं। इस सर्दी में असामान्य रूप से सूखी वनस्पति के कारण इन आगों में से कुछ नियंत्रण से बाहर फैल गईं और जंगल की आग में बदल गईं।
मैदानों में भी सर्दी की गैरमौजूदगी का एहसास उतना ही स्पष्ट है। पंजाब के संगरूर जिले के बिशनपुरा खोखर गांव के किसान मलकित सिंह कहते हैं, “इस साल हमें यह मुश्किल से भी महसूस नहीं हुआ कि सर्दी कब आई और कब खत्म हुई।” वह आगे कहते हैं, “जनवरी में थोड़ी ठंड आई, लेकिन फरवरी के दूसरे सप्ताह तक तापमान बढ़ने लगा। यह तत्काल ही समस्या पैदा करता है। वह कहते हैं, “अगर फरवरी और मार्च में तापमान बहुत बढ़ गया, तो गेहूं की पैदावार कम हो जाती है।” उनके पड़ोसी गुरप्यर सिंह भी इसी चिंता को साझा करते हैं, “पिछले साल पैदावार लगभग 2,500 से 2,600 किलोग्राम प्रति एकड़ (0.4 हेक्टेयर) रही। इस बार 10 प्रतिशत की कमी की आशंका है।”
पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी में एग्रोमेट्रोलॉजी की प्रोफेसर पवनीत कौर किंगरा इस बदलाव को मौसम में बढ़ती अस्थिरता से जोड़ती हैं। वह कहती हैं, “फरवरी के मध्य और मार्च तक, पश्चिमी विक्षोभ प्रणाली विकसित नहीं हुई, जिससे आसमान साफ रहा और तापमान बढ़ा। मार्च में तापमान सामान्य से लगभग 5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।”
पंजाब में फरवरी के दौरान तापमान औसत से काफी ऊपर रहा, जबकि बारिश सामान्य से 98 प्रतिशत कम हुई। भारतीय किसान यूनियन (भगत सिंह) के प्रवक्ता तेजबीर सिंह कहते हैं, “फरवरी में 20 से 25 दिनों तक तापमान सामान्य से अधिक रहा। मार्च के पहले दो सप्ताह में लगभग 10 दिन हीटवेव जैसी स्थितियों वाले रहे। कुल मिलाकर, 60 प्रतिशत से अधिक दिन सामान्य से गर्म रहे।”
वहीं, बिहार में, जहां सर्दी आमतौर पर दिसंबर से फरवरी तक रहती है और जनवरी सबसे ठंडा महीना होता है, इस साल मौसम अस्थिर रहा। जनवरी 2026 के दूसरे सप्ताह में 30 जिलों में शीतलहर की स्थितियां बनी रहीं। फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत तक तापमान तेजी से बढ़ गया। आईएमडी के अनुसार, राज्य के कुछ हिस्सों में फरवरी के अंत तक अधिकतम तापमान लगभग 32 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। विशेषज्ञों के अनुसार, उस समय साल में 30 डिग्री सेल्सियस पार करना आमतौर पर यह संकेत देता है कि सर्दी सामान्य से पहले खत्म हो रही है।
मुजफ्फरपुर जिले में गायघाट ब्लॉक के 90 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक राजेंद्र झा कहते हैं कि सर्दियों की अवधि अब सिकुड़ती नजर आती है। वह कहते हैं, “अब यह दिसंबर में शुरू होती है और जनवरी के अंत तक खत्म हो जाती है।” 90 मौसमी चक्रों को देखने चुके वयोवृद्ध झा हल्की सर्दियों और गर्मियों के जल्दी आगमन को बदलते मौसम के स्पष्ट संकेत के रूप में देखते हैं। कई लोगों के लिए यह बदलाव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है।
वैशाली जिले के पाटेपुर के निवासी महावीर प्रसाद कहते हैं, “तीन फरवरी के आसपास अचानक मौसम बदलने के बाद मेरी सेहत बिगड़ गई। मुझे खांसी हुई, पैरों में सूजन आई और खाने को पचाने में दिक्कत हुई। दिन बहुत ही गर्म महसूस होते हैं जबकि रातें ठंडी हो जाती हैं। यह लगातार बदलाव मुझे बहुत प्रभावित कर रहा है।”
राज्य में फरवरी और मार्च में अचानक तापमान बढ़ने से सर्दियों की फसलों की अवधि भी प्रभावित हुई है। आलू की कटाई में देरी हुई, जबकि सरसों या तो बहुत जल्दी पक गई या अधपकी रह गई, जिससे पैदावार कम हुई। किसानों के लिए इसका मतलब अक्सर एक साल की आय का नुकसान होता है। बिहार मौसम विज्ञान सेवा केंद्र के संयुक्त निदेशक प्रभु सी एन कहते हैं, “हमने कृषि संबंधी सलाह जारी की है और दैनिक मौसम अपडेट प्रदान कर रहे हैं ताकि किसान और संबंधित विभाग उचित कार्रवाई कर सकें।”
थार रेगिस्तान का घर कहे जाने वाले राजस्थान में भी सर्दियों के अंत में आमतौर पर भेड़ की ऊन काटने का काम होता है, जो इस पशुपालन पर निर्भर राज्य की महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है। हालांकि, इस साल दिन के समय गर्म और रात के समय ठंड के कारण तापमान में उतार-चढ़ाव ने चरवाहों के लिए बड़ी समस्याएं पैदा कर दी हैं। जिन भेड़ों के ऊन काट लिए गए हैं उन्हें ठंडी रातों में निमोनिया प्रभावित कर रहा है, जबकि जिन भेड़ों में ऊन काटा जाना अभी बाकी हैं, वे दिन के समय में गर्मी से बीमार पड़ रही हैं।
जैसलमेर के पर्यावरणविद चतर सिंह जाम कहते हैं, “पश्चिमी राजस्थान में सर्दी आमतौर पर 10 से 15 नवंबर के आसपास शुरू होती थी, लेकिन इस साल यह केवल 15 से 16 दिसंबर के आसपास शुरू हुई। वहीं, मध्य जनवरी तक 20 से 25 दिन की तीव्र ठंड रही और जमीन ऐसे सफेद हो गई जैसे उस पर नमक छिड़का गया हो। ठंड ने खेजड़ी और केर जैसे पेड़ों को भी नुकसान पहुंचाया। लेकिन मध्य जनवरी तक ठंड लगभग समाप्त हो गई और मार्च की शुरुआत तक तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।”
ठंडे दिनों की संख्या घट गई है, जबकि सर्दियों में गर्म दिनों की संख्या बढ़ गई है। जाम आगे कहते हैं, “बढ़ता तापमान खड़ीन यानी पारंपरिक वर्षा जल संचयन वाले खेतों को भी सुखा देता है, जिससे फसल की वृद्धि प्रभावित होती है। हम इसे फसल को प्यास लगना कहते हैं। किसान उचित तापमान का इंतजार करते हुए बुआई में अक्सर देरी कर देते हैं फिर इस बार अचानक आए तीव्र ठंड के कुछ दिनों ने सरसों और चना जैसी फसलों को भी नुकसान पहुंचाया है।”
जोधपुर स्थित सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट में इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम डिवीजन के प्रमुख धीरज सिंह बताते हैं कि रबी की फसलें सटीक मौसमीय परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। वह कहते हैं, “बुवाई से लेकर अंकुरण और अनाज विकास तक यदि फसलें सही तापमान और पर्याप्त वायुमंडलीय नमी नहीं पातीं हैं तो पैदावार 25 से 30 फीसदी तक घट सकती है।” वह बताते हैं कि गर्मी की जल्दी शुरुआत फसलों को दबाव में डालती है, जिससे फसलें जीवित रहने के लिए समय से पहले फूलने लगती हैं और इसके परिणामस्वरूप पैदावार और गुणवत्ता दोनों घट जाती हैं। इस साल, छोटी सर्दी और जल्दी बढ़ती गर्मी के कारण गेहूं, सरसों और चना में इस तरह के प्रभाव व्यापक रूप से देखे गए हैं।
जयपुर मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक राधेश्याम शर्मा कहते हैं कि शीतलहर के दिनों की संख्या जो आमतौर पर एक मौसम में 10 से 12 होती है, वह इस साल लगभग समान रही। लेकिन प्रत्येक शीतलहर की अवधि कम थी, केवल दो से तीन दिन, जबकि पहले चार से पांच दिन होती थी। वह इसे आंशिक रूप से पहाड़ों में कम बर्फबारी से जुड़ी हवा के पैटर्न में बदलाव का परिणाम मानते हैं। शर्मा कहते हैं, “हमारे क्षेत्र में सर्दी पश्चिमी विक्षोभ और हिमालयी बर्फबारी पर भारी निर्भर करती है। हाल के वर्षों में, विशेषकर फरवरी और मार्च में, राजस्थान में तापमान लगातार सामान्य से ऊपर रहा है। सर्दी पहले खत्म हो रही है और गर्मी जल्दी आ रही है।”
भारत की असामान्य रूप से गर्म सर्दी और जल्दी आने वाली गर्मी अब पौधों और जानवरों के व्यवहार को बदल रही है, जिससे बदलते मौसम के दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ रही है। हिमालय में यह प्रभाव सबसे स्पष्ट है, जहां फूलने, प्रजनन और प्रवासन के प्राकृतिक चक्र बाधित हो रहे हैं।
कश्मीर यूनिवर्सिटी के वनस्पतिशास्त्री मंजूर शाह कहते हैं कि गर्म सर्दी के कारण कई प्रजातियों में फूल आने की शुरुआत जल्दी हो गई है, जो सामान्यतः बाद में खिलती हैं। इनमें विवर्नम रैंडिफोरम, आइरिस रेटिकुलाटा और नार्सिसस व स्टर्नबर्गिया की प्रजातियां शामिल हैं।
विश्वविद्यालय ने कई वर्षों से 200 से अधिक प्रजातियों की निगरानी की है ताकि मौसमी जैविक घटनाओं जैसे फूलों के खिलने, प्रजनन और प्रवासन के समय और उनकी कार्यात्मक विशेषताओं का अध्ययन किया जा सके। मंजूर शाह कहते हैं कि अब फूलने का समय सामान्य से लगभग 20–25 दिन पहले हो रहा है।
ऐसे बदलावों के व्यापक पारिस्थितिक परिणाम हो सकते हैं। मधुमक्खियों जैसी परागकण करने वाले जीवों को अपनी गतिविधि के समय निर्धारण के लिए मौसमी संकेतों पर निर्भर रहना पड़ता है। शाह बताते हैं, “जल्दी फूल खिलने का मतलब है कि मधुमक्खियां और अन्य परागकणकर्ता अभी सक्रिय नहीं हैं।” वह समझाते हैं कि इस असंगति के कारण फूल जल्दी झड़ सकते हैं, जिससे परागकणकर्ताओं के लिए शहद और भोजन कम हो जाता है, जो मृत्यु दर बढ़ाने और दीर्घकालिक जनसंख्या में गिरावट का कारण बन सकता है।
मध्य भारत में भी पक्षी विज्ञानियों ने बताया कि बढ़ता तापमान पक्षियों के घोंसले बनाने और प्रजनन पैटर्न को प्रभावित कर रहा है। पुणे के पक्षी वैज्ञानिक और एला फाउंडेशन के निदेशक सतीश पांडे कहते हैं कि जनवरी से मार्च आमतौर पर कई पक्षियों का प्रजनन मौसम होता है, जिसमें बाज और अन्य शिकारी पक्षी जैसे बोनैली ईगल और शॉर्ट-टोएड स्नेक ईगल शामिल हैं। वह कहते हैं, “सामान्य तौर पर घोंसला बनाना दिसंबर के आसपास शुरू होता है। इस साल हमने देखा कि यह प्रक्रिया जनवरी के अंत तक स्थगित रही।”
ऐसी देरी के प्रभाव व्यापक हो सकते हैं। यदि अंडे सामान्य समय से बाद में फूटते हैं तो चूजे सबसे गर्म मौसम में निकल सकते हैं। पांडे चेतावनी देते हैं कि इससे अंडे फूटने की प्रक्रिया मार्च के अंत तक खिंच सकती है, जब कई क्षेत्रों में तापमान चरम गर्मी के स्तर के करीब पहुंच जाता है।
वहीं, फ्लेम-ऑफ-द-फॉरेस्ट और रेड सिल्क-कॉटन जैसे पेड़ भी जल्दी खिल गए हैं। इनका मार्च में ही खिलना शुरू हो गया, जबकि आमतौर पर यह अप्रैल में होता है। अंडों के फूटने तक, फूल पहले ही झड़ सकते हैं, जिससे वयस्क पक्षियों और उनके बच्चों के लिए भोजन की उपलब्धता कम हो जाती है। कई क्षेत्रों में जलाशय भी सामान्य से पहले सूख रहे हैं, जिससे वे स्थायी और प्रवासी पक्षियों के लिए कम अनुकूल हो रहे हैं। कुछ प्रवासी पक्षियों ने पहले ही प्रस्थान करना शुरू कर दिया है, और इस महत्वपूर्ण समय में भोजन और पानी की कमी चिंता बढ़ा रही है।
पांडे कहते हैं, “पक्षी प्यासे और थके हुए रहते हैं। हाल के दिनों में हमने ऐसे ही पक्षियों की मदद की है, जिसमें इंडियन रॉबिन, टेलरबर्ड, हाउस स्पैरो, बुलबुल, ग्रे फ्रैंकोलिन और क्वेल आदि शामिल हैं।” मानव गतिविधियों के कारण उत्पन्न शुरुआती जंगल की आग ने समस्या को और बढ़ा दिया है। पांडे के अनुसार, इस साल सामान्य से पहले रिपोर्ट की गई आग ने जमीन पर घोंसला बनाने वाले पक्षियों जैसे लार्क, चील, उल्लू के घोंसलों को नष्ट कर दिया, जिनके अंडे अभी फूटने का इंतजार कर रहे थे।
अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट की कंजर्वेशन साइंटिस्ट मधुश्री मुडके बताती हैं कि महाराष्ट्र में क्षेत्रीय अवलोकनों से संकेत मिलता है कि उभयचर जीव बढ़ती गर्मी से निपटने के लिए अपने व्यवहार में बदलाव करने लगे हैं।
नवंबर 2025 में सिंधुदुर्ग जिले के दौरे में उन्होंने और उनके साथियों ने पाया कि इंडिराना प्रजाति के मेंढक गुफाओं में शरण ले रहे थे। वह कहती हैं, “बाहर का तापमान लगभग 28 डिग्री सेल्सियस था, जबकि उनके लिए आरामदायक तापमान करीब 22 डिग्री सेल्सियस होता है।”
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बढ़ता तापमान उन विशेष प्रजातियों के लिए हानिकारक हो सकता है, जो ताप और नमी की स्थिर परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। उभयचर जीवों की पारगम्य त्वचा उन्हें पर्यावरणीय बदलाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। मुडके कहती हैं, “यह जीव अपने शरीर का तापमान नियंत्रित करने के लिए पर्यावरण की नमी पर निर्भर रहते हैं। साथ ही हीटवेव उनके शरीर की कार्यप्रणाली और व्यवहार को तेजी से प्रभावित कर सकती है।”
नवंबर में भी इस क्षेत्र के सदाबहार जंगलों में बहुत कम बारिश हुई। इसके परिणामस्वरूप कई उभयचर जीव जीवित रहने की स्थिति में चले गए और ठंडी जगहों, जैसे घने पेड़ों की छाया या छोटी गुफाओं में शरण लेने लगे। उनकी टीम ने सिंधुदुर्ग में सूखे मौसम के दौरान कई प्रजातियों को गुफाओं का उपयोग करते हुए दर्ज किया। फरवरी में चोरला घाट के दौरे में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया।
राजस्थान के कृषि विभाग के कीट विज्ञान विभाग में अनुसंधान अधिकारी अभिषेक पारीक बताते हैं कि असामान्य रूप से अधिक तापमान ने सरसों के एफिड जैसे कीटों की बड़ी संख्या को भी खत्म कर दिया है, जो आमतौर पर सरसों की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। इस मौसम में तापमान सामान्य से लगभग 3 से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। वह कहते हैं, “इससे सरसों की फसल को फायदा हुआ क्योंकि कीटों से होने वाला नुकसान कम हो गया। पूरी एक पीढ़ी के एफिड इस गर्मी में जीवित नहीं रह पाई।”
हालांकि, इसके प्रभाव पूरी तरह सकारात्मक नहीं हैं। कई अन्य कीट एफिड पर भोजन के लिए निर्भर होते हैं। जब खाद्य श्रृंखला की यह कड़ी टूटती है, तो उन प्रजातियों पर भी असर पड़ता है। पारीक कहते हैं, “एफिड पर निर्भर रहने वाले प्राकृतिक शत्रु भी मर गए। उनके लिए भोजन ही उपलब्ध नहीं था।”