इलस्ट्रेशन: योगेन्द्र आनंद / सीएसई
जलवायु

डाउन टू अर्थ टिप्पणी: शुरुआत ही बेपटरी से

इस बात को लेकर कोई दो राय नहीं है कि सूखा आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से लगातार अधिक विनाशकारी होता जा रहा है

DTE Staff

सूखा अब एक वैश्विक पर्यावरणीय संकट के रूप में उभरकर सामने आया है। काफी समय तक इसे यदा-कदा और स्थानीय स्तर पर होने वाली घटना माना जाता था, लेकिन हालिया रुझानों से साफ है कि बदलती जलवायु और गर्म होते ग्रह में सूखा अब किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसके विपरीत, यह सारे महाद्वीपों में तेजी से फैल रहा है और बड़े भू-भागों का लगभग एक स्थायी हिस्सा बन रहा है।

साल 2025 में दुनिया ने 1950 के बाद से छठे सबसे अधिक सूखा प्रभावित वर्ष का सामना किया। मौसमी सूखे (नमी की गंभीर कमी) ने वैश्विक भूमि क्षेत्र के 30 प्रतिशत हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया। नेचर रिव्यूज अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित एक विश्लेषण का अनुमान है कि 1990 के दशक की तुलना में 2025 में इसका प्रभाव लगभग तीन गुना अधिक था। महत्वपूर्ण बात यह है कि अब केवल बारिश की कमी ही सूखे के पनपने का एकमात्र कारण नहीं रह गई है, वर्तमान में दुनिया को अपनी गिरफ्त में लेने वाली इन घटनाओं के निर्माण, प्रसार और प्रभावों में मूलभूत बदलाव देखे जा रहे हैं। इस विश्लेषण का परिणाम है कि 2025 का सूखा कोई इकलौती असामान्यता नहीं थी, बल्कि यह वर्ष 2000 के बाद से वैश्विक स्तर पर सूखे के व्यापक विस्तार का ही एक हिस्सा था, जिसे इसके बढ़ते बेसलाइन और बढ़ी हुई अंतर-वार्षिक परिवर्तनशीलता से पहचाना जा सकता है।

अब ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि और सूखे के लगातार रहने वाले दौर के बीच एक स्पष्ट और स्थापित संबंध है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने बढ़ते कृषि और पारिस्थितिकीय सूखे के लिए जलवायु परिवर्तन को ही उत्तरदायी ठहराया है। अध्ययन बताते हैं कि वायुमंडलीय वाष्पीकरण की मांग (जिसके कारण मिट्टी की नमी खत्म हो जाती है) ने 1901 के बाद से वैश्विक स्तर पर सूखे की गंभीरता को औसतन 40 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है। पूर्वानुमानों के अनुसार 2050 तक दुनिया भर में सूखे के कारण लगभग 32 लाख मौतें हो सकती हैं। हाल के वर्षों में दुनिया इस संकट के प्रति जागरूक होने लगी है। हालांकि इस बात पर कोई दो मत नहीं है कि सूखा आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से लगातार अधिक विनाशकारी होता जा रहा है, लेकिन इस संकट से लड़ने के लिए कोई एकीकृत वैश्विक सोच अथवा दृष्टिकोण नहीं है।

हालांकि मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (यूएनसीसीडी) के तहत एक वैश्विक सूखा ढांचे (ग्लोबल ड्राउट फ्रेमवर्क) पर सहमति बनाने का प्रयास जरूर किया जा रहा है। लेकिन इसमें प्रगति बेहद धीमी है। अगस्त 2026 में उलानबटोर में हुए यूएनसीसीडी के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप17) में पिछले दो वर्षों से चल रही बातचीत के बावजूद, सभी देश एक बार फिर इस ढांचे पर सहमत होने में विफल रहे। ड्राउट फ्रेमवर्क चाहे इसे एक कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रोटोकॉल के तौर पर अपनाया जाए या फिर स्वैच्छिक रूप से देशों को औपचारिक तौर पर प्रतिक्रियात्मक के बजाय सक्रिय सूखा प्रबंधन की दिशा में प्रेरित करेगा। साथ ही यह प्रत्येक पक्ष को अपनी राष्ट्रीय सूखा योजना विकसित करने, उसे अद्यतन करने और लागू करने में मदद करेगा। इसके तहत साझा अर्ली वार्निंग और निगरानी प्रणालियां स्थापित की जा सकेंगी जो न केवल बारिश बल्कि मिट्टी की नमी, संवेदनशीलता और जोखिमों को भी ट्रैक करने में सक्षम होंगी।

इसके अलावा यह देशों के बीच सूखे से जुड़े वैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक डेटा को साझा करने के माध्यम भी स्थापित करेगा। एक औपचारिक समझौते का अर्थ, सूखे के प्रति अनुकूलन क्षमता विकसित करने के लिए धन जुटाने और उसे सही दिशा में निर्देशित करने के लिए एक औपचारिक तंत्र का होना भी है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण है जब यूएनसीसीडी के अनुमान के अनुसार भूमि सुधार और सूखे से निपटने की तैयारी के लिए आवश्यक राशि और वर्तमान में किए जा रहे निवेश के बीच सालाना 278 अरब अमेरिकी डॉलर का भारी अंतर है।

लेकिन मुख्य रूप से अमेरिका और कुछ अन्य देशों का एक छोटा समूह इस प्रोटोकॉल का विरोध कर रहा है। अमेरिका का तर्क था कि सूखा मूल रूप से एक घरेलू, द्विपक्षीय या क्षेत्रीय मामला है न कि कोई ऐसा मुद्दा जिसके लिए किसी बहुपक्षीय साधन की आवश्यकता हो। वेटलैंड्स इंटरनेशनल के रिचर्ड ली ने कहा, “यह आश्चर्यजनक है कि दुनिया भर में सूखे से होने वाली आपदाओं की लगातार बढ़ती सूची के बावजूद, सरकारें सूखे से निपटने के किसी दृष्टिकोण पर सहमत होने में विफल रही हैं।” इस दौरान जो एकमात्र ठोस और संरचनात्मक निर्णय पारित हुआ, वह था सूखे को कॉप 18 और उसके बाद के प्रत्येक सामान्य सत्र में एक स्वतंत्र एजेंडा बनाना। इससे यह सुनिश्चित हो गया है कि भविष्य में इसे तदर्थ रूप से निपटाने जाने के बजाय सम्मेलनों के एजेंडे में एक स्थायी जगह मिलेगी।