आपदा के बाद नेपाल पुलिस का सर्च अभियान। फोटो: X@NepalPoliceHQ 
जलवायु

हिमालयी आपदाओं को जलवायु दायित्व मानते हुए क्षेत्रीय सहयोग, नो-गो जोन और न्यायपूर्ण मुआवजे की मांग

पीपल फॉर हिमालय ने 26 अगस्त की त्रासदी को जलवायु दायित्व का मामला बताते हुए सीमा पार सहयोग, नो-गो जोन, सख्त नियमन और पारदर्शी चेतावनी तंत्र की मांग की, ताकि पहाड़ी समुदायों की सुरक्षा और दीर्घकालिक आजीविका सुनिश्चित हो सके।

DTE Staff

26 अगस्त, 2026 को नेपाल व तिब्बत क्षेत्र में हुए भारी जान-माल का नुकसान और तबाही को देखते हुए पीपल फॉर हिमालय ने तत्काल क्षेत्रीय सहयोग और परिवर्तनकारी कार्रवाई की मांग की है।

एक प्रेस बयान में पीपल फॉर हिमालय ने कहा है कि इस आपदा को केवल एक अलग घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह हिमालय की अत्यधिक जटिल भूगर्भीय बनावट, तेजी से बदलते जलवायु और विकास के बढ़ते दबावों के परस्पर प्रभाव का परिणाम है, जो पहाड़ी परिदृश्य को तेजी से बदल रहे हैं।

बढ़ते तापमान, घटती बर्फबारी और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। वहीं बड़े निर्माणकार्य जैसे जलविद्युत परियोजनाएं, सड़कें, सुरंगें, पर्यटन और शहरीकरण  आपदाओं के खतरों को और बढ़ा रहे हैं।

पीपल फॉर हिमालय ने विशेष रूप से ग्लेशियरों, झीलों, नदियों के जलस्तर और उभरते खतरों पर मजबूत सीमा पार सहयोग और डेटा साझाकरण की मांग की है और कहा है कि निचले इलाकों के समुदायों को समय पर जानकारी और चेतावनियां मिलनी चाहिए, वहीं आपदा तैयारियों में बर्फ-चट्टान के अचानक गिरने और मलबे से बनने वाले अस्थाई बांधों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

पीपल फॉर हिमालय ने 6 प्रमुख मांगें रखी हैं:

1. क्षेत्रीय सहयोग और एकजुटता: सीमा पार संसाधनों और सूचनाओं के पारदर्शी आदान-प्रदान के लिए मजबूत व्यवस्था बने।

2. नो-गो जोन: ऊंचाई वाले और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों को बड़े व अत्यधिक जोखिम वाले बुनियादी ढांचे के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित घोषित किया जाए।

3. सख्त नियमन: पर्यटन और शहरीकरण को नियंत्रित किया जाए और पर्यावरण की क्षमता के भीतर रखा जाए।

4. न्यायपूर्ण राहत और पुनर्वास: राहत, मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में प्रभावित समुदायों को केंद्र में रखा जाए, उनकी दीर्घकालिक आजीविका और मानसिक स्वास्थ्य सहायता सुनिश्चित की जाए तथा पुनर्निर्माण और भविष्य से जुड़े फ़ैसलों में उनकी सार्थक भागीदारी हो।

5. पारदर्शिता और जवाबदेही: जलवायु संबंधी जानकारी और पूर्व-चेतावनी प्रणालियों में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।

6. श्रमिकों की सुरक्षा: जोखिम वाली परियोजनाओं में कार्यरत सभी मजदूरों, जिसमें प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं, के अधिकारों और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हों।

पीपल फॉर हिमालय ने 26 अगस्त की इस त्रासदी को 'जलवायु दायित्व' का मुद्दा बताया है, न कि खैरात का। साथ ही, वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु नुकसान और क्षति के तहत सीधे मुआवज़े के लिए एक कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त ढांचे की मांग की है।

पीपल फॉर हिमालय एक साझा अभियान है, जो हिमालयी क्षेत्र को प्रभावित करने वाले विभिन्न मुद्दों – जैसे आपदाएं, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, आजीविका और विकास पर काम करने वाले सामाजिक समूहों, पर्यावरण संगठनों, कार्यकर्ताओं और नागरिकों को एक मंच पर लाता है। इस सार्वजनिक बयान को पूरे भारत और इस विस्तृत क्षेत्र के 74 संगठनों तथा 114 प्रमुख व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त है।