मरुस्थलीकरण दुनिया की 24 प्रतिशत भूमि और 35 प्रतिशत आबादी को प्रभावित कर रहा है, जिससे भोजन, पानी और आजीविका संकट बढ़ रहा है।
शोध बताता है कि केवल हरियाली बढ़ाने के बजाय खेती, पानी और स्थानीय आजीविका को साथ जोड़ना जरूरी है।
सीमांत कृषि भूमि को चरागाह में बदलने से हरियाली, पशुपालन उत्पादन और किसानों की आय एक साथ बढ़ी।
इस रणनीति से कृषि आय 22 प्रतिशत तक बढ़ी और पानी की कमी में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।
यह मॉडल गरीबी, भूख और जल संकट से जुड़े सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में वैश्विक स्तर पर मददगार है।
दुनिया की एक बड़ी समस्या है मरुस्थलीकरण। इसका मतलब है उपजाऊ जमीन का धीरे-धीरे बंजर हो जाना। आज दुनिया की लगभग 24 प्रतिशत जमीन मरुस्थलीकरण की चपेट में है और इसका असर 35 प्रतिशत वैश्विक आबादी पर पड़ता है।
यह समस्या 126 से अधिक देशों में देखी जा रही है। इसके बावजूद, मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए किए जा रहे कई प्रयास केवल थोड़े समय के लिए हरियाली बढ़ाने पर ध्यान देते हैं, न कि पानी, खेती और लोगों की आजीविका जैसी असली समस्याओं पर।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए, चीनी विज्ञान अकादमी के शोधकर्ताओं की एक टीम ने एक नया और व्यावहारिक तरीका सुझाया है। यह अध्ययन हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ दि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) नामक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस शोध की खास बात यह है कि इसमें पर्यावरण संरक्षण, जलवायु-अनुकूल खेती और स्थानीय लोगों की आजीविका - तीनों को एक साथ जोड़ा गया है।
समस्या क्या है?
अब तक मरुस्थलीकरण रोकने के लिए जो प्रयास हुए हैं, वे अक्सर पेड़ लगाने या जमीन को हरा दिखाने तक सीमित रहे हैं। लेकिन अगर उस इलाके में पानी कम है या वहां की मिट्टी उस फसल के लिए उपयुक्त नहीं है, तो यह हरियाली टिकाऊ नहीं रहती। इससे पानी की कमी बढ़ती है और किसानों की आमदनी भी नहीं बढ़ पाती। यही कारण है कि ऐसे प्रयास लंबे समय में सफल नहीं हो पाते और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) पूरे नहीं हो पाते।
क्या है नया समाधान?
शोधकर्ताओं ने चीन को एक उदाहरण के रूप में चुना और यह देखा कि अगर खेती और भूमि उपयोग को स्थानीय पर्यावरण के अनुसार बदला जाए, तो क्या परिणाम आते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि -
कमजोर और कम उपज वाली कृषि भूमि को चरागाह (पशु चराने की भूमि) में बदला जाए
फसलों का चयन स्थानीय जलवायु, मिट्टी और पानी की उपलब्धता के अनुसार किया जाए
खेती के साथ-साथ पशुपालन को बढ़ावा दिया जाए
अध्ययन के क्या निकले नतीजे ?
इस रणनीति से कई सकारात्मक परिणाम सामने आए:
क्षेत्रीय हरियाली में 0.2 से 0.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई
पशुपालन उत्पादन में 5.1 से 35.2 प्रतिशत तक वृद्धि हुई
किसानों की आय 20.5 से 22.2 प्रतिशत तक बढ़ी
पर्यावरणीय पानी की कमी में 0.1 से 3.7 प्रतिशत की कमी आई
यानी एक ही समय में पर्यावरण, खेती और आमदनी-तीनों को फायदा हुआ।
सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में योगदान
जब इस मॉडल को संयुक्त राष्ट्र के एसडीजी के नजरिए से देखा गया, तो इसके बड़े सामाजिक लाभ सामने आए -
सात करोड़ से अधिक लोगों के लिए पर्याप्त प्रोटीन उपलब्ध हो सकता है
लगभग 80 लाख लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर आ सकते हैं
13 करोड़ से अधिक लोगों के लिए पानी की कमी कम हो सकती है
वैश्विक स्तर पर यह रणनीति -
एसडीजी 1 (गरीबी खत्म करना) में 0.7 फीसदी
एसडीजी 2 (भुखमरी खत्म करना) में 9.8 फीसदी
एसडीजी 6 (स्वच्छ पानी) में 3.8 फीसदी योगदान दे सकती है
यह अध्ययन क्यों है महत्वपूर्ण?
यह अध्ययन दिखाता है कि मरुस्थलीकरण केवल पर्यावरण की समस्या नहीं है, बल्कि यह भोजन, पानी और रोजगार से जुड़ी एक बड़ी विकास समस्या है। अगर समाधान स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाए जाएं, तो वे ज्यादा टिकाऊ और प्रभावी हो सकते हैं।
यह शोध नीति-निर्माताओं, विकास एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए एक व्यावहारिक रोडमैप देता है। यह बताता है कि अगर प्रकृति और लोगों की जरूरतों को साथ-साथ समझा जाए, तो मरुस्थलीकरण से लड़ाई ज्यादा प्रभावी, समावेशी और मजबूत बन सकती है।