समुद्र में गर्मी और बढ़ती अम्लता साथ आने पर समुद्री जीवों पर खतरा और नुकसान कई गुना बढ़ सकता है।
1982 से 2024 तक के आंकड़ों में ऐसी संयुक्त घटनाएं सामान्य संभावना से करीब चार गुना ज्यादा देखी गईं।
कम और मध्यम अक्षांशों में समुद्री गर्मी की लहरें पानी को अधिक अम्लीय बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
‘द ब्लॉब’ के दौरान गर्मी और अम्लता ने समुद्री जीवों, मछलियों, पक्षियों और समुद्री स्तनधारियों को नुकसान पहुंचाया।
अल नीनो और ला नीना समुद्र के तापमान, अम्लता और पानी के ऊपर उठने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।
समुद्र के लिए बढ़ता तापमान और बढ़ती अम्लता, दोनों ही गंभीर खतरे हैं। लेकिन जब ये दोनों संकट एक ही समय में सामने आते हैं, तो समुद्री जीवन पर इनका असर और ज्यादा गंभीर हो सकता है। वैज्ञानिकों ने अब ऐसे घटनाक्रमों को समझने की कोशिश की है, जिनमें समुद्र का तापमान असामान्य रूप से बढ़ने के साथ उसकी अम्लता भी बहुत अधिक बढ़ जाती है।
एजीयू एडवांसेज पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन में 1982 से 2024 तक के 43 वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें समुद्र की सतह के तापमान और अम्लता में होने वाले बदलावों को देखा गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि गर्मी और अम्लता से जुड़ी ऐसी चरम घटनाएं संयोग से होने की तुलना में कहीं अधिक बार होती हैं।
समुद्र में बन रहा है खतरनाक मेल
वैज्ञानिकों ने उन स्थितियों को चरम घटना माना, जब समुद्र का तापमान और अम्लता सामान्य स्तर से बहुत ज्यादा बढ़ गए। अध्ययन के अनुसार, दुनिया के निचले और मध्यम अक्षांशों वाले समुद्री इलाकों में ऐसी संयुक्त घटनाएं संयोग से होने की संभावना से करीब चार गुना अधिक थीं।
इन इलाकों में समुद्र की ऊपरी और निचली परतों के बीच पानी का मिश्रण सीमित रहता है। इसे स्थायी स्तरीकरण कहा जाता है। जब ऐसे इलाकों में समुद्री गर्मी की लहर आती है, तो गर्म पानी की ऊपरी परत और मजबूत हो जाती है। इसका असर समुद्र के रासायनिक संतुलन पर भी पड़ता है और पानी अधिक अम्लीय हो सकता है।
इसका मतलब है कि समुद्री गर्मी की लहर केवल तापमान बढ़ाने तक सीमित नहीं रहती। वह समुद्र की रासायनिक स्थिति को भी बदल सकती है।
‘द ब्लॉब’ बना बड़ा उदाहरण
इस खतरे का सबसे चर्चित उदाहरण 2013 से 2015 के बीच उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर में आया ‘द ब्लॉब’ है। उस दौरान समुद्र के एक बड़े हिस्से में तापमान असामान्य रूप से बढ़ गया था। इसी समय समुद्र में अत्यधिक अम्लता की स्थिति भी बनी।
इस घटना का समुद्री जीवन पर गंभीर असर पड़ा। कई जगह मछली पकड़ने पर रोक लगानी पड़ी। समुद्री स्तनधारी बड़ी संख्या में तटों पर फंसे मिले और समुद्री पक्षियों की मौत हुई। कई समुद्री जीवों ने अपने रहने के क्षेत्र बदले, जबकि कुछ जीव इन कठिन परिस्थितियों में जीवित नहीं रह सके।
हर जगह एक जैसा असर नहीं
हालांकि समुद्र के हर हिस्से में गर्मी और अम्लता का मेल एक जैसा नहीं होता। ध्रुवीय इलाकों और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में ऐसी संयुक्त घटनाएं सबसे कम देखी गईं।
इन क्षेत्रों में समुद्र की गहराई से ठंडा और अधिक अम्लीय पानी ऊपर आता है। इसे अपवेलिंग कहा जाता है। जब यहां समुद्री गर्मी की लहर आती है, तो ऊपर गर्म पानी की एक परत बन सकती है। यह परत गहरे पानी को ऊपर आने से रोक देती है। परिणामस्वरूप सतह पर सामान्य से कम अम्लीय पानी दिखाई दे सकता है।
अल नीनो और ला नीना का भी असर
अल नीनो और ला नीना जैसी जलवायु घटनाएं भी इन चरम स्थितियों को प्रभावित करती हैं। अल नीनो के दौरान गर्म पानी की परत बनने से समुद्र के गहरे पानी का ऊपर आना कम हो सकता है। इससे उस क्षेत्र में सामान्य अम्लता घट सकती है।
वहीं, ला नीना के दौरान ठंडा और अधिक अम्लीय गहरा पानी सतह पर आ सकता है। इससे मुख्य रूप से अम्लीकरण की चरम स्थिति बनती है। हालांकि इन घटनाओं का असर आसपास के समुद्री क्षेत्रों में अलग रूप में दिखाई दे सकता है और वहां गर्मी तथा अम्लता दोनों की चरम स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
ज्यादातर घटनाएं छोटी, कुछ बेहद लंबी
अध्ययन में पाया गया कि ऐसी संयुक्त घटनाओं में से 73 प्रतिशत का क्षेत्रफल पांच लाख वर्ग किलोमीटर से कम था। आम तौर पर ये घटनाएं करीब एक महीने तक चलीं। लेकिन कुछ घटनाएं एक साल से भी अधिक समय तक जारी रहीं।
लंबे समय तक चलने वाली घटनाएं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं, क्योंकि जीवों को लंबे समय तक गर्म और असामान्य रूप से अम्लीय पानी का सामना करना पड़ता है।
समुद्र के भविष्य के लिए चेतावनी
वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री गर्मी और अम्लता को अलग-अलग समझना पर्याप्त नहीं है। दोनों घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं और समुद्री जीवों पर संयुक्त दबाव बढ़ा सकती हैं।
इस अध्ययन से यह समझने में मदद मिलती है कि ऐसे दोहरे संकट कब और कहां पैदा होते हैं। भविष्य में समुद्र के बदलते तापमान और रासायनिक स्थिति पर नजर रखने के लिए इस तरह के संयुक्त अध्ययन महत्वपूर्ण होंगे। समुद्र में होने वाले इन बदलावों का असर केवल समुद्री जीवों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मत्स्य उद्योग, तटीय समुदायों और समुद्र पर निर्भर मानव जीवन पर भी पड़ सकता है।