1910 के बाद, 2025 में करीब 100 साल बाद जम्मू में इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा आई। इसका मुख्य कारण क्या हो सकता है?
देखिए, लोग कहते हैं कि जम्मू में बहुत बड़ी आपदा आई है, और इसकी सबसे बड़ी वजह तवी नदी है। तावी ने तबाही मचाई और भारी नुकसान किया। असल में, जहाँ भी तवी का पानी गया, वहाँ उसके किनारे बने घर अपने आप में एक उल्लंघन हैं। जैसे तवी का पानी गुजर नगर तक गया, जो बहुरख वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी का हिस्सा था। यह लगभग 25–50 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र था, जिसे सिर्फ कागज़ों में सैंक्चुअरी दिखाया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर वहाँ अतिक्रमण हो चुका था। इसी तरह, हरिक पूरी वाइल्डलाइफ़ की जगह थी, वहाँ भी अतिक्रमण किया गया। पानी जानीपुर तक गया, और पहले जब यह 'रख' हुआ करती थी, तब बारिश होने या पानी तेज बहाव में आने पर ये अम्ब्रेला का काम करती थी। बंतलाब का इलाका असल में नाला था, जिसे पूरी तरह बंद कर दिया गया। तो अब पानी जाएगा कहाँ? यह होना ही था।
जब अतिक्रमण हो रहा था, तब क्या प्रशासन ने इस पर कोई ठोस कदम उठाया था?
जम्मू स्मार्ट सिटी बनाने में करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन असलियत यह है कि यहाँ कोई ठोस ड्रेनेज सिस्टम नहीं है। हर मकान के आगे बस 2–2 फुट की नालियाँ बना दी गईं और वही पैटर्न 15–20 मकानों के सामने दोहराया गया। लेकिन बड़ी समस्या यह है कि इन सभी नालों का पानी निकालने के लिए नीचे भी सिर्फ 2 फुट का ही मुख्य नाला बनाया गया। अब आप सोचिए, इतने सारे नालों का पानी जब एक ही छोटे नाले में डाला जाएगा तो वह कैसे संभाल पाएगा? यही वजह है कि पानी रुक जाता है और हालात बाढ़ जैसे बन जाते हैं।
इतनी बड़ी लापरवाही के बाद क्या प्रशासन कोई ज़िम्मेदारी लेता है?
देखिए, जब तक लोग आवाज नहीं उठाएँगे, तब तक कुछ नहीं होगा। जब तक सरकार पर दबाव नहीं बनेगा, जब तक कोई आंदोलन या क्रांति नहीं होगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। सच यह है कि एक वर्ग कमाने वाला है और दूसरा बिकने वाला। लोग कहते हैं कि इसका कारण क्लाइमेट चेंज है, लेकिन क्लाइमेट चेंज तो एक निरंतर प्रक्रिया है। आपको गुमराह किया जा रहा है—कभी क्लाइमेट चेंज के नाम पर, कभी क्लाउड बर्स्ट के नाम पर। असलियत यह है कि दुनिया पहले भी छह बार ऐसे दौर देख चुकी है और यह सातवीं बार हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि आप इसे तेज कर सकते हैं, लेकिन इसे धीमा करने के लिए सावधानी बरतनी होगी।
लेकिन प्रोजेक्ट्स जैसे चिनाब ब्रिज, जो बड़े इंजीनियरों की प्लानिंग से बने और जिन्हें बनाने में 18–20 साल लगे—क्या आपको नहीं लगता कि उनका नतीजा वाकई कमाल का निकला?
देखिए, जिस प्रोजेक्ट की आप बात कर रहे हैं, वह अपनी जगह अच्छा है, लेकिन सचाई यह भी है कि वह कटरा से निकलता है और कटरा खुद ब्लास्ट ज़ोन में है। कटरा चूना-पत्थर (लाइमस्टोन) क्षेत्र है और संगलदान में 'मारी थ्रस्ट' मौजूद है। जब आप प्रकृति की क्षमता के खिलाफ जाते हैं, तो ऐसी स्थिति पैदा होती है। आगे भी हमने कई प्रोजेक्ट्स देखे हैं, जिन्हें बड़ी प्लानिंग से बनाया गया, लेकिन वे टिक नहीं पाए और ध्वस्त हो गए। सच्चाई यही है कि प्रकृति के खिलाफ कुछ भी टिक नहीं सकता—प्रकृति को बचाओगे तो ही तुम खुद बच पाओगे।
इन आपदाओं से नीति निर्माता और आम नागरिक क्या सीख लें—और अब से क्या बदलाव करना जरूरी है?
देखिए, साउथ अमेरिका की एक जनजाति है, जो कहती है कि कोई भी प्रोजेक्ट बनाएं, इसे इस सोच के साथ बनाएं कि क्या यह अगले सात पीढ़ियों तक टिक पाएगा। वे हमेशा इसे लिखित रूप में सुनिश्चित करते हैं, और अगर कोई प्रोजेक्ट फेल होता है, तो इसके लिए जिम्मेदारों को जवाबदेह ठहराया जाता है और उन्हें दंडित किया जाता है। एक बार कॉन्फ्रेंस में नरसिंभा राव गए थे। उनसे पूछा गया कि क्लाइमेट चेंज के बारे में कुछ बताइए। उन्होंने कहा, 'हम भारतीय हैं, और जब सुबह उठकर हम धरती पर कदम रखते हैं, तो कहते हैं—माँ, हमें माफ कर देना। धरती हमारी माँ है और इसे हम सबको मिलकर संभालना है।